बिजनेस स्टैंडर्ड - बैंकरों का बचाव
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बैंकरों का बचाव

संपादकीय /  January 30, 2020

सरकारी क्षेत्र के बैंकर ऋण देने संबंधी निर्णय लेने में अनिच्छुक नजर आते रहे हैं क्योंकि ऋण के फंसे हुए कर्ज में तब्दील होने पर उन्हें जांच एजेंसियों की कार्रवाई का खौफ सताता है। आखिरकार सरकार ने बैंकरों को अनावश्यक प्रताडऩा से बचाने की अपनी बात पर अमल करने का फैसला कर लिया है। यह स्वागतयोग्य कदम है क्योंकि भय के माहौल के कारण ऋण प्रवाह में गिरावट आई थी और अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्र प्रभावित हो रहे थे। बैंकरों के मन में यह धारणा बन गई थी कि जांच के खिलाफ सबसे अच्छा बचाव निष्क्रियता है। सरकार ने इस सप्ताह घोषणा की कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में संशोधन किया गया है और शासकीय सेवकों के खिलाफ कार्रवाई की इजाजत के लिए पूर्व अनुमति लेनी आवश्यक होगी। सरकार ने अधिक मूल्य की धोखाधड़ी के लिए वर्ष 2015 के फ्रेमवर्क में भी संशोधन किया है। 

 
यही कारण है कि सरकारी बैंकों के प्रबंध निदेशकों और मुख्य कार्याधिकारियों को अलग-अलग समय सीमा के अनुपालन के लिए व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह नहीं ठहराया जाएगा। सरकार ने सरकारी बैंकों के बोर्ड को सशक्त बनाया है ताकि वे भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्रीय सतर्कता आयोग के परिपत्रों द्वारा निर्धारित विभिन्न टाइम लाइन का अनुपालन करने की व्यवस्था बना सकें। इसके अलावा बैंकिंग धोखाधड़ी मामलों के सलाहकार बोर्ड की स्थापना की गई है ताकि 50 करोड़ रुपये मूल्य से अधिक की धोखाधड़ी के ऐसे मामलों की जांच की जा सके जिनमें महाप्रबंधक और उससे ऊंचे पदों पर आसीन लोग शामिल हों। सलाहकार बोर्ड मामलों की जांच शुरू होने के पहले इनका परीक्षण करेगा। इतना ही नहीं सरकार ने बैंकों से वरिष्ठ अधिकारियों की एक समिति गठित करने को भी कहा ताकि अनुशासनात्मक कार्रवाई तथा आंतरिक सतर्कता के मामलों की निगरानी की जा सके। ऐसे मामलों को हल करने में देरी होने का असर बैंकों के आंतरिक माहौल पर पड़ता है और यह क्षमता को भी प्रभावित करता है। 
 
ये सारे कदम सही दिशा में उठाए गए हैं और इनसे सरकारी बैंकरों के बीच व्याप्त भय दूर होना चाहिए। निश्चित तौर पर ऋण देने के लिए सद्भावनापूर्वक या दुर्भावनापूर्वक लिए गए निर्णयों के बीच अंतर कर पाना आसान नहीं है। संभव है कि तमाम प्रक्रियाओं का उचित पालन करने के बावजूद ऋण देने का निर्णय गलत साबित हो जाए। ऐसे में जांच शुरू करने के पहले शुरुआती परीक्षण करने से बैंकरों की मदद हो सकती है। बहरहाल, यह दलील देना कठिन है कि इतने कदम उठाना भर पर्याप्त होगा। आमतौर पर कानूनी बचाव हमेशा जांच एजेंसियों को जांच शुरू करने या गिरफ्तारी करने से नहीं रोकते। इसके अलावा सरकार को व्यापक तस्वीर पर भी नजर रखनी चाहिए। सरकारी बैंकों में धोखाधड़ी और फंसे हुए कर्ज के मामले केवल भ्रष्टाचार की वजह से नहीं हैं। जैसा कि देश में बैंकिंग की प्रगति और रुझानों से संबंधित आरबीआई की ताजा रिपोर्ट बताती है, वर्ष 2018-19 में बैंकों में धोखाधड़ी के 90 फीसदी मामले सरकारी बैंकों में हुए।
 
रिपोर्ट में कहा गया है कि आंतरिक प्रक्रियाओं, कर्मचारियों और प्रक्रियात्मक जोखिम से निपटने की अपर्याप्तता साफ नजर आती है। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि सरकारी बैंकों में व्यापक सुधार की आवश्यकता है ताकि ऋण देने संबंधी जोखिम का आकलन करने के लिए क्षमता विकसित की जा सके। सुधारों के अभाव में सरकारी बैंक धोखाधड़ी और जांच की आशंका में जीते रहेंगे। चाहे भले ही सरकार सुरक्षा के कितने भी उपाय कर दे। चूंकि बैंकिंग तंत्र में सरकारी बैंकों का दबदबा है इसलिए ऋण देने में उनकी अक्षमता आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करती है। यह बात अलग है कि अब उनकी बाजार हिस्सेदारी लगातार कम हो रही है। सरकारी बैंकों में सुधार की तमाम वजह मौजूद हैं। सरकार इनमें निरंतर पूंजी नहीं डालती रह सकती। 
Keyword: bank, loan, NPA, debt, economy,,
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