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आर्थिक नीतियों के निर्माण में असली चमक पर हो जोर

प्रांजल भंडारी /  January 29, 2020

अर्थव्यवस्था में सुस्ती दूर करने के लिए बजट की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखा जा रहा है। हालांकि सरकारी व्यय बढ़ाने का परंपरागत तरीका उतना कारगर नहीं रहेगा। बता रही हैं प्रांजल भंडारी

 
अर्थव्यवस्था के मुश्किल में फंसे होने से 1 फरवरी को आने वाले आम बजट की तरफ ध्यान कुछ अधिक ही केंद्रित हो रहा है। उम्मीद है कि सरकार व्यय मदों में तेजी लाएगी। लेकिन इतिहास पर नजर डालें और सहज बुद्धि से देखें तो यही लगता है कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए इस समय सरकारी व्यय बढ़ाने जैसे फौरी समाधान की जरूरत नहीं है। भारत में तीन साल से बनी सुस्ती के बारे में हमारा अध्ययन नीति-निर्माताओं के लिए कुछ अहम सबक देता है। पहली नजर में आकर्षक लगने वाले उच्च सार्वजनिक निवेश और बढ़े हुए विदेशी मुद्रा भंडार जैसी बातों में भी कुछ नकारात्मक चीजें छिपी हो सकती हैं।
 
संकेत के तौर पर हम 2017 और 2018 में दिखी शुरुआती आर्थिक सुस्ती पर नजर डालते हुए इसकी शुरुआत कर सकते हैं। पांच वर्षों तक रही गिरावट के बाद निवेश में आई तेजी इस दौर की पहचान रही। इस निवेश वृद्धि में काफी योगदान सार्वजनिक क्षेत्र का था। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में सार्वजनिक निवेश का अंशदान वर्ष 2016 के 0.1 फीसदी से बढ़कर 2017 में 0.8 फीसदी हो गया। लेकिन सार्वजनिक व्यय में यह तेजी भी प्रच्छन्न लागत के बगैर नहीं थी। इस दौरान सार्वजनिक क्षेत्र की उधारी बढ़ी जिसके तीन अनचाहे नतीजे सामने आए।
 
पहला, बचत उस हिसाब से नहीं बढ़ी जिस अनुपात में निवेश वृद्धि हुई। इसका परिणाम यह हुआ कि बचत और निवेश के बीच का फर्क गिर गया। यह उपाय देश के बाह्य चालू खाता संतुलन से कुछ ज्यादा नहीं है और घरेलू बचत के नाकाफी होने पर बाह्य फंडिंग पर निर्भरता बढ़ गई। इस दो वर्षों में चालू खाता घाटा तेजी से बढ़ गया।
 
दूसरा, बचत में लचर वृद्धि का समूची अर्थव्यवस्था के लिए ब्याज दरों पर प्रभाव पड़ा। भारत में लागू लगभग सभी ब्याज दरें उसी समय बढऩी शुरू हो गईं।
 
तीसरा, सार्वजनिक निवेश बढ़ाने के पीछे आर्थिक वृद्धि तेज करने की सोच थी लेकिन यह गिर गई। जीडीपी उपभोग, निवेश और शुद्ध निर्यात का कुल जोड़ होता है लिहाजा निवेश बढऩे पर शुद्ध निर्यात गिर गया। 
 
यह पहलू बजट के लिहाज से एक अहम सबक देता है। यह मान लेना लुभावना है कि आर्थिक वृद्धि फिर से तेज करने के लिए सुस्ती के दौरान राजकोषीय घाटा बढ़ाया जाना चाहिए। लेकिन घरेलू बचत नाकाफी होने की सूरत में यह ब्याज दरों पर दबाव और बाह्य वित्त पर तनाव डाल सकता है जिससे आर्थिक वृद्धि पर असर पड़ सकता है।
 
संक्षेप में, एक विशाल राजकोषीय संवद्र्धन पर आधारित कोई वृद्धि बहाली नीति उलटी भी पड़ सकती है। इससे अर्थव्यवस्था को मदद मिलने के बजाय प्रतिकूल असर पड़ेगा। यहां पर संतुलन यही होगा कि संसद द्वारा निर्धारित नए राजकोषीय नियमों से ही बंधा रहा जाए जो जीडीपी में 0.5 फीसदी फिसलन की ही अनुमति देते हैं। इससे कमजोर वृद्धि के चलते राजस्व में आने वाली कमी से निपटने की गुंजाइश बनेगी। वृद्धि सुस्त पडऩे के मामले में 2019 में चुनौती 2017 और 2018 से काफी अलग थी। भारत की निवेश दर में वृद्धि का सिलसिला कायम नहीं रहा और बचत से बेमेल को दूर किया गया। इसका मतलब यह होना चाहिए था कि अर्थव्यवस्था में ब्याज दरें स्थिर या गिरावट पर हैं लेकिन असल में इसका उलटा हुआ। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने ब्याज दरों में 135 आधार अंकों की कटौती की लेकिन इसका उधारी दरों पर शायद ही असर पड़ा। पूरे साल अर्थव्यवस्था में ब्याज दर फैलाव बढ़ गया। इससे कुछ इतर भी गलत हो रहा था।
 
गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों (एनबीएफसी) में 2018 के उत्तराद्र्ध में संकट गहराने के बाद उनकी बैलेंस शीट की सेहत को लेकर चिंता दिख रही थी। भारत के बैंक एनबीएफसी कंपनियों के लिए प्रमुख कर्जदाता रहे हैं लेकिन अचानक ही वे बांटे गए कर्जों की गुणवत्ता को लेकर सशंकित हो गए जिसका परिणाम यह हुआ कि वे जोखिम से काफी परहेज करने लगे। वृहद-अर्थव्यवस्था के लिए इसका क्या मतलब है? तीन बातें खास हैं। पहला, बैंक अब कर्ज बांटने को उतने तैयार नहीं थे। निवेश के लिए उपलब्ध पूल भी सिकुड़ गया।
 
दूसरा, ब्याज दरों के ऊंचा होने से बचतकर्ता अधिक बचत करने को तरजीह दे सकते हैं। ऐसी स्थिति में बचत बढ़ती है और इससे चालू खाता घाटा भी बढ़ता है। ऐसे में क्या करना चाहिए? निवेश में गिरावट से आयात भी गिरता है जिससे व्यापार संतुलन में सुधार होता है। वास्तव में, चालू खाता घाटा वर्ष 2018 में जीडीपी के 2.1 फीसदी से गिरते हुए सितंबर 2019 में महज 0.9 फीसदी रह गया।
 
तीसरा, जब बैंक उधारी देने में हिचकने लगते हैं तो अधिक मात्रा में बचत विदेश जाने लगती है। इसे दुरुस्त करने का क्या तरीका है? आयात गिरने पर चालू खाता संतुलन में सुधार होता है और गिरावट के समय रुपये में तेजी नहीं चाहने से आरबीआई डॉलर खरीदने लगता है और अपने विदेशी मुद्रा भंडार में जमा करता है। यह भंडार आखिरकार अमेरिकी ट्रेजरी बिल जैसी अंतरराष्ट्रीय परिसंपत्तियों में निवेश किया जाता है।
 
संक्षेप में कहें तो बैंकों के स्तर पर जोखिम से बचने की कवायद घरेलू निवेश को कम कर सकती है जिससे देश की घरेलू बचत विदेश का रुख कर लेगी। सवाल है कि बजट के लिए इसके निहितार्थ क्या हैं?  हमारा मत है कि बजट सरकार को बैंकिंग प्रणाली में जोखिम वंचना कम करने और ऋण वृद्धि में जान फूंकने के लिए कदम उठाने का मौका देता है। असल में, हमारी राय में यह राष्ट्रीय नीति की प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि इससे घरेलू बचत को देश में ही रखने और निवेश के लिए फंड जुटाने एवं आर्थिक वृद्धि बहाल करने में मदद मिलेगी।
 
इस मकसद को हासिल करने के लिए दिवालिया प्रक्रिया को मजबूत करना, रुके हुए निवेश को निर्बाध करना और सार्वजनिक बैंकों पर लागू सरकारी बाध्यताओं में कमी लाने जैसे कदम उठाने होंगे। एनबीएफसी की नियमन व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव और रणनीतिक विनिवेश की रफ्तार तेज करने से भी मदद मिलेगी। असल में, बचत स्थिर होने से कुछ राजकोषीय समझदारी दिखाना और बैंकों के स्तर पर जोखिम वंचना दूर करने के कदम आर्थिक वृद्धि को बहाल करने के लिए सुनहरा मौका हो सकते हैं।
 
(लेखिका एचएसबीसी सिक्योरिटीज ऐंड कैपिटल मार्केट्स इंडिया की मुख्य अर्थशास्त्री हैं)
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