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आधुनिक मुस्लिम शख्स की सियासी दुविधा की मिसाल

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  January 24, 2020

केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने एक टेलीविजन कार्यक्रम में ऐंकर राजदीप सरदेसाई से कहा कि वह 'हिंदू' और 'मुस्लिम' जैसे शब्दों का इस्तेमाल न करें। खान ने कहा, 'आपको नहीं मालूम कि ये शब्द कितना नुकसान कर सकते हैं?' कई लोगों के लिए खान का यह बयान काफी मजेदार था। खुद खान ने इन दोनों शब्दों के इस्तेमाल से अपना खूब भला किया है। आइए, खान की राजनीति के संक्षिप्त इतिहास पर नजर डालते हैं। वह राजीव गांधी सरकार में ऊर्जा मंत्री थे जब 1986 में शाहबानो मामला उछला। तब खान ने अपनी पार्टी से इस्लामी कानून को परिभाषित करने की मांग रखते हुए कहा कि रूढिय़ों के बजाय सरकार को मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में आया सर्वोच्च न्यायालय का फैसला मान लेना चाहिए। लेकिन कांग्रेस इस मसले पर दबाव में आ गई तो खान ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया और वह मुस्लिम महिला अधिकारों के योद्धा के तौर पर मशहूर हो गए। 

 
जब 1987 में वी पी सिंह ने जनमोर्चा बनाया तो खान अगली कतार में मौजूद थे। बाद में वी पी सिंह के प्रधानमंत्री बनने पर वह उनके मंत्रिमंडल में ऊर्जा मंत्री भी रहे। उन्होंने सेंट किट्स धोखाधड़ी मामले में गवाही भी दी थी। उनके बयान की ही वजह से चंद्रास्वामी के इर्दगिर्द घेरा कसता गया। चंद्रास्वामी पर वी पी सिंह की छवि खराब करने के लिए फर्जी कागजात तैयार करने का आरोप लगा था। वीपी सरकार गिरने के बाद उन्होंने थोड़ा इंतजार किया और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में शामिल हो गए। इसके पहले उन्होंने जैन आयोग के सामने यह दावा किया कि वीपी सरकार के समय राजीव की सुरक्षा के सवाल पर मंत्रिमंडल में कोई चर्चा ही नहीं हुई थी। हालांकि वी पी सिंह ने खान के इस दावे को यह कहते हुए नकार दिया था कि 'उनकी याद्दाश्त साथ नहीं दे रही है'। इसके बावजूद खान के लिए कांग्रेस के दरवाजे बंद ही रहे क्योंकि वहां पहले से ही तमाम मुस्लिम नेता मौजूद थे। 
 
ऐसे में आरिफ मोहम्म्द खान ने बसपा के साथ जाने के बारे में सोचा। क्या यह मुस्लिम राजनीति का एक रास्ता नहीं हो सकता था? उन्होंने इसे भी आजमाया लेकिन जब बसपा ने उत्तर प्रदेश में भाजपा के समर्थन से सरकार बनाने का फैसला किया तो उन्होंने पार्टी छोड़ दी। उस समय उनकी दलील यह थी कि वह खुद को एक खरीद-बिक्री वाले सामान की तरह नहीं देखा जाना चाहते। हालांकि खान ने वर्ष 2004 में भाजपा का दामन थाम लिया। उन्होंने यह कहते हुए इसे जायज ठहराया था कि कांग्रेस भी किसी और पार्टी जितनी ही सांप्रदायिक है। खान ने कहा था कि गुजरात दंगों के बाद उन्होंने और राम विलास पासवान ने गुजरात में सांप्रदायिक ताकतों से मुकाबले के लिए कांग्रेस से कुछ सीटें मांगी थीं लेकिन कांग्रेस ने एक भी सीट देने से मना कर दिया। 
 
बहरहाल खान ने 2004 में भाजपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा और हार गए। फिर 2007 में उन्होंने भाजपा का साथ छोड़ दिया और एक तरह की लंबी शीत-निद्रा में चले गए। गत वर्ष सितंबर में केरल का राज्यपाल बनकर वह फिर से चर्चा में आए। उनके हिसाब से भाजपा को समर्थन देने का कारण यह है कि भाजपा इस्लामी कट्टरपंथ से लड़ रही है और ऐसा करने वाले किसी भी समूह को मजबूत बनाना चाहिए। लेकिन हिंदू राष्ट्र पर उनके विचार कभी भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं रहे हैं। हाल ही में एक साक्षात्कार में खान ने अनुच्छेद 370 पर सरकार के कदम का समर्थन करते हुए कहा कि वह किसी भी राज्य को विशेष शक्तियां देने के खिलाफ हैं। लेकिन उन्होंने 'राज्यों को अधिक संघीय शक्तियां' दिए जाने की वकालत भी की।
 
खान की दुविधा असल में भारत में मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व की दुविधा है। कांग्रेस में सक्रिय किसी आधुनिक मुस्लिम के सामने यह जोखिम है कि कहीं वह प्रतीक न बनकर रह जाए। इसी तरह बसपा से जुड़े मुस्लिम के सामने यह खतरा है कि वह पार्टी की एकमात्र नेता की सनक पूरा करने वाले वोट बैंक का हिस्सा न बनकर रह जाए। वहीं भाजपा में शामिल एक आधुनिक मुस्लिम को बेहतर रूप में 'समझ पाने में नाकाम' शख्स और बुरी स्थिति में संदेह की नजर से देखा जाता है। ऐसे में एक मुस्लिम शख्स राजनीति में क्या करे? वह किधर जाए? 
 
खान और उनके जैसे कई दूसरे लोगों को भी कुछ समय तक यह सवाल परेशान करता रहा कि मुस्लिम समुदाय की तरफ से उठाई जा रही कोई भी पहल आखिरकार रूढि़वादियों को ही क्यों मजबूत बना देती है? सर सैयद अहमद खान और मौलाना अबुल कलाम आजाद को भी ऐसे ही हालात का सामना करना पड़ा था। मुस्लिमों के लिए आधुनिक पश्चिमी शिक्षा के पैरोकार सर सैयद को कांग्रेस का एक एक तबका ब्रिटिश शासकों के प्रति 'निष्ठा' के चलते शक की निगाह से देखता था। वहीं मुस्लिम समुदाय के रूढि़वादी लोग भी इस्लाम के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल उठाते थे। मौलाना आजाद भारतीय इतिहास की एक और विडंबना को बयां करते थे। पूरी तरह इस्लामी ढंग से शिक्षित होने के बावजूद वह राष्ट्रवाद का एक धर्मनिरपेक्ष नजरिया रखते थे। वहीं उनके राजनीतिक विरोधी मोहम्मद अली जिन्ना एक ऐसे आधुनिकतावादी थे जिनका पालन-पोषण नगण्य धार्मिक तरीके से हुआ था लेकिन बाद में वह विशुद्ध राजनीतिक कारणों से मुस्लिमों के लिए एक अलग देश की मांग करने वाले शख्स बन गए। आजाद ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा इसलिए दिया था कि पार्टी मुस्लिम लीग के साथ खाई को पाट सके और विभाजन के आसन्न खतरे से होने वाला नुकसान कम हो सके। हालांकि आजाद को अपने उदार राजनीतिक विचारों की कीमत चुकानी पड़ी क्योंकि कांग्रेस ने खरगोश के साथ दौडऩे और शिकारी कुत्तों के साथ शिकार करने की कोशिश की। आरिफ मोहम्मद खान भारत का आदर्श आधुनिक मुस्लिम नेता बनना चाहते थे लेकिन वह महज केरल का राज्यपाल ही बन पाए।
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