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एमेजॉन को लेकर किसके मन में हैं आशंकाएं?

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  January 28, 2020

उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने एमेजॉन के संस्थापक जेफ बेजोस के भारत में एक अरब डॉलर के निवेश संबंधी बयान पर जो टिप्पणी की उसे उनकी पार्टी के पारंपरिक समर्थक रहे छोटे व्यापारियों और वितरकों को संतुष्ट करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि गोयल ने जिस लहजे और ऊंचे स्वर में अपनी बातें कहीं उनसे उनकी ही सरकार की दो कमियां उजागर हुईं। पहली : सरकार यह समझने में नाकाम है कि कारोबार किस प्रकार काम करते हैं। दूसरी : अर्थव्यवस्था में वृद्धि और रोजगार के अवसरों की कमी।

 
इनमें से पहली अशक्तता तो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के पहले कार्यकाल से ही स्पष्ट है जब 86 प्रतिशत प्रचलित मुद्रा को अचानक बंद कर दिया गया और एक जटिल नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था बिना किसी पूर्व तैयारी के लागू कर दी गई। वर्ष 2016 और 2017 के इन बड़े कदमों को अधिकांश लोग आत्मघाती मानते हैं और यह भी मानते हैं कि इन कदमों ने अर्थव्यवस्था को नीचे खींच दिया। जब गोयल ने दृढ़तापूर्वक यह कहा कि एमेजॉन को भारतीय कारोबार में हुए घाटे की भरपाई करनी चाहिए तब भी उन्होंने अज्ञानता का प्रदर्शन किया। घाटे की भरपाई करना कमजोरी नहीं है। जब तक वे इतने ताकतवर नहीं हों कि घरेलू नियामकीय माहौल में अपने मनमुताबिक बदलाव कर सकें, अधिकांश कंपनियां बाजार हिस्सेदारी मजबूत करने के लिए घाटे को सहन करती हैं। कारोबार ऐसे ही होता है। कोई कारोबार कितने लंबे समय तक ऐसा करना चाहता है यह कई बातों पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए आर्थिक वृद्धि, नीतियों की गुणवत्ता, कारोबारी सुगमता की स्थिति, कंपनी की खुद की सेहत वगैरह। सच तो यह है कि कारोबारी नीति और गलत कारोबारी गतिविधियों के बीच बहुत कम अंतर हो सकता है लेकिन स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा नियामक की मांग इससे जुड़ी हुई है। यहां स्वतंत्र पर जोर है।
 
यह दलील दी जा सकती है कि एमेजॉन करीब सात वर्ष से भारत में है और उसे अब तक मुनाफा कमाना शुरू कर देना चाहिए था। अमेरिका में भी कंपनी को पहली बार मुनाफा हासिल करने में करीब इतना ही वक्त लगा था। ऑनलाइन खुदरा कारोबार की इस शीर्ष कंपनी को अमेरिका में भी खुदरा उद्योग पर तमाम तरह की प्रतिबंधात्मक नीतियों के अधीन ही काम करना पड़ा था। भारत में भी एक के बाद एक सरकारों के कार्यकाल में उसे ऐसा ही झेलना पड़ा है। अगर हम बीते 14 वर्ष में बार बार हुए नीतिगत बदलाव की बात करें तो उसमें ही इस आलेख का ढेर सारा स्थान चला जाएगा।
 
बेजोस से मुलाकात नहीं करने का निर्णय पूरी तरह गोयल के अधिकार में आता है। बेजोस के अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ने लगातार मोदी सरकार की नागरिकता नीति की आलोचना की है। इसमें दो राय नहीं कि बेजोस को केवल इसलिए उपकृत नहीं किया जाना चाहिए कि वह भारतीय उपभोक्ताओं की बदौलत अमीर होना चाहते हैं। इस लिहाज से देखें तो उनका यह कहना सही है कि बेजोस भारत पर कोई अहसान नहीं कर रहे हैं। परंतु यदि गोयल यह सब नहीं कहते तो कहीं अधिक बेहतर होता। दरअसल उन्होंने अपनी बातों से वैश्विक निवेशक समुदाय को हतोत्साहित किया है। वैश्विक निवेशक बढ़ते संरक्षणवाद के बावजूद भारतीय बाजार को आशा भरी नजरों से देखते हैं।
 
यह दलील भी दी गई कि गोयल का छोटे कारोबारी समुदाय का बचाव करना उचित है क्योंकि बहुराष्ट्रीय ऑनलाइन प्रतिस्पर्धा में उनका परास्त होना तय है। औद्योगिक क्रांति के बाद से ही विसंगतिपूर्ण प्रौद्योगिकी ने पारंपरिक बाजारों को नुकसान पहुंचाया है। पश्चिमी देशों में भी बड़े खुदरा कारोबारियों के कारण छोटे खुदरा कारोबारियों का कामकाज प्रभावित हो रहा है। इसी तरह ऑनलाइन खुदरा कारोबारी खुदरा दुकानों और प्रतिष्ठानों को प्रभावित कर रहे हैं। कोई बदलाव बिना कष्ट के नहीं होता है लेकिन आर्थिक विस्तार आमतौर पर समय के साथ समायोजन कर लेता है।
 
छोटे कारोबारियों और खुदरा विक्रेताओं के लिए बदलाव की प्रक्रिया उस समय कम दिक्कतदेह होती जब अर्थव्यवस्था कहीं अधिक तेज गति से विकसित हो रही होती। उस स्थिति में छोटे खुदरा कारोबारों से आजीविका कमाने वाले दबाव बनने पर वैकल्पिक रोजगार तलाश लेते। चूंकि ऐसा नहीं हो रहा है और सामाजिक सुरक्षा ढांचा भी उपलब्ध नहीं है इसलिए छोटे कारोबारियों के पास लॉबीइंग की अपनी शक्ति का प्रयोग करने के अलावा अन्य उपाय नहीं। अभी भी अहम राज्य चुनाव के पहले राजनीतिक आधार को मनाना पड़ता है। 
 
इस तरह देखें तो सरकार को देश के विनिर्माण जगत में रोबोट के बढ़ते इस्तेमाल पर भी दुख ही जताना चाहिए क्योंकि वे भी आईटीआई तथा अन्य प्रौद्योगिकी संस्थानों से पढ़कर निकल रहे युवाओं के रोजगार को नुकसान पहुंचा रहे हैं। कुल मिलाकर सबक यह है कि कारोबार की निर्मम दुनिया में और तकनीकी उथलपुथल के दौर में, जैसा कि गोयल ने कहा कोई किसी के प्रति अहसान नहीं करता। परंतु सरकार का काम है ऐसे बदलावों से अधिकाधिक लाभ हासिल करने के तरीके निकालना।
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