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विभाजनकारी हो सकता है उत्तर-दक्षिण का अंतर

जैमिनी भगवती /  January 30, 2020

राष्ट्रीय सौहार्द बरकरार रखने के लिए आवश्यक है कि राजस्व आवंटन तथा संसदीय सीटों की संख्या निर्धारित करने के मामले में सन 1971 की जनगणना को ही मानक बनाए रखा जाए। बता रहे हैं जैमिनी भगवती

 
सन 1990 के दशक के आरंभ में आर्थिक सुधारों की शुरुआत होने के बाद के तीन दशकों में दक्षिण भारत के राज्यों की प्रति व्यक्ति आय में उत्तर भारत के बड़े राज्यों की तुलना में ज्यादा इजाफा हुआ है। सन 1990-91 में कर्नाटक की प्रति व्यक्तिआय बिहार और उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय की तुलना में क्रमश: 1.7 और 1.3 गुना ज्यादा थी। वर्ष 2017-18 तक यह अंतर बढ़कर 4.7 और 3.3 गुना हो चुका था। यह सिलसिला जारी है। एक के बाद एक वित्त आयोगों द्वारा किए गए कर राजस्व आवंटन की बात करें तो यह निरपवाद रूप से विभिन्न राज्यों की आबादी से संबंधित रहा है। उदाहरण के लिए 14वें वित्त आयोग के विचारणीय विषयों में कहा गया है कि जहां करों के बंटवारे तथा अन्य अनुदान देने की बात हो वहां आयोग को आमतौर पर सन 1971 की आबादी के आधार को निर्धारक मानना चाहिए। हालांकि कहा यह भी किया गया कि आयोग सन 1971 के बाद आबादी के स्वरूप में आए बदलाव को भी ध्यान मेंं रख सकता है। 
 
14वें वित्त आयोग की रिपोर्ट के खंड 8 का शीर्षक है 'केंद्रीय कर राजस्व की साझेदारी' और इसमें कहा गया है कि 'हालांकि हमारा मानना है कि आबादी के पुराने आंकड़ों का इस्तेमाल करना उचित नहीं है लेकिन हम विचारणीय विषयों के दायरे से बंधे हुए हैं।' व्यक्तिगत स्तर पर राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के बीच कर राजस्व की साझेदारी को लेकर मतभेद रहे हैं। 15वें वित्त आयोग के विचारणीय विषयों में बदलाव करके कहा गया है कि राज्यों को आवंटन के पहले कुल राजस्व के एक हिस्से को बाहरी रक्षा और आंतरिक सुरक्षा पर होने वाले व्यय के लिए अलग किया जाना चाहिए। कुछ राज्य सरकारों ने इसकी जमकर आलोचना की। अब यह स्पष्ट हो चुका है कि आयोग के विचारणीय विषयों में चुनिंदा बदलाव करना आवश्यक था। 
 
अतीत में वित्त आयोगों ने देश की सुरक्षा को खतरे को केंद्र और राज्यों के बीच संसाधनों का आवंटन करते समय ध्यान में रखा था। अभी हाल ही में राज्यों ने यह मांग की कि उन्हें उन उपकरों और अधिभार में से हिस्सा मिलना चाहिए जो केंद्र सरकार ने एकत्रित किए हैं। हालांकि संविधान में उल्लिखित मौजूदा प्रावधानों के मुताबिक अभी केंद्र सरकार ऐसे राजस्व को पूरी तरह अपने पास रख सकता है। दिसंबर 2019 में जब जीएसटी परिषद में असहमति बनी और लॉटरी पर कराधान को लेकर एक निर्णय पर मतदान हुआ तो ऐसा पहली बार हुआ क्योंकि इससे पहले जीएसटी परिषद के तमाम निर्णय आम सहमति से हुए थे। 
 
15वें वित्त आयोग के विचारणीय विषयों में यह भी कहा गया है कि 'उसे अपनी अनुशंसाएं करते समय सन 2011 की आबादी के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।' सन 2011 की जनसंख्या के आंकड़ों का इस्तेमाल करने के बाद भी देखें तो भी उत्तर भारत के राज्यों में प्रति व्यक्ति आय, दक्षिण भारत के राज्यों की प्रति व्यक्ति आय की तुलना में कम थी। इसका परिणाम 15वें वित्त आयोग द्वारा उत्तर भारत के राज्यों को किए जाने वाले राजस्व आवंटन में इजाफे के रूप में सामने आ सकता है। 
 
जाहिर है आवंटित राशि 14वें वित्त आयोग द्वारा आवंटित राशि की तुलना में अधिक होगी। जाहिर है इससे देश के दक्षिणी हिस्से में मौजूद राज्यों में काफी असंतोष उत्पन्न हो सकता है। मेरी समझ यह कहती है कि सन 1971 की आबादी के आंकड़ों को वित्त आयोग द्वारा किए जाने वाले आवंटन से जोडऩा उत्तरी भारत के राज्यों के साथ गलत व्यवहार नहीं होगा।  यदि उत्तर भारत के बड़े राज्य बेहतर विकास प्रबंधन करने में सफल रहते तो उनकी आबादी में तेज इजाफा शायद उनके लिए लाभप्रद साबित होता। राज्यों के साथ 'निष्पक्ष' व्यवहार किया जाना चाहिए लेकिन अतीत का कमजोर आर्थिक प्रदर्शन उनके बीच प्राथमिकता देने वाले और पक्षपात करने वाले व्यवहार का कारण नहीं होना चाहिए। 
 
चाहे जो भी उत्तर प्रदेश और बिहार के अनेक लोग अस्थायी या स्थायी तौर पर उच्च प्रति व्यक्ति आय वाले राज्यों में रहने चले जाते हैं। संभव है कि उक्त तरीका जो 14वें वित्त आयोग की रिपोर्ट में उल्लिखित है, उसे 15वें वित्त आयोग द्वारा अपना लिया जाए। खासतौर पर यह देखते हुए कि आबादी के भार और जनांकीय बदलाव के संकेतकों को अलग-अलग पेश किया जाना चाहिए।  पिछले कुछ समय से दक्षिण भारत के राज्यों में इस बात को लेकर चिंता का वातावरण रहा है कि नए सिरे से परिसीमन की कवायद होने के बाद कैसे लोकसभा में उनकी सीटों की तादाद में कमी आएगी। सन 2002 में हुए 84वें संविधान संशोधन के अनुसार संसदीय क्षेत्रों का यह पुनर्आवंटन सन 2031 की जनगणना के मुताबिक किया जाना चाहिए (इंडियाज इमर्जिंग क्राइसिस, लेखक: मिलन वैष्णव और जेमी हिंटसन)। 
 
अटकल यह है कि दक्षिण भारत को लोकसभा सीट के मामले में उत्तर भारत के हाथों 45 सीटों का नुकसान हो सकता है। स्पष्ट है कि दक्षिण के राज्यों को यह बात कतई स्वीकार्य नहीं होगी। केंद्र सरकार के मौजूदा इरादों को लेकर अशांत होने की वजह नहीं है। बहरहाल, हकीकत यह है कि 15वें वित्त आयोग द्वारा 2011 की जनगणना के आधार पर राज्यों को धन आवंटित करने की बात से अवश्य राज्यों में चिढ़ पैदा हो सकती है। अब से 10 वर्ष बाद यानी 2031 में यदि दक्षिण भारत के राज्यों की लोकसभा सीट कम की जाती हैं तो उनमें भारी नाराजगी पैदा होगी। हालांकि कम प्रति व्यक्ति आय वाले उत्तर भारत के राज्यों की प्रतिक्रिया में भी कोलाहल सुनाई पड़ सकता है। ऐसे में राष्ट्रीय सौहार्द के लिए बेहतर यही होगा कि अगले तीन दशक तक एक बार फिर संसद सदस्यों की तादाद और संसाधनों का आवंटन, दोनों मामलों में सन 1971 की जनगणना को ही मानक रखा जाए।
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