बिजनेस स्टैंडर्ड - बेखौफ फैसले ले सकेंगे बैंकों के प्रमुख
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बेखौफ फैसले ले सकेंगे बैंकों के प्रमुख

सोमेश झा / नई दिल्ली January 28, 2020

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) के प्रबंध निदेशक  (एमडी) और मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (सीईओ) को प्रोत्साहित करने के लिए धोखाधड़ी के लिए बने ढांचे में ढील देने का फैसला किया है, जिससे कि वे भय रहित वाणिज्यिक फैसले ले सकें। वित्त मंत्रालय की ओर से सोमवार को भेजे गए दिशानिर्देशों के मुताबिक 50 करोड़ रुपये से ऊपर की बड़ी राशि वाली धोखाधड़ी के मामले में रिपोर्टिंग या जांच को लेकर एमडी और सीईओ के बजाय सरकारी बैंकों के बोर्ड जिम्मेदार होंगे। 
 
बड़े मूल्य की बैंक धोखाधड़ी की 'पहचान, रिपोर्टिंग व जांच' को लेकर वित्त मंत्रालय ने मई 2015 में एक फ्रेमवर्क भेजा था। रिजर्व बैंक द्वारा तैयार की गई विभिन्न समयसीमा का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए कुल मिलाकर जिम्मेदारी 2015 की अधिसूचना में सरकारी बैंकों के मुख्य कार्यकारियों पर थी। रिजर्व बैंक ने बैंकों के लिए एक समयसीमा तय की थी कि वे बैंक धोखाधड़ी के विभिन्न स्तर पर पुलिस, नियामक और जांच एजेंसियों को सूचना दे सकते हैं। वित्त मंत्रालय ने मंगलवार को एक बयान में कहा, 'वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) ने सरकारी क्षेत्र के कर्जदाताओं के बोर्ड को शक्तियां दे दी हैं, जिससे वे  रिजर्व बैंक और केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की अधिसूचना द्वारा तय समयसीमा के अनुपालन के लिए उचित व्यवस्था बना सकें।' 
 
पंजाब नैशनल बैंक के एमडी और सीईओ रह चुके इंडिनय बैंक्स एसोसिएशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुनील मेहता ने कहा कि बैंक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पर सारी जवाबदेही डाल देने से उन्हें फैसले करने में दिक्कत आती थी। नई  व्यवस्था में सामूहिक दायित्व तय किया गया है क्योंकि बैंक के बोर्ड में भी सरकार व रिजर्व बैंक के प्रतिनिधि होते हैं। उन्होंने कहा कि इससे तेज वाणिज्यिक फैसले किया जाना सुनिश्चित हो सकेगा। इसके अलावा 50 करोड़ रुपये के सभी ऋण खातों में धोखाधड़ी की अनिवार्य जांच, जो गैर निष्पादित संपत्ति (एनपीए) में तब्दील हो गए हैं, के मामले को अब सीवीसी द्वारा गठित समिति को भेज दिए जाएंगे। पिछले साल अगस्त में सीवीसी ने बैंकिंग धोखाधड़ी के सलाहकार बोर्ड (एबीबीएफ) का गठन किया था, जिसके प्रमुख पूर्व सतर्कता आयुक्त टीएम भसीन हैं। यह बोर्ड 50 करोड़ रुपये के ज्यादा के बैंक धोखाधड़ी मामलों की जांच करेगा और आधिकारिक जांच शुरू होने के पहले आवश्यक कार्रवाई की सिफारिश करेगा। 
 
वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'इस कदम से यह सुनिश्चित होगा कि धोखाधड़ी की रिपोर्टिंग साझा दायित्व होगा न कि किसी एक व्यक्ति का दायित्व।' बैंकों को दिए एक अलग दिशानिर्देश में सरकार ने उनसे कहा है कि वे अनुशासन संबंधी और आंतरिक सतर्कता के लंबित मामलों में हुई प्रगति की निगरानी रखने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों के एक दल का गठन करें। सरकारी बैंकों को लंबित मामलों का श्रेणीकरण गंभीरता और मामले की लंबित अवधि के आधार पर करना होगा। वित्त मंत्रालय के अधिकारी ने कहा कि बैंकों से उम्मीद की गई है कि वे समिति गठित करेंगे और उसकी पहली बैठक अगले 10 दिन में होगी। सरकार की ओर से ये कदम बैंकरों की कठिनाइयों को देखते हुए उठाए गए हैं, जो जांच एजेंसियों के डर से वाणिज्यिक फैसले करने में सुस्ती दिखाते थे। सरकार ने इस बार और पहले भी कुछ वर्षों के दौरान जोर दिया है कि वह उचित वाणिज्यिक असफलता और दोष में अंतर करेगी। 
 
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 28 दिसंबर को सरकारकी बैंकों के साथ बैठक के बाद संवाददाताओं से बातचीत में कहा था, 'बीते दिनों में बैंक चिंता के दौर से गुजरे हैं, जब फैसले करने कठिन थे। वे सीबीआई, सीवीसी और सीएजी को लेकर चिंतित रहते थे। यह चिंता थी कि अगर व उचित फैसला करते हैं, तब भी अनावश्यक उत्पीडऩ के शिकार हो सकते हैं।' सीतारमण का यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान के एक दिन के बाद आया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि कर्जदाता बगैर भय के कर्ज को लेकर फैसले करें। 
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