बिजनेस स्टैंडर्ड - जीडीपी की आलोचना का कोई अर्थ नहीं
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जीडीपी की आलोचना का कोई अर्थ नहीं

इंदिवजल धस्माना / नई दिल्ली January 31, 2020

आर्थिक समीक्षा में भारत में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की गणना को लेकर हो रही आलोचकों की चिंता को खारिज करते हुए कहा गया है कि इसका कोई अर्थ नहीं है। इसके एक अध्याय 'क्या भारत की जीडीपी वृद्धि को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया? नहीं!' में कहा गया है, 'भारत की जीडीपी वृद्धि के गलत अनुमान लगाए जाने का कोई साक्ष्य नहीं मिला है।'  इस मसले को तब महत्त्व मिला जब समीक्षा के लेखक कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन के पूर्ववर्ती अरविंद सुब्रमण्यन ने मौजूदा तरीकों में खामियां पाई थीं जिसमें मूल्यवर्धन के तरीके में बदलाव के साथ 2011-12 को नया आधार माना गया है।  अरविंद ने अपने एक शोधपत्र में कहा था कि भारत और कई देशों के तमाम साक्ष्यों से पता चलता है कि भारत की जीडीपी की वृद्धि दर 2011 के बाद हर साल करीब 2.5 प्रतिशत बढ़ाकर दिखाई गई है। 
 
इसी तरह की आलोचना अन्य विशेषज्ञों ने भी की थी। बहरहाल कृष्णमूर्ति की समीक्षा में कहा गया है कि जो मॉडल 2011 के बाद भारत की जीडीपी वृद्धि के अनुमान में 2.77 प्रतिशत के गलत तरीके से अधिक अनुमान की बात करते हैं, वे नमूने में शामिल 51 देशों के मामले में जीडीपी वृद्धि का गलत अनुमान व्यक्त करते हैं। इस अवधि के दौरान ही 51 देशों की जीडीपी वृद्धि के बारे में गलत अनुमान लगाकर 4 प्रतिशत से -4.6 प्रतिशत के बीच रखा गया है। इस गलत वृद्धि अनुमान में अमेरिका की जीडीपी का 1.6 प्रतिशत, जर्मनी का 1 प्रतिशत, सिंगापुर का -2.3 प्रतिशत, दक्षिण अफ्रीका का -1.2 प्रतिशत और बेल्जियम का -1.3 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान शामिल है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में प्रकाशित पेपर में अरविंद ने कहा है कि खासकर विनिर्माण के बारे में सबसे गलत अनुमान लगाया गया। उन्होंने कहा कि 2011 के पहले विनिर्माण मूल्यवर्धन औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के विनिर्माण घटक और विनिर्माण निर्यात से जुड़ा रहता था। उन्होंने कहा कि लेकिन इसके बाद हुए बदलाव से औपचारिक विनिर्माण क्षेत्र में आकलन प्रभावित हुआ है। 
 
पूर्व सीईए ने जीडीपी की गणना के नए तरीके को निर्यात, आयात उद्योग को मिले वास्तविक कर्ज, पेट्रोलियम की खपत, रेलवे माल ढुलाई, बिजली की खपत आदि से भी जोड़ा है। समीक्षा में कहा गया है कि ये मानक गैर स्थिरता के लिए कुख्यात रहे हैं। इनका असर न सिर्फ 1980 से 2015 के बीच हर 3 या 5 साल के बाद बदलने के संकेत देता रहा है, बल्कि समय बीतने के बाद इनके मूल्यों में अहम बदलाव आए हैं। 
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