बिजनेस स्टैंडर्ड - क्या उलट रहा है दशक पुराना मंदी का चक्र?
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क्या उलट रहा है दशक पुराना मंदी का चक्र?

अभीक बरुआ /  January 31, 2020

आर्थिक समीक्षा में मंदी के कारण और उसके संभावित निवारण को लेकर कुछ दिलचस्प तथ्य प्रस्तुत किए गए हैं। इन पर विस्तार से प्रकाश डाल रहे हैं अभीक बरुआ

 
लंबी आर्थिक मंदी के दौर में लिखी गई आर्थिक समीक्षा का सबसे बेहतर आकलन इस आधार पर हो सकता है कि वह दो सवालों का जवाब देने में किस हद तक सक्षम है। पहला, क्या सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार और आर्थिक समीक्षा के प्रमुख लेखक इस बात का उचित विश्लेषण प्रस्तुत कर पाते हैं कि हालात इतने संकटपूर्ण क्यों हुए? दूसरा, क्या उनके पास इस संकट को हल करने के उपाय हैं या कम से कम ऐसे उपाय जो अर्थव्यवस्था में आ रही गिरावट को थाम सकें? मेरा मानना है कि आर्थिक समीक्षा मौजूदा आर्थिक मंदी को समझने में सफल रही है। इसमें नई अंतर्दृष्टि प्रदान की गई है जो ढांचागत बनाम चक्रीय मंदी के पारंपरिक वर्गीकरण से परे है। इस सिलसिले में यह दावा करती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था वर्ष 2011-12 से ही वृद्घि में धीमेपन के प्रभाव में है। इसके मुताबिक मंदी की जड़ें सन 2000 के दशक के ऋण के बुलबुले में छिपी हैं जिसके कारण खपत और वृद्घि में अचानक तेजी आई थी। जब यह बुलबुला फूटा तो कंपनियां या तो दिवालिया हो गईं या इसका अनुमान होने पर उन्होंने अपना ऋण चुकाने की आपाधापी दिखाई। सन 2000 के दशक की ऋण आधारित तेजी मौजूदा दशक के साथ समापन की दिशा में बढ़ी।
 
कंपनियां क्षमता विस्तार के लिए नया ऋण लेने के बजाय पुराना कर्ज चुकाने में रुचि ले रही थीं। इससे निवेश प्रभावित हुआ। निवेश में गिरावट से जीडीपी वृद्घि प्रभावित होने लगी, इस धीमेपन ने खपत की मांग पर असर डाला। आर्थिक जगत का गणित कुछ ऐसा है कि मंदी का असर एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक परिलक्षित होने में काफी वक्त लेता है। आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि निजी निवेश जीडीपी को 3-4 वर्ष के अंतराल पर प्रभावित करती है और जीडीपी वृद्घि का खपत पर प्रभाव 1-2 वर्ष के अंतर पर सामने आता है। इस हिसाब से देखें तो खपत में मंदी का सिलसिला 2017-18 में प्रभावी हुआ। धीमी वैश्विक वृद्घि और वित्तीय क्षेत्र पर बढ़े हुए जोखिम से ऐसी आर्थिक मंदी उत्पन्न होती है जिसने कुछ वर्ष से हमारी अर्थव्यवस्था को चपेट में लिया है।
 
क्या इसका अंत नजर आ रहा है? आर्थिक समीक्षा का यकीन है कि 2019-20 में आर्थिक चक्र निम्रतम स्तर छू चुका है। उसने चालू वित्त वर्ष के लिए वृद्घि दर के 5 फीसदी रहने का अनुमान जताया है लेकिन 2020-21 में इसके 6-6.5 फीसदी रहने की बात कही गई है। अन्य अनुमानों को देखें तो यह थोड़ा आशावादी लगता है लेकिन यह हकीकत से दूर कतई नहीं है क्योंकि इसका अर्थ है 10 से 10.5 फीसदी की नॉमिनल वृद्घि दर। आज पेश हो रहे आम बजट में ऐसा देखने को मिल सकता है। इस वर्ष से अगले वर्ष के बीच जीडीपी में एक फीसदी की वृद्घि कैसे आएगी? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए आर्थिक समीक्षा उस मौजूदा बहस का सहारा लेती है जिसमें यह सवाल है कि इस मोड़ पर राजकोषीय प्रोत्साहन अपनाना चाहिए या सुदृढ़ीकरण। यह प्रतिचक्रीय राजकोषीय नीति की बात करता है जिसके तहत या तो सरकार कर कटौती या फिर आय हस्तांतरण के जरिये लोगों को और अधिक पैसा दे या फिर खुद अधिक व्यय करे। इससे उन्हें परेशानी हो सकती है जिनका कहना है कि मंदी आ चुकी है लेकिन आर्थिक समीक्षा तीन वजहों से चिंता की बात नहीं मानती। 
 
पहली बात, ऋण के पोर्टफोलियो में बाहरी कर्ज की हिस्सेदारी बहुत कम है और लगभग पूरी बाहरी उधारी आधिकारिक स्रोतों से होने के कारण ऐसी आशंका नहीं है कि उभरते बाजार का संकट उत्पन्न होगा। दूसरी बात अधिकांश सरकारी कर्ज तयशुदा ब्याज दरों पर लिया गया है इससे देश का ऋण, ब्याज दरों की अस्थिरता से बचा हुआ है। तीसरी बात, केंद्र सरकार के कर्ज का प्रोफाइल ऐसा है जो कर्ज के रोल ओवर का जोखिम कम करता है।  आर्थिक समीक्षा जहां मौजूदा मंदी के कारणों और हल को लेकर विश्वस्त नजर आती है वहीं परंतु वित्तीय क्षेत्र के कारोबार में जोखिम कम करने की बात करें तो वह बात करने की इच्छुक नहीं दिखती। संकट से जूझ रहे अचल संपत्ति और खतरनाक परिसंपत्ति का बोझ ढो रही आवास वित्त क्षेत्र की कंपनियों के लिए सीईए के पास इकलौती सलाह यही है कि वे इन्वेंटरी कम करने के लिए आवास कीमतें कम करें। वित्तीय तंत्र को जाम करने वाली खराब परिसंपत्तियों के लिए किसी राजकोषीय व्यवस्था का उल्लेख न करना निराश करता है। कुछ लोग कहेंगे कि यदि आज पेश होने वाले बजट में भी इस विषय पर कुछ नहीं कहा गया तो आर्थिक सुधार में देरी होगी।
 
दिलचस्प बात है कि आर्थिक समीक्षा की तथाकथित थीम है 'एनेबल मार्केट्स, प्रमोट प्रो बिजनेस पॉलिसीज ऐंड स्ट्रेंथन ट्रस्ट इन इकनॉमी।' इसके अलावा समीक्षा के पहले भाग की शुरुआत नैतिक रूप से परिसंपत्ति तैयार करने से होती है और इसमें 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए कारोबार और बाजार के अनुकूल नीतियां बनाने की बात शामिल हैं। बाजार और कीमतों में सरकार के हस्तक्षेप के खिलाफ तगड़ी दलीलों के साथ यह सरकार और उद्योग जगत के बीच नए सिरे से ताल्लुकात का प्रयास करती है। उद्योग जगत प्राय: यह शिकायत करता है कि उसे तवज्जो नहीं दी जाती। मैं जानना चाहूंगा कि क्या सीईए उद्योग जगत को शांति प्रस्ताव दे रहे हैं या वह सरकार के अपने सहयोगियों को इस मुद्दे को लेकर संवेदनशील करने का प्रयास कर रहे हैं। 
 
आर्थिक समीक्षा पर कोई निर्णयात्मक टिप्पणी करना कठिन है। जहां तक मंदी को लेकर इसकी अवधारणा की बात है, यह दिलचस्प है। हो सकता है अधिकांश आर्थिक मॉडलों की तरह इसके अनुमान भी गलत साबित हों। बहरहाल यह इस लिहाज से विश्वसनीय और स्वतंत्र है कि इसमें मौजूदा आर्थिक स्थिति को नकारा नहीं गया है। न ही इसमें सरकार की आर्थिक नीतियों का बचाव किया गया है। अन्य आर्थिक समीक्षाओं की तरह इसके साथ दिक्कत यही है कि यह व्यापक दृष्टिकोण नहीं दर्शाती। भविष्य के अनुमान के लिए हमें बजट का इंतजार करना होगा। 
Keyword: economic survey, budget, nirmala sitaraman,,
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