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क्या अनचाहे हो रहा है अतिशय नियमन?

देवाशिष बसु /  January 22, 2020

अफसरशाही द्वारा नियम कायदों का जरूरत से ज्यादा प्रयोग करना और इस तरह कारोबारियों को परेशान करना अनजाने में हो रहा है या यह सोच समझकर किया जा रहा है? बता रहे हैं देवाशिष बसु
 
बीते सात वर्षों से एक अटके हुए रिकॉर्ड की तरह मैं एक ही बात दोहरा रहा हूं कि भारत उच्च वृद्घि हासिल कर सकता है लेकिन लालफीताशाही का अंतहीन सिलसिला उद्यमों के लिए टकराव की वजह बन रहा है। जबकि ये उद्यम ही असली रोजगार प्रदाता हैं। इन दिनों तो रोजगार प्रदाताओं को राजनेताओं के ताने और उनके हाथों अपमान भी झेलना पड़ता है। कारोबारी आमतौर पर इसे स्वीकार कर लेते हैं। बहरहाल, ऐसा लगता है कि बीते छह वर्ष में आर्थिक मोर्चे पर एक के बाद एक जो नाकामियां हाथ लगी हैं और इस दौरान जो दंडात्मक शासन देखने को मिला है, वह लोगों को एक नई हकीकत से रूबरू करा रहा है।
 
भारत की वृद्घि दर लंबे समय तक कमजोर बनी रहेगी। हालांकि अर्थव्यवस्था वापसी करेगी लेकिन अतीत से बचकर निकलना मुश्किल है। कारोबारियों का धैर्य अब समाप्त होने को है और वे बदलाव की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बीते सप्ताह हमने देखा कि देश के दो शीर्ष उद्योगपति अत्यधिक नियमन, एक हद तक जबरन वसूली, नीतियों में मनमानी छेडख़ानी और यहां तक कि प्रक्रिया के दौरान प्रताडऩा तक की शिकायत कर रहे हैं। राजीव बजाज, जो अब तक कह रहे थे कि कोई मंदी नहीं है और अन्य उद्यमियों की पर्याप्त नवाचारी न होने के लिए आलोचना भी कर रहे थे, वह अचानक एक अलग गाना गुनगुनाने लगे हैं। उनका आरोप है कि अतिशय नियमन से उद्योग जगत को नुकसान पहुंच रहा है। टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन कहते हैं, 'भारत सूक्ष्म प्रबंधन और आशंकाओं से ग्रस्त है। यदि उसे तेज गति से विकास करना है तो हमें उन बाधाओं को दूर करना होगा जो कारोबारों को घेरे हुए हैं।'
 
वर्ष 2014 से अधिकांश भारतीय कारोबारी यह मानते रहे हैं कि एक प्रतिबद्घ, राष्ट्रवादी सरकार नया भारत बनाने में लगी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपेक्षा की गई थी कि वह गुजरात की अपनी बहुप्रचारित सफलता पूरे देश में दोहराएंगे। उन्होंने सन 2014 का चुनाव विकास के वादे पर जीता था। जहां तक मुझे याद है मोदी के रूप में पहली बार एक राष्ट्रीय नेता ने अपने चुनावी भाषणों में लालफीताशाही समाप्त करने की बात कही थी। उन्होंने उत्साहित युवाओं से पूछा था, 'आपको नौकरी चाहिए कि नहीं चाहिए?' जाहिर है लोगों को उनसे उम्मीद थी कि वह कारोबारी जगत को बेतुकी लालफीताशाही से निजात दिलाएंगे। आखिर रोजगार कौन तैयार करता है? घर के आसपास मौजूदा किराना दुकान से लेकर बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनियों तक यह काम कारोबार ही करते हैं, न कि सरकार। 
 
दुर्भाग्य की बात है कि सन 2014 में ही सरकार का वास्तविक एजेंडा एकदम स्पष्ट हो गया था। यह बात दीगर है कि इसके बावजूद कारोबारी, वित्तीय क्षेत्र के विशेषज्ञ और मीडिया का अधिकांश हिस्सा व्यापक तौर पर भ्रम में ही जीता रहा। मोदी सरकार ने कांग्रेस सरकार की योजनाओं पर ही कंप्यूटर चिप लगाने का काम जारी रखा क्योंकि अब सबकुछ डिजिटल हो चुका था। यही नहीं इन्हें नए नाम से नए विचारों के रूप में प्रचारित किया गया। हर विधायी बदलाव और नीति ने केवल उत्पीडऩ, अतिक्रमण, आशंका, अपराधीकरण आदि को बढ़ाने का काम किया। छोटी-छोटी गलतियों और चूकों के लिए जेल का दंड दिया गया। एक भ्रष्ट देश में ये निजी और सरकारी दोनों तरह के उत्पीडऩ का जरिया बन गए। इस बीच सामाजिक और राजनीतिक एजेंडे (गो संरक्षण, लिचिंग, राष्ट्रवाद, पाकिस्तान, कश्मीर, गांधी-नेहरू परिवार की कमियां आदि) ने आर्थिक बहस को पीछे छोड़ दिया। 
 
एक कारोबारी क्षेत्र जो बुरी तरह प्रभावित हुआ वह है 150 सीसी की मोटर साइकिल की श्रेणी। यह एक बड़ा बाजार है। इसे पहला झटका तब लगा जब सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि शुरुआत में ही पांच साल का बीमा कराना अनिवार्य है। इससे वाहन कीमत में बीमा की कई हजार रुपये की राशि जुड़ गई। गत वर्ष अप्रैल में नए सुरक्षा मानकों से 8,000-10,000 रुपये और जुड़ गए। जैसा कि बजाज ने कहा कि केवल एक वर्ष में इन वाहनों की कीमत 20 फीसदी तक बढ़ गई। जबकि वाहन निर्माता कीमतों में सालाना 2 से 4 फीसदी का ही इजाफा करते हैं। बजाज ने कहा था, 'मैं इसे अतिशय नियमन मानता हूं। एक देश में जहां सड़कों की खस्ता हालत देखते हुए आप प्रतिघंटा 20 से 30 किलोमीटर से अधिक की गति से वाहन चलाने के लिए संघर्ष करते हैं, वहां एबीएस जैसे सुरक्षा मानक के लिए 8,000 से 10,000 रुपये की लागत थोपना गलत है।'
 
उन्होंने कहा, 'यह कहना राजनीतिक दृष्टि से गलत हो सकता है कि बीएस-6 को अपनाना सही नहीं है बल्कि उपयुक्त तरीका अपनाकर पुराने वाहनों से निजात पाना, बीएस-4 से हो रहे उत्सर्जन को और कम करने का कहीं अधिक अच्छा तरीका है। इसके बजाय हम अप्रैल से बीएस-6 अपना रहे हैं यानी आम आदमी के लिए वाहन कीमतों में 8,000 से 10,000 रुपये का और इजाफा। यानी डेढ़ साल में आम आदमी के लिए दोपहिया वाहन 30 फीसदी तक महंगे। मेरे लिए यह बहुत कठिन मुद्दा है। क्या सरकार कुछ नरमी दिखाते हुए इनमें से कुछ कदम वापस लेगी?'
 
बजाज को जानना चाहिए कि राज्य सत्ता चाहे किसी दल की हो, नरमी उसका गुण नहीं है। इस सरकार ने तो आधार से होने वाली मौतों तक के लिए कोई खेद नहीं प्रकट किया और न ही नोटबंदी के भयावह असर को लेकर। बल्कि इसने कई राजस्व कानूनों में गिरफ्तारी और कैद के प्रावधान शामिल कर दिए हैं।
 
राजनीति
 
यह देखना सुखद है कि कारोबारी उन मुद्दों पर आवाज उठा रहे हैं जो उनको नुकसान पहुंचा रहे हैं। परंतु एक सवाल का उत्तर बाकी है: सरकार अतार्किक रूप से दंडात्मक क्यों है? राजनेता कारोबारियों पर हमले क्यों कर रहे हैं और कानून हर किसी को अपराधी ठहराने पर क्यों तुले हैं? मुझे डर है कि बोलने वाले कारोबारी नेताओं और बाबुओं से लालफीताशाही कम करने की अपील करके दोबारा गलती कर रहे हैं। जरा खुद से पूछिए कि आखिर क्यों मंत्री और उनके आईएएस सचिव निर्णय प्रक्रिया में देरी की लागत को क्यों नहीं समझते? उन्हें इतने नियमों, विविध लाइसेंस, अतीत से लागू होने वाले संशोधनों, लंबित अदालती मामलों, अतार्किक कर मांगों और दंडात्मक कानूनों से होने वाली दिक्कत क्यों नहीं दिखती? वे खुद को बढ़त दिलाने और कारोबारियों को उनकी जगह दिखाने के लिए जानबूझकर ऐसा करते हैं। वे चीजों को आसान बनाना नहीं चाहते। इन चीजों को सामान्य बनाने की मांग करने वाले राजनेता सीधे हैं। उन्हें इसके पीछे की राजनीति की समझ नहीं है। 
Keyword: bureaucrat, policy, law,,
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