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मुद्रा एवं वित्त पर समग्र रिपोर्ट फिर से जारी करे रिजर्व बैंक

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  January 22, 2020

कई दशकों तक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) मुद्रा एवं वित्त पर समग्र रिपोर्ट प्रकाशित किया करता था। यह एक बेहतरीन रिपोर्ट होती थी जो भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत बयां करने के साथ ही अभिलेख सामग्री के तौर पर भी काम करती थी। अपने शुरुआती अवतार में इस रिपोर्ट में आर्थिक समीक्षा की तरह दो हिस्से- विश्लेषण और आंकड़े हुआ करते थे। फिर 2001 के आसपास आरबीआई की वार्षिक सांख्यिकी पुस्तिका सामने आई। लिहाजा आरसीएफ के दूसरे संस्करण को बंद कर दिया गया। उसके बाद यह एक विषयवस्तु आधारित प्रकाशन रह गया जो हर दो साल में एक बार आता था।

 
लेकिन 2013 के बाद इसका प्रकाशन अचानक बंद हो गया। आखिरी संस्करण वर्ष 2013 में आया था। आरबीआई के तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन और डिप्टी गवर्नर ऊर्जित पटेल ने रिपोर्ट छपनी बंद होने की कोई भी वजह नहीं बताई थी। असल में, 2008-2013 के दौरान आरबीआई गवर्नर रहे डी सुब्बाराव को भी इसकी सफाई देनी पड़ी थी कि 2008 के बाद पांच वर्षों में एक ही रिपोर्ट क्यों आई? सुब्बाराव के कार्यकाल में ही भारतीय अर्थव्यवस्था को लीमन संकट का सामना करना पड़ा था। अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में सुब्बाराव गैर-जिम्मेदार राजकोषीय नीति को लेकर शिकायतें कर रहे थे। आखिरकार 2013 में प्रकाशित अंतिम आरसीएफ रिपोर्ट में ये तमाम चिंताएं राजकोषीय एवं मौद्रिक विमर्श पर सुविचारित लेखों के रूप में नजर आईं। उसके बाद रघुराम राजन और ऊर्जित पटेल को यह बताने की जरूरत पड़ी कि उन्होंने आरसीएफ को चुपचाप क्यों दरकिनार कर दिया? आखिरकार गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों के पूर्ण खुलासे और त्वरित सुधारात्मक कदमों की शुरुआत होने के बाद इसकी सख्त जरूरत थी कि अगले आरसीएफ में वित्तीय स्थिति का सही लेखा-जोखा पेश किया जाए। 
 
राजन को वह वजह भी बतानी चाहिए थी कि उन्होंने बैंकिंग प्रणाली में बेसल-3 मानक लागू करने का फैसला क्यों किया? निश्चित तौर पर उनके पास ठोस कारण रहे होंगे लेकिन वे क्या थे? क्या इस पर सही ढंग से चर्चा हुई थी? आरसीएफ यह बताने की सबसे अच्छी जगह होती। हम सभी यह समझ जाते और आरबीआई इतिहास के लेखकों को भी फाइलों तक पहुंच न होने से काफी मशक्कत करनी होती। मेरी शिकायत यह है कि अगर राजन और पटेल ने यह सोचा था कि आरसीएफ जरूरतों को लेकर निरर्थक था तो उन्हें यह बताना चाहिए था कि उन्हें ऐसा क्यों लगा? अगर उन्होंने रिपोर्ट को खराब ढंग से लिखा हुआ माना तो वे सुधार सकते थे। इसके बजाय उन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के कुलपति की तरह मनमाने ढंग से काम किया। इस बारे में कोई स्पष्टीकरण न होने से यह देखने में तो ऐसा ही लगता है। 
 
यह सवाल भी उठता है कि अगर नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद ऐसा हुआ रहता तो क्या प्रतिक्रिया रही होती? लेकिन 2013 में किसी ने भी एक शब्द नहीं बोला। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार मरणासन्न थी और सरकार में बैठे किसी भी शख्स ने इस पर गौर नहीं किया।
 
आरबीआई शोध की बहाली
 
आरबीआई के नए डिप्टी गवर्नर माइकल पात्र के पास शोध विभाग का जिम्मा होने से यह उम्मीद बंधती है कि आरबीआई इस समग्र रिपोर्ट को फिर से जारी करना शुरू करेगा। आखिर डॉ पात्र ने आरबीआई के साथ अपने लंबे करियर में इस रिपोर्ट पर कभी-न-कभी जरूर काम किया होगा लिहाजा वह किसी बाहरी व्यक्ति की तुलना में रिपोर्ट की अहमियत समझने की बेहतर हालत में हैं। इसके अलावा सात साल के लंबे अंतराल के बाद देश की मौद्रिक एवं वित्तीय स्थिति के बारे में समग्र रिपोर्ट आने से नए मौद्रिक सिद्धांतों एवं वैश्विक प्रवृत्तियों को समझने का शानदार अवसर भी मिलेगा। इनके आधार पर भारतीय परंपराएं भी शुरू की जा सकती हैं। डॉ पात्र के जिम्मे केवल यही काम नहीं होगा। आरबीआई को 'ओकेजनल पेपर्स' रिपोर्ट भी जारी करनी है। इसमें आरबीआई के अपने अधिकारियों के शोधपरक लेख शामिल होते हैं। इसका पिछला संस्करण गत जुलाई में आया था। हरेक छह महीने पर जारी होने वाली रिपोर्ट के नए संस्करण का वक्त आ गया है। इसके साथ एक समस्या यह है कि यह एक व्यर्थ रिपोर्ट हो चुकी है और इसकी गुणवत्ता में भी अस्थिरता देखी जाती रही है। जो भी हो, इससे यह जानकारी तो मिल ही जाती है कि आरबाई किस तरह के शोध को बढ़ावा दे रहा है? डॉ पात्र को इस रिपोर्ट का प्रकाशन भी अपने हाथ में लेने की जरूरत है ताकि उसे अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के मुताबिक ढाला जा सके। ओकेजनल पेपर्स का स्तर इतना ऊंचा हो जाए कि आरबीआई के बाहर के विशेषज्ञ भी उसमें अपने लेख प्रकाशित होने की मंशा रखने लगें। उबाल इतना अधिक है कि हम सांस्थानिक आधार पर उसे नहीं पकड़ पा रहे हैं। इसका बड़ा हिस्सा ट्विटर उपयोगकर्ताओं के रहमोकरम पर छोड़ा जा चुका है। खासकर मैं उनसे यह अनुरोध करूंगा कि वह इस प्रयास में भारतीय आर्थिक सेवा (आईईएस) के अर्थशास्त्रियों को अपने साथ जोड़ें। उनके पास भले ही विदेशी विश्वविद्यालयों से डॉक्टरेट की डिग्री न हो लेकिन वे भारतीय अर्थव्यवस्था की गतिशीलता को कहीं बेहतर ढंग से समझते हैं। 
 
पिछले वर्षों में आईईएस एक तरह से अधीनस्थ सेवा बनकर रह गई है जिसे किसी भी तरह का प्रोत्साहन नहीं मिलता है। इसकी वजह यह है कि आईईएस अधिकारियों के प्रमुख यानी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार के पास इसके लिए वक्त ही नहीं होता है। कौशिक बसु इसके इकलौते अपवाद थे। मुझे पूरा भरोसा है कि डॉ पात्र को वित्त मंत्री का भरपूर सहयोग मिलेगा। वित्त मंत्री को कड़ी मेहनत करने वाले लोगों की जरूरत है, न कि हमेशा अपना रिज्यूमे सुधारने की कोशिश में लगे रहने वाले लोगों की।
Keyword: RBI, economy, report,,
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