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बजट में हो सकता है सब्सिडी में सुधार पर ध्यान

राजेश भयानी / मुंबई January 22, 2020

राजस्व वसूली कमजोर रहने के मौजूदा दौर में खजाने पर सब्सिडी के अतिरिक्त बोझ को देखते हुए वित्त मंत्रालय सब्सिडी में सुधार पर विचार कर रहा है। मुख्य ध्यान खाद्य सब्सिडी और उर्वरक सब्सिडी पर है। बहरहाल किसानों को भरपाई के इन दोनों तरह की सब्सिडी के अन्य वैकल्पिक साधन जटिल हैं और उनके प्रशासन से जुड़े तमाम मसले भी हैं। सूत्रों के मुताबिक अब यह प्रस्ताव है कि दोनों तरह की सब्सिडी का किसानों को सीधे हस्तांतरण किया जाए। लेकिन प्रशासनिक मसले और किसी खास तरीके पर फैसला करना एक मसला बना हुआ है। इस सिलसिले में प्रायोगिक परियोजना शुरू करने का भी प्रस्ताव है, जिसके तहत कंपनियों के खाते में धन देने की मौजूदा व्यवस्था के बदले किसानों के खाते में धन हस्तांतरित करने के तरीके की जांच की जा रही है। 
 
बहरहाल पीएम किसान योजना के तहत किसानों को एक निश्चित धन दिए जाने में देरी की वजह से किसानों को चिंता है और खाद्य सब्सिडी का प्रत्यक्ष नकदी अंतरण भी विवादास्पद मसला बना हुआ है। पीएम किसान की दूसरी किस्त का हस्तांतरण अक्टूबर तक होना था, जिसे इस महीने के पहले सप्ताह तक पूरा किए जाने की संभावना है। क्रिसिल रिसर्च की निदेशक हेतल गांधी ने कहा, 'सरकार को समय बीतने के साथ इनपुट सब्सिडी के बजाय आउटपुट बेहतर होने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। बुनियादी ढांचे में सुधार, लॉजिस्टिक्स, कृषि जिंसों के निर्यात की संभावनाओं की तलाश ढांचागत मसले हैं, जिन पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। अंतरिम व्यवस्था के तहत इनपुट सब्सिडी जारी रहनी चाहिए। इसके लिए सीधी सब्सिडी की ओर कदम बढ़ाया जा सकता है, लेकिन यह चुनौतीपूर्ण है।' 
 
उर्वरक मंत्रालय भी विभिन्न वैश्विक तरीकों का अध्ययन कर रहा है कि किस तरह से सब्सिडी का भुगतान किया जाता है। केंद्रीय उर्वरक सचिव ने हाल ही में एक टीवी साक्षात्कार में कहा था कि नाइजीरिया में ई कूपन दिए जाते हैं और कई अन्य देशों में ई-वाउचर और पेपर वाउचर की व्यवस्था है। उनके मुताबिक अन्य तरीकों में उत्पादित फसल पर सब्सिडी की गणना जैसी व्यवस्था भी है। उन्होंने कहा था कि भारत को ऐसा तरीका अपनाना होगा, जो यहां के किसानों के अनुकूल हो। यूरिया के मामले में सब्सिडी का सीधा भुगतान किसानों को करने की जगह आदर्श स्थिति यह होगी कि पोषक आधारित सब्सिडी दी जाए और यूरिया के दाम विनियंत्रित किया जाए। इसे लागू करने की अपनी जटिलताएं हैं व किसानों को सीधे भुगतान के अन्य विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है।  जहां तक कृषि का संबंध है, केंद्र सरकार ने दलहन और तिलहन के साथ अन्य फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में तेज बढ़ोतरी की, जिसकी वजह से खरीद प्रक्रिया में कमजोरियां आ रही हैं। गेहूं और चावल के दाम समर्थन मूल्य से नीचे आने पर भारतीय खाद्य निगम प्रभावी तरीके से नियंत्रण करता है। लेकिन दलहन व तिलहन के मामले में व्यवस्था में कुछ खामियां पाई गईं, जब दाम लंबी अवधि तक समर्थन मूल्य से नीचे रहे और सरकार बुनियादी ढांचे के मसले या अन्य वजहों से खरीद में सक्षम नहीं थी। 
 
बहरहाल एफसीआई पर बहुत ज्यादा कर्ज है और उसके पास स्टॉक रिकॉर्ड उच्च स्तर पर है और भंडारण की जगह भी नहीं है, जिससे गेहूं की नई फसल खरीदकर रखी जा सके, जिसकी खरीद अप्रैल से होनी है। भारतीय कपास निगम के पास भी पिछले साल की खरीद का 10 लाख गांठ स्टॉक है और इस सीजन के अंत तक 50 लाख गांठ और खरीदने की योजना बना रहा है क्योंकि कीमत एमएसपी से नीचे चल रही है।  इस तरह की सभी खरीद पर ढुलाई और गोदाम प्रबंधन, कार्यशील पूंजी आदि की भारी लागत आती है और उस जिंस की गुणवत्ता खराब होने की समस्या बनी रहती है। नीति आयोग ने भावांतर योजना की तर्ज पर मोदी-1 सरकार के दौरान किसानों को मुआवजा देने को लेकर योजना तैयार की थी। दूसरी बार मोदी सरकार के कार्यभार संभालने के बाद यह योजना तत्काल सौंपी गई, लेकिन इसे लागू नहीं किया जा सका क्योंकि इसके विस्तृत अध्ययन की जरूरत है। 
Keyword: nirmala sitaraman, economy, budget, subsidy,,
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