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क्या लोकलुभावन होगा वर्ष 2020 का बजट?

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  January 30, 2020

आम बजट करीब आ गया है और ऐसी चर्चा बढऩे लगी है कि वित्त विधेयक 2020 में 'लोकलुभावन' उपायों को तवज्जो दी जाएगी। कौन से कदम 'लोकलुभावन' हैं यह इस बात पर निर्भर करता है कि इन्हें लोकलुभावन कौन मानता है? आमतौर पर इसका अर्थ होता है 'अन्य लोगों' के समर्थन में उठाए गए कदम। जब अंग्रेजी मीडिया इस शब्द का इस्तेमाल करता है तो इसका अर्थ होता है कि ऐसे कदम जिनसे किसानों और वेतनभोगी लोग लाभान्वित होंगे। उदाहरण के लिए मानक कटौती में इजाफा, कृषि क्षेत्र में ज्यादा सब्सिडी, फैक्टरियों में रोबोट के इस्तेमाल पर कर लगाना आदि। यदि किसानों और वेतनभोगियों की दृष्टि से देखा जाए तो 'अन्य' का अर्थ होता है उद्योग और अमीर तबका। इनके लिए मददगार कदमों में प्रत्यक्ष कर दरों में कमी, वृद्धि के लिए अधिक निवेश और अंतत: गरीबों के लिए ट्रिकल डाउन प्रभाव की अपेक्षा।

 
इस वक्त दो चुनौतियां हमारे सामने हैं। पहली, तेजी से बढ़ती असमानता और असमान कर नीति। अप्रत्यक्ष कर जहां अमीर और गरीब एक समान कर चुकाते हैं, वह अभी भी हमारे कर राजस्व में सबसे अधिक हिस्सेदारी रखते हैं। जबकि प्रत्यक्ष कर जो सीधे कर चुकाने वाले की क्षमता से जुड़े हैं और आय के समानुपाती होते हैं, उनका इस्तेमाल राहत प्रदान करने के उपाय के रूप में किया जाता है और अधिकाधिक फंड समाज के हाथ में रखे जाते हैं। प्रत्यक्ष कर में पहले ही काफी राहत दी जा चुकी है। खासतौर पर कारोबारी जगत को राहत दी गई है। इससे कॉर्पोरेट जगत को अधिक आर्थिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। अब उसे देने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। देश की आबादी का बड़ा हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे है, इसके बावजूद हमारे यहां अरबपति तैयार होने का सिलसिला कम होने का नाम नहीं ले रहा। अरबपतियों की तादाद लगातार बढऩे के बावजूद देश के सामाजिक क्षेत्र में संस्थागत फंडिंग लगातार कम हो रही है।
 
हम इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं कि संपत्ति की असमानता और उसके कारण आ रही असमता सामाजिक क्षेत्र पर कई असाधारण प्रभाव डालेगी। इससे संबंधित सवालों का हल कड़े राजकोषीय सुधारों में निहित है। केवल कर अधिकारियों का भय उत्पन्न करके कर अनुपालन सुनिश्चित करना पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है कि कर नीति के लिए क्या महत्त्वपूर्ण है। खराब राजकोषीय नीति के सख्त नियमन से वह हासिल नहीं किया जा सकता है जो समझदारी भरी राजकोषीय नीति से हासिल हो सकता है। आज इस मोर्चे पर होने वाली बहस का ध्रुवीकरण हो चुका है। असमानता का जिक्र करते ही एक ओर से 'वामपंथी' होने का आरोप जड़ दिया जाता है तो दूसरी ओर प्रवर्तन में सुधार की बात करते ही सांठगांठ का आरोप लगाया जाता है। 
 
सरकारी बैंकों की बैलेंस शीट में एक छेद नजर आ रहा है। जाहिर है इन बैंकों को नए सिरे से पूंजी की आवश्यकता होगी। इसे लोकलुभावन की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। हालांकि इसमें भी बैंकों को उस पूंजी की फंडिंग की जाती है जो वे उद्योगों को ऋण देने में गंवा चुके होते हैं। यह काफी हद तक वैसा ही है जैसे कि कृषि ऋण माफी की योजना। इसके अलावा कई गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थान खासतौर पर व्यवस्थागत दृष्टि से अहम संस्थान विफल हो रहे हैं। इनसे निकलने वाले सबक बताते हैं कि संचालन की नाकामियों में इजाफा हुआ है और इनके संस्थागत मूल्यों को क्षति पहुंची है। कई बार नियंत्रण ऐसे लोगों के हाथ में चला जाता है जिनके पास कोई पद तक नहीं होता। आखिरकार किसी न किसी को इसकी कीमत चुकानी होगी। सुधारों की आवश्यकता संस्थानों के सहयोग के लिए धन जुटाने की आवश्यकता से कहीं अलग है। बैंकों और वित्तीय संस्थानों के कारोबारी संचालन में गहन सुधारों के बिना उनमें नई पूंजी डालने का कोई खास अर्थ नहीं निकलेगा। सरकारी बैंकों में अपनी हिस्सेदारी का निगमीकरण करने और बैंकों के कारोबारी प्रशासन को कंपनी कानून के अनुरूप किए बिना हमें इसकी काफी कीमत चुकानी पड़ रही है। कंपनी कानून भी सन 2013 के बाद से काफी लंबा सफर तय कर चुका है। दरअसल सरकारी बैंकों का संचालन जो बैंक राष्ट्रीयकरण कानून में तथा अन्य बैंकों के विधानों में संहिताबद्घ है, वह अप्रचलित ढंग का और बेतरतीब है। 
 
आखिर में इस बार यदि सरकार वित्त अधिनियम में पूरा ध्यान राजकोषीय सुधारों पर केंद्रित करे और संसद के दोनों सदनों से पारित विभिन्न अन्य कानूनों के विभिन्न सूचीपत्रों के माध्यम से होने वाले पुनर्लेखन को समाप्त करे तो अधिक बेहतर होगा। ऐसा रुख अपनाना सही नहीं है जहां धन विधेयक के माध्यम से लोकसभा को राज्य सभा की स्वीकृति के लिए रखे विभिन्न कानूनी प्रावधानों को नकारने का अधिकार दे दिया जाता है। यह आम बजट की कवायद के मुख्य उद्देश्यों से ध्यान हटा देता है। हालिया अनुभव यही बताते हैं कि यह उम्मीद भी व्यर्थ हो सकती है लेकिन यदि व्यर्थ होने की यह अपेक्षा गलत साबित हो तो यह एक सुखद आश्चर्य ही होगा। 
 
(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
Keyword: nirmala sitaraman, economy, budget,,
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