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वर्ष 2008 का प्रोत्साहन पैकेज दिखाएगा सही राह

अजय शंकर /  January 28, 2020

भारतीय अर्थव्यवस्था में फिर से तेजी लाने के लिए प्रोत्साहन उपायों की जरूरत है। इसमें 2008 पैकेज से सीखे गए सबक काफी मददगार हो सकते हैं। बता रहे हैं अजय शंकर

 
जब सितंबर 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट ने दस्तक दी थी तो भारत 8.9 फीसदी की औसत वार्षिक दर से वृद्धि कर रहा था। शुरुआती दौर में एक तरह का संतुष्टि भाव था कि भारत इस संकट से अछूता बना रहेगा क्योंकि यह सजग रहा है और उसने अपनी वित्तीय प्रणाली को नियंत्रण-मुक्त नहीं किया है। उस समय अमेरिका में वित्तीय संकट का सबब बनने वाले उच्च जोखिम-युक्त वित्तीय उत्पादों का ऋण-जोखिम नहीं था। लिहाजा, भारतीय अर्थव्यवस्था में आई तीव्र गिरावट एक झटके की तरह आई। वैश्विक वित्तीय प्रणाली के साथ भारत का एकीकरण असल में अनुमान से अधिक बड़ा हो गया था। इसका नतीजा यह हुआ कि नवंबर का महीना आने तक संकट आ चुका था। सरकार ने तेजी से कदम उठाते हुए 6 दिसंबर, 2008 को एक बड़ा प्रोत्साहन पैकेज घोषित कर दिया और उसके बाद दो पूरक पैकेज भी लाए गए। यह उपाय अधिकतर प्रेक्षकों के अनुमान से कहीं अधिक तेजी से प्रभावी साबित हुआ। वित्त वर्ष 2008-09 की आखिरी दो तिमाहियों में करीब 5.5 फीसदी पर आ चुकी वृद्धि दर 2009-10 की पहली तिमाही में ही सुधार की राह पर चल पड़ी। इसका परिणाम यह हुआ कि वित्त वर्ष 2010 खत्म होने तक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) दर फिर से 8.6 फीसदी के स्तर पर आ चुकी थी।
 
प्रोत्साहन पैकेज को इस सटीक आकलन के साथ पेश किया गया था कि वैश्विक वित्तीय संकट के बाह्य झटके से अर्थव्यवस्था में बेतहाशा गिरावट हुई थी और उस पर काबू पाने के लिए तात्कालिक एवं सशक्त प्रोत्साहन उपायों की जरूरत थी। इस पैकेज के घटक अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों से प्रतिनिधियों से गंभीर विचार-विमर्श के बाद तय किए गए थे। इसमें मौद्रिक सुगमता और राजकोषीय उपाय दोनों का ही मेल था। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने सरकार के साथ नजदीकी तालमेल बनाकर काम किया। अमूमन राजकोषीय घाटे में कमी की वकालत करने वाले अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) ने उस समय दुनिया भर में अपने प्रतिनिधि भेजकर मंदी पर काबू पाने के लिए राजकोषीय उपाय किए जाने की सलाह दी थी। सामान्य तौर पर आरबीआई नीतिगत ब्याज दरों में एक साथ 25 आधार अंकों का ही बदलाव करता है। लेकिन उस समय मजबूत प्रोत्साहन उपाय की जरूरत देखते हुए आरबीआई ने इस परंपरा से अलग हटते हुए रीपो दर में एक साथ 100 आधार अंकों की कमी कर दी थी। सितंबर 2008 के बाद वह लगातार रीपो दर में कमी करते हुए इसे नौ फीसदी से 5.5 फीसदी तक ले आया। इसी तरह नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) भी नौ फीसदी से घटते हुए पांच फीसदी पर लाया गया। इस मौद्रिक उपाय से अर्थव्यवस्था में करीब चार लाख करोड़ रुपये आ गए। परिणाम यह हुआ कि वित्तीय प्रणाली में तरलता कोई समस्या ही नहीं रही।
 
राजकोषीय मोर्चे पर सीमा शुल्क में चार फीसदी तक की कटौती कर दी गई। मकसद यह था कि मांग में तेजी आए। वेतन आयोग की अनुशंसाएं लागू होने से भी देश भर के सरकारी कर्मचारियों की क्रय शक्ति में जबरदस्त उछाल आई। इन कर्मचारियों को बढ़े वेतन का बकाया भुगतान भी मिला था। यह पैसा खर्च होने से उपभोग बढ़ाने में मदद मिली। ढांचागत क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की चाहत से परहेज किया गया। यह स्वीकार किया गया कि बड़ी ढांचागत परियोजनाओं को मंजूरी से लेकर क्रियान्वयन स्तर तक पहुंचने में समय लगता है क्योंकि भूमि अधिग्रहण, बोलियां आमंत्रित करने और फिर ठेका देने में वक्त लगता है। परियोजना पर वास्तविक व्यय एक साल के बाद ही होता है। संकट की व्यापकता को देखते हुए अतिरिक्त व्यय को तत्काल अंजाम दिए जाने की जरूरत थी ताकि घरेलू उत्पादों एवं सेवाओं की मांग बढ़ सके। उस साल के योजनागत व्यय में 20,000 करोड़ रुपये की वृद्धि का भी इंतजाम किया गया। 
 
पहले से चल रहे उन कार्यक्रमों को चिह्निïत किया गया जो इस अतिरिक्त व्यय को फौरन आत्मसात कर सकते थे। तय ढर्रे से अलग सोच अपारंपरिक उपायों तक ले गई। मसलन, शहरी इलाकों में बस सेवाओं को मजबूत बनाने के लिए जेएनएनयूआरएम के तहत बसों की खरीद पर अनुदान दिए गए। निर्यात को दो फीसदी की ब्याज मदद दी गई थी। छोटी इकाइयों और आवासीय क्षेत्र को भी कुछ विशेष रियायतें दी गई। मार्च 2009 में आम चुनावों की घोषणा होने के पहले उन कदमों को चिह्निïत कर लिया गया था जिनसे आचार संहिता का उल्लंघन न होता हो। चालू योजनाओं पर अतिरिक्त व्यय का प्रावधान किसी प्रचार के बगैर किया गया। इसके लिए चुनाव आयोग के साथ करीबी सामंजस्य में काम करने और जरूरी मंजूरी हासिल करने की जरूरत थी।
 
प्रोत्साहन पैकेज के नतीजे के तौर पर बढ़े हुए राजकोषीय घाटे की संकल्पना की गई थी। लेकिन यह सीमित अवधि के लिए होना था। वर्ष 2007-08 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का केवल 2.6 फीसदी ही था। वर्ष 2008-09 में यह 6.1 फीसदी तक उछल गया। वर्ष 2009-10 के अंत तक आर्थिक वृद्धि के पिछले स्तर तक लौट आने के बाद राजकोषीय घाटे में गिरावट के प्रोत्साहन-पूर्व स्तर तक लाने को प्राथमिकता देनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वर्ष 2011-12 में यह 2010-11 के 4.9 फीसदी से अनावश्यक रूप से बढ़ते हुए 5.9 फीसदी पर पहुंच गया। राजनीतिक अर्थव्यवस्था राजकोषीय घाटे में बढ़ोतरी को आसान बनाती है लेकिन इसे कम कर पाना मुश्किल है।
 
बहरहाल मौजूदा स्थिति गुणवत्ता के लिहाज से अलग और काफी चुनौतीपूर्ण है। लगातार गिरावट का रुख रहने से राजस्व में कमी और घाटे में वृद्धि हो रही है जिससे राजकोषीय प्रोत्साहन पैकेज की गुंजाइश भी कम होती जा रही है। वित्तीय क्षेत्र को स्वस्थ बनाने का काम अब भी जारी है। सरकार को आईएलऐंडएफएस का प्रबंधन अपने हाथों में लेकर उसे बचाने की कोशिश कहीं बेहतर विकल्प होता क्योंकि इससे गैर-बैंकिंग वित्त कंपनी (एनबीएफसी) के क्षेत्र में बने संकट से बचा जा सकता था। पहले यूटीआई संकट के समय ऐसा किया भी जा चुका था। निजी क्षेत्र की रुकी पड़ी बिजली परियोजनाओं और कोयला क्षेत्र के लिए अगर अधिक मजबूत समाधान किया गया होता तो बैंकों पर बोझ कम होता। 
 
इसी तरह सरकार को स्थगित आवासीय परियोजनाओं के लिए फंड देने का काम काफी पहले करना चाहिए था। इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी हार्डवेयर और सौर ऊर्जा में विनिर्माण गतिविधियों को जारी रख पाने की नाकामी के चलते बढ़ती मांग को आयात के जरिये पूरा किया जा रहा है। इसके अलावा वास्तविक विनिमय दर में आई 19 फीसदी की तेजी अपने आप में ही ठहराव और उसके बाद गिरावट लाने के लिए काफी होती। हालांकि 2008-09 के प्रोत्साहन पैकेज से मिले कुछ सबक मौजूदा समय के लिए भी प्रासंगिक हो सकते हैं। पहली बात यह है कि हमें समूची आर्थिक स्थिति के प्रति एक समग्र नजरिया रखना होगा और विभिन्न उपायों को लागू करते समय उनके लिए जरूरी न्यूनतम राशि का प्रबंध रखना होगा ताकि जल्द असर दिखाने की संभावना बढ़े। वांछित परिणाम हासिल करने के लिए उठाए गए कदमों को प्रभावी बनाने पर ध्यान देना होगा। इसके साथ ही दखल के लिए माकूल वक्त का अंदाजा लगाना भी अहम है। कोई भी आदर्श समाधान नहीं होता है लिहाजा अप्रत्याशित कदमों एवं जोखिम के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
 
(लेखक औद्योगिक नीति एवं संवद्र्धन विभाग के पूर्व सचिव हैं)
Keyword: india, economy, GDP, growth,,
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