बिजनेस स्टैंडर्ड - आम बजट से क्या है निवेशकों की उम्मीद
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आम बजट से क्या है निवेशकों की उम्मीद

आकाश प्रकाश /  January 23, 2020

आगामी बजट में इस बात की असली परीक्षा होगी कि केंद्र सरकार सुधारों को लेकर किस कदर गंभीर है। इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाल रहे हैं आकाश प्रकाश

 
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी को संभवत: इस सरकार का अब तक का सबसे महत्त्वपूर्ण बजट पेश करेंगी। निवेशक बहुत बारीकी से बजट भाषण और बजट दस्तावेज को देखेंगे कि क्या मंदी से निपटने और उससे आगे की राह का कोई संकेत मिलता है। निवेशक एक सुसंगत आर्थिक योजना देखने को उत्सुक हैं। वैश्विक निवेशक इस बात पर सहमत हैं कि कारोबारी माहौल में सुधार के गंभीर प्रयास का वक्त आ गया है। अगर अभी बड़े सुधार के प्रयास नहीं दिखे तो आर्थिक कमजोरी के कारण भारी बहुमत होते हुए भी भविष्य में कुछ महत्त्वपूर्ण नहीं हो पाएगा।
 
कुछ बातें स्पष्टï हैं। राजकोषीय फिसलन काफी होगी। अधिकांश निवेशकों को उम्मीद है कि राजकोषीय फिसलन 3.3 फीसदी के तय लक्ष्य की जगह जीडीपी के 3.7 से 3.8 फीसदी तक रहेगी। कम नॉमिनल जीडीपी के कारण 11 आधार अंकों की कमी आई और यह 3.3 फीसदी से बढ़कर 3.41 फीसदी हुआ। हालात को देखते हुए इस पर 30 से 40 आधार अंकों की फिसलन सहज स्वीकार्य होगी। निवेशक चाहेंगे कि इस राजकोषीय गुंजाइश का इस्तेमाल पूंजीगत व्यय के लिए हो। हालांकि उन्हें उम्मीद होगी कि आगे चलकर यह पटरी पर आ जाएगा और वे 2021 के लिए 3.3 से 3.5 फीसदी के लक्ष्य की अपेक्षा करेंगे। निकट भविष्य में किसी को इसके 3 फीसदी रहने की उम्मीद नहीं है। 
 
राजकोषीय मोर्चे पर सीमित गुंजाइश और मौद्रिक नीति की बाधाओं को देखते हुए अब वास्तविक सुधारों का वक्त आ गया है। वित्त मंत्री अगर क्षेत्रवार तरीके से आगे बढ़ें और निवेश और निर्यात बढ़ाने के लिए आवश्यक नीतिगत बदलाव करें तो बेहतर होगा। वैश्विक निवेशकों के लिए इक्विटी पर दीर्घावधि का पूंजीगत लाभ (एलटीसीजी) कर एक अहम बात हो सकता है। एलटीसीजी से ज्यादा राजस्व नहीं मिला है और प्रशासनिक रूप से इसने वैश्विक फंडों के लिए कठिनाई पैदा की है। लंबी अवधि के कई निवेशक (एंडोवमेंट, सॉवरिन वेल्थ और फाउंडेशन) अपने गृह क्षेत्र में कोई कर नहीं चुकाते और भारत में कर चुकाना उन्हें अलग-थलग करना लगता है।
 
पूंजीगत लाभ कर को पूरी तरह खत्म करना व्यवहार्य नहीं होगा लेकिन कम से कम दीर्घावधि के पूंजीगत लाभ को रियायत दी जा सकती है। इससे भारतीय वित्तीय बाजारों में निवेश पर अनुमानित कर पश्चात प्रतिफल बढ़ेगा और कंपनियों के लिए पूंजी की लागत कम होगी। इक्विटी के लिए इसकी भरपाई प्रतिभूति लेनदेन कर में मामूली इजाफा करके की जा सकती है। इससे वैश्विक पूंजी प्रदाताओं में सकारात्मक संदेश जाएगा। बजट में एक और कदम पुराने वाहनों को खत्म करने की योजना को फंड करने का होना चाहिए। 15 साल से पुराने किसी भी वाणिज्यिक वाहन को कबाड़ में बेचने के लिए प्रोत्साहन मिलना चाहिए। इससे करदाताओं पर 10,000 से 15,000 करोड़ रुपये से अधिक का बोझ नहीं पड़ेगा बल्कि वाहन उद्योग को काफी गति मिलेगी। प्रदूषण में काफी कमी आएगी और वाणिज्यिक वाहनों की ईंधन किफायत सुधरेगी। यह सबके लिए लाभप्रद होगा। 
 
वाहन उद्योग बहुत बड़ा रोजगार प्रदाता है और यह अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अहम है। फिलहाल इस उद्योग की हालत खस्ता है और कबाड़ संबंधी योजना इसकी बहुत मदद करेगी। ऐसी योजनाओं को दुनिया भर में सराहना मिलती रही है। खासतौर पर वित्तीय संकट के दौर में ये कारगर साबित हुई हैं। भारत भी इसे अपना सकता है। पैसे की कमी इकलौती बाधा हो सकती है लेकिन इसे अपनाया जाना चाहिए। स्टार्टअप को लेकर सरकार के रुख पर भी नजर रखनी होगी। हमारे पास स्टार्टअप को लेकर अच्छी योजना और धनराशि है। सरकार ने स्टार्टअप को प्रोत्साहित करने के लिए काफी कुछ किया है। उसने उनकी महत्ता को पहचाना है। उन्हें यह इजाजत होनी चाहिए कि वे 15 वर्ष तक नुकसान वहन कर सकें। फिलहाल यह इजाजत आठ वर्ष तक की है। काफी संभव है कि मुनाफा कमाने के पहले वे लंबे समय तक नुकसान में रहें। अगर उन्हें घाटे को आगे बढ़ाने की इजाजत दी जाती है तो नकदी प्रवाह और शुद्घ मार्जिन में सुधार होगा। स्टार्टअप को कंपनी अधिनियम की धारा 42 से निजात भी दी जा सकती है। जबकि चुनिंदा परिस्थितियों में इन स्टार्टअप को डीम्ड सरकारी कंपनी भी माना जा सकता है।
 
बीते कुछ वर्ष के दौरान निर्यात के मोर्चे पर काफी निराशा हाथ लगी है। घरेलू मांग में सुधार के बीच निर्यात वैश्विक मांग से लाभान्वित होने केा बेहतर जरिया होगा। इसका असर निवेश पर भी पड़ेगा। व्यापक प्रोत्साहन पैकेज और नीतियां निवेश प्रतिस्पर्धा में सुधार कर सकती हैं। दूरसंचार और बिजली क्षेत्र की बात करें तो हमें उद्योग आधारित हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है। दूरसंचार में सरकार को बीच का रास्ता तलाश करना होगा और उद्योग जगत को इस समायोजित सकल राजस्व की समस्या से निजात दिलानी होगी। 
 
बिजली क्षेत्र में सरकारी बिजली बोर्ड दिवालिया हैं। उदय योजना नाकाम साबित हुई है। कोई भी व्यक्ति ऐसे क्षेत्र में क्यों निवेश करेगा जहां प्रमुख प्रतिपक्ष ही दिवालिया हो। राज्य बिजली बोर्ड पर निजी बिजली कंपनियों का बकाया बढ़कर 46,000 करोड़ रुपये हो चुका है। प्रत्यक्ष कर की बात करें तो उम्मीद है कि दरों में कटौती देखने को मिलेगी। हालांकि कुछ रियायतों को तार्किक बनाने और दरों को आंशिक रूप से संतुलित किए जाने की अपेक्षा की जा सकती है। विनिवेश के मोर्चे पर 2020 के लक्ष्य हासिल नहीं होंगे लेकिन 2021 में बीपीसीएल, कॉनकॉर और एयर इंडिया की मदद से बेहतर परिणाम मिलेंगे। इसके बाद सरकार को टाटा कम्युनिकेशंस और हिंदुस्तान जिंक तथा अन्य कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचनी चाहिए। इन दोनों कंपनियों के रोजमर्रा के काम में सरकार शामिल ही नहीं है तो हिस्सेदारी रखने का क्या लाभ?
 
सरकार को अन्य सरकारी उपक्रमों की सूची बनाकर देखना चाहिए कि उनसे कितनी राशि हासिल की जा सकती है। एनएमडीसी इसका स्पष्टï उदाहरण है। हेमिस्फेयर प्रॉपर्टीज लिमिटेड एक और उदाहरण है। उसके पास हजारों करोड़ की जमीन है और इसका मुद्रीकरण होना चाहिए। भारतीय जीवन बीमा निगम सबसे मूल्यवान सरकारी संपत्ति है। उसने निजी क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा को भी बहुत अच्छी तरह संभाला। क्या सरकार एलआईसी को सूची में शामिल करेगी? एलआईसी के मामले में सरकार को नियंत्रण अपने पास रखकर आंशिक हिस्सेदारी बेचनी चाहिए। 
 
बजट में कई अन्य क्षेत्रवार घोषणाएं की जा सकती हैं। अचल संपत्ति और एनबीएफसी पर ध्यान दिया जा सकता है। बजट ऐसा होना चाहिए जो देश की अर्थव्यवस्था में भरोसा बहाल करे और निवेशकों तथा देश के उद्यमी जगत को आश्वस्त करे। उन्हें भरोसा हो जाना चाहिए कि सुधार सरकार की प्राथमिकता में हैं। 
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