बिजनेस स्टैंडर्ड - चीन के खिलाफ दौड़ में बिजली उपकरण बनाने वाले चाहते हैं सरकार की मदद
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चीन के खिलाफ दौड़ में बिजली उपकरण बनाने वाले चाहते हैं सरकार की मदद

श्रेया जय और शुभायन चक्रवर्ती / नई दिल्ली January 22, 2020

एक भारतीय विद्युत उपकरण निर्माता को निविदा के सारे दस्तावेजों और संबंधित नियमों, कानूनों और विनियमों को मंदारिन से अंग्रेजी में अनुवाद करने में छह महीने का वक्त लग गया। यह कंपनी स्टेट ग्रिड कॉर्पोरेशन लिमिटेड ऑफ चाइना की ओर से जारी की गई निविदा में भाग ले रही थी। यह निविदा बिजली पारेषण परियोजना के लिए विद्युत उपकरण की आपूर्ति के लिए जारी की गई थी। उक्त कंपनी के वरिष्ठ कार्यकारी ने कहा, 'इस प्रक्रिया में हमें महसूस हुआ कि कोई भी शर्त हमारी भागीदारी के पक्ष में नहीं था। निविदा की अनूदित प्रति की हमारी मांग को पूरी तरह से अनसुना कर दिया गया। उसके बाद तो बस रुकावटे ही थीं। यदि किसी एक श्रेणी में हम पात्र थे तो उसकी उप श्रेणी की शर्त को पूरा नहीं कर पा रहे थे। चीन के बाजार में भारतीय कंपनियों के प्रवेश को रोकने के लिए ही इस तरह से नियमों का जाल बुना गया था जबकि वे हमारे बाजार में लगातार बहुतायत में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।' 
 
ऐसे समय पर जब वैश्विक व्यापार वृद्घि सुस्त पड़ी है, भारत से निर्यात को बाधित किया जा रहा है। इसके लिए कड़े सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी नियमों, कड़े मानकों, लेबलिंग जरूरतों और प्रमुख बाजारों में आयात नियंत्रणों का सहारा लिया जा रहा है। निर्यातकों की ओर से मिल रही अंतहीन शिकायतों को निपटाने के साथ ही केंद्रीय वाणिज्य विभाग ने औद्योगिक निकायों से किसी उत्पाद की समूची मूल्य शृंखला द्वारा झेली जा रही समस्याओं का पता लगाने को कहा है जिसमें इन्वर्टेट ड्यूटी, मूल्य गिराने या अनुचित छूट देने जैसी बातें भी शामिल हैं। 
 
इसके जवाब में बिजली उद्योग की प्रतिनिधि संस्था इंडियन इलेक्ट्रिकल ऐंड इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन (आईईईएमए) ने पीयूष गोयल की अगुआई वाले विभाग को एक नोट सौंपा है जिसमें निर्यात किए जाने वाले देशों में विद्युत उद्योग की ओर से गैर-शुल्क रुकावटों की चर्चा की गई है। उद्योग ने सबसे अधिक शिकायत चीन के खिलाफ की है जहां निर्यात सर्वाधिक है। बिजनेस स्टैंडर्ड ने इस नोट और स्टेट ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ चाइना की ओर से जारी की गई निविदा की समीक्षा की है।
 
घरेलू उद्योग की ओर से चिंता ऐसे समय पर जताई गई है जब विद्युत, अक्षय ऊर्जा और बिजली उपकरण क्षेत्र में चीनी आयातों से भारतीय बाजार अटे पड़े हैं। भारतीय निर्माताओं ने चीन से बढ़ते आयातों के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई है क्योंकि भारत में नियमों जो ढील दी जा रही है वे उसका समाधान चाहते हैं। चीन के निर्यातकों को तरजीही निविदाओं के रूप में पूर्ण समर्थन मिलता है, भारतीय कंपनियों ने भी भारत में इसी तरह की व्यवस्था करने की मांग की है। भारतीय विद्युत उद्योग का बाजार 2.08 लाख करोड़ रुपये का अनुमानित है। 2018-19 में भारतीय इलेक्ट्रिकल उपकरणों का निर्यात 21,235 करोड़ रुपये का रहा था। यह निर्यात प्रमुख तौर पर चीन जापान, कोरिया और विभिन्न यूरोपीय देशों को किया गया था। निर्यात किए जाने वाले यूरोपीय देशों में जर्मनी, फ्रांस, इटली शामिल थे। इसके अलावा अमेरिका और रूस को भी निर्यात किया गया था। इसके उलट चीन इलेक्ट्रिकल मशीनों का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है। 2016 में इलेक्ट्रिकल उपकरणों के कुल वैश्विक निर्यात में चीनी की हिस्सेदारी 20 फीसदी से अधिक रही थी।  
 
आईईईएमए ने चीन की सरकारी बिजली कंपनियों की ओर से उपकरणों की खरीद के लिए जारी किए गए निविदा से जुड़ी समस्याओं की सूची तैयारी की है। उनकी निविदा हमेशा ही मंदारिन भाषा में होती है और अनुरोध करने के बावजूद अंग्रेजी में उसकी प्रति मुहैया नहीं कराई जाती। उद्योग के एक कार्यकारी ने कहा, 'मंदारिन भाषा होने के कारण हमें उसे पढऩे और उसकी शर्तों को समझने में मुश्किल होती है। ऊपर से उनकी शर्तें इतनी जटिल होती हैं कि भारतीय कंपनियों के लिए उसमें भागीदारी कर पाना मुश्किल हो जाता है।' 
 
निविदा के विशेष विवरण में कहा गया है कि इसमें शामिल होने वाली कंपनियां कानूनी तौर पर चीन में पंजीकृत होनी चाहिए। किसी चीनी कंपनी के साथ संयुक्त उद्यम या किसी एजेंसी निविदाकार के जरिये दाखिल की जाने वाली बोली स्वीकार नहीं की जाएगी। हालांकि, आईईईएमए ने संकेत दिया है कि यह भारत और दूसरे देशों में सामान्य बात है जिसे भारत के बाजारों में आने वाली कंपनियों के लिए तैयार किया जाता है। चीन के साथ व्यापार पर काम करने वाले एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, '2000 में विश्व व्यापार संगठन में शामिल होने के बाद चीन को निर्यात किए जाने वाले सामानों में इलेक्ट्रिकल मशीनों का शुरुआती प्रोत्साहन मिला। इसके परिणामस्वरूप इस क्षेत्र की कंपनियों को अपने संबंधित सरकारों की ओर से कर में छूट और राजनीतिक संरक्षण जैसे विशेष सुविधाएं दी गईं।'  
 
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और कारोबार विशेषज्ञ विश्वजित धर ने कहा, 'इसकी संभावना बनी हुई है कि चीन की ओर से और गैर शुल्क बाधाएं लगाई जाएं क्योंकि क्षेत्रीय समग्र आर्थिक साझेदारी समझौता नहीं हो पाया है। इस बड़े कारोबारी समझौते से चीन को भारत के बाजार में ज्यादा पहुंच का मौका मिलता।'  उन्होंने कहा कि अब संभवत: चीन अपने बाजार की रक्षा करने के साथ भारत को संदेश भेज रहा है। चीन में विदेशी विनिर्माताओं से यह भी उम्मीद की जा रही है कि वे अनिवार्य रूप से चीन से गुणवत्ता प्रमाणपत्र लें। उद्योग के अधिकारियों ने कहा कि 90 प्रतिशत उपकरणों के मामले में यह असंभव कवायद है क्योंकि उन्हें भौतिक रूप से चीन नहीं लाया जा सकता। नोट मेंं कहा गया है, 'भाषाई व्यवधान, थकाऊ प्रक्रिया, लंबी अवधि और ज्यादा लागत होने की वजह से भारतीय उद्योगों द्वारा सीसीसी प्रमाणपत्र लेना करीब असंभव हो जाता है।' 
 
आईईईएमए की यह भी शिकायत है कि चीन सेंट्रल पावर रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीपीआरआई) का गुणवत्ता प्रमाणपत्र नहीं मानता, जो केंद्रीय बिजली मंत्रालय का निकाय है। आईईईएमए का कहना है कि सिर्फ चीन ही नहीं, 30 से ज्यादा देश इस प्रमाणप्रत्र को नहीं मानते और भारत के बाहर की किसी अंतरराष्ट्रीय प्रयोगशाला का प्रमाणपत्र मांगते हैं। इसमें ओमान, मैक्सिको, मलेशिया, अर्जेंटीना, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, और यहां तक कि पड़ोसी देश बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका भी शामिल हैं। उद्योग संगठन ने वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय से कहा है कि भारत में आने वाले आयात के लिए भी भारतीय एजेंसियों का प्रमाणपत्र अनिवार्य किया जाना चाहिए। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि विदेश व्यापार महानिदेशालय इन मसलों पर अपने चीनी समकक्ष से जल्द ही बात कर सकता है। 
Keyword: china, electric, component,,
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