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बैंकों के कर्ज समाधान पर नए नियमों का जोखिम भरा दांव

ए के भट्टाचार्य /  January 21, 2020

गत 15 नवंबर को सरकार ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) में बड़ा बदलाव लेकर आई। उसने ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया नियम, 2019 की अधिसूचना जारी की जिसका मकसद बैंकों से इतर वित्तीय सेवा प्रदाताओं (एफएसपी) के ऋणशोधन एवं परिसमापन का एक ढांचा मुहैया कराना है।

फिर यह स्पष्ट किया गया कि नए नियम एफएसपी या सरकार द्वारा आईबीसी की धारा 227 के तहत समय-समय पर अधिसूचित होने वाली एफएसपी श्रेणी पर ही लागू होंगे। याद रखें कि आईबीसी कानून वर्ष 2016 में कंपनी निकायों, सीमित जवाबदेही भागीदारी, साझेदारी फर्मों और लोगों के समयबद्ध ऋण पुनर्गठन, ऋण समाधान और परिसमापन के लिए समेकित मसौदे के तौर पर लाया गया था।

यह एक अंतरिम उपाय था। सरकार ने उस समय यह कहा था कि आईबीसी की धारा 227 के तहत वित्तीय सेवा प्रदाताओं के लिए नियमों की यह अधिसूचना बैंकों एवं व्यवस्थागत रूप से अहम अन्य वित्तीय सेवा प्रदाताओं के वित्तीय समाधान की दिशा में समग्र कदम उठाए जाने के पहले एक अनिवार्य उपाय की अंतरिम व्यवस्था है। 

इस तरह वित्तीय सेवा प्रदाताओं के लिए की गई विशेष व्यवस्था के तीन अहम पहलू थे। पहला, इनमें बैंकों को शामिल नहीं किया गया था। दूसरा, किसी भी वित्तीय सेवा प्रदाता के लिए कर्ज समाधान एवं परिसमापन कार्रवाई शुरू करने के पहले मौजूदा नियामकों से सलाह  एवं उनकी सक्रिय भागीदारी को अनिवार्य किया गया था। तीसरा, बैंकों एवं अन्य वित्तीय सेवा प्रदाताओं के दिवालिया समाधान एवं परिसमापन से जुड़े मामलों के लिए एक अलग कानून लाने की योजना थी। 

यह कानूनी ढांचा आने के कुछ हफ्तों में ही सरकार अपने वादे वाले कानून पर अंदरूनी बातचीत शुरू करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ती दिखी। इसके आईबीसी की धारा 227 के तहत बनाए गए कानूनों से अधिक विस्तारित होने की संभावना है। सरकार ने नए कानून की रूपरेखा अभी तक सार्वजनिक नहीं की है। लेकिन एक ऑनलाइन वित्तीय प्रकाशन मनीलाइफ ने बैंकों एवं अन्य वित्तीय सेवा प्रदाताओं के ऋणशोधन एवं परिसमापन पर नए कानून के प्रमुख बिंदुओं को सामने रखा है। अखिल भारतीय बैंक अधिकारी परिसंघ (एआईबीओसी) के थॉमस फ्रैंको ने भी ऑनलाइन वीडियो नेटवर्क न्यूजक्लिक पर एक कार्यक्रम में प्रस्तावित कानून के प्रावधानों का जिक्र किया है।

ऐसा लगता है कि नए कानून को वित्तीय क्षेत्र विकास एवं नियमन (समाधान) विधेयक का नाम दिया जाएगा। इसी तरह का एक प्रस्ताव वर्ष 2017 में वित्तीय समाधान एवं जमा बीमा विधेयक (एफआरडीआई) के रूप में पेश किया गया था लेकिन इसके बेल-इन प्रावधानों का व्यापक विरोध होने पर सरकार ने वर्ष 2018 में अपने कदम पीछे खींचते हुए विधेयक को वापस ले लिया था। एफआरडीआई में ऐसा प्रस्ताव रखा गया था कि वित्तीय संकट में फंसने पर बैंकों में नई पूंजी डालने के लिए जमाकर्ताओं की राशि का इस्तेमाल किया जाएगा। हालांकि सरकार की तरफ से यह आश्वासन दिया गया था कि बीमित की जाने वाली जमा राशि की सीमा बढ़ाई जाएगी। लेकिन यह आश्वासन भी लोगों की चिंताओं को दूर नहीं कर सका और इस विधेयक को वापस ले लिया गया। 

नए विधेयक में संभवत: जमाराशि के इस्तेमाल जैसा कोई भी बेल-इन प्रावधान नहीं रखा गया है लेकिन इसमें समाधान अधिकरण को यह अधिकार दिया गया है कि वह एक बैंक या वित्तीय कंपनी और ग्राहक के बीच के अनुबंध को निरस्त, संशोधित या परिवर्तित कर सकता है। समाधान अधिकरण ही अनुबंध में संशोधन या काट-छांट की सीमा तय करेगा। इस अधिकरण में वित्तीय क्षेत्र के मौजूदा नियामकों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। दूसरे शब्दों में, बेल-इन प्रावधान की जगह वैसे ही समस्यापरक प्रावधान को रखा गया है क्योंकि इसमें समाधान अधिकरण को जमाकर्ताओं के साथ हुए अनुबंध में संशोधन का अधिकार होगा। हाल के समय में बैंक ग्राहकों की यह चिंता बढ़ी है कि बैंक के दिवालिया होने की सूरत में वे अपना जमा गंवा सकते हैं।

नए विधेयक में बीमा कवर लायक जमा राशि की सीमा बढ़ाए जाने की भी संभावना है। बीमा कवर के दायरे में लाई जाने वाली जमा राशि का निर्धारण समाधान अधिकरण करेगा। हालांकि अभी इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि यह गणना किस तरह की जाएगी? नए कानून में प्रस्तावित यह प्रावधान भी काफी परेशान करता है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के समाधान एवं परिसमापन की कार्रवाई सरकार के साथ मशविरे के बाद की जाएगी।

पिछले दो महीनों की घटनाओं को देखते हुए ऐसा लगता है कि सरकार नए कानून से जुड़े एक और बड़े विवाद के लिए खुद को तैयार कर रही है। क्या सरकार को बैंकों के लिए कर्ज समाधान पर इस तरह का कानूनी प्रस्ताव तैयार करने के पहले सभी हितधारकों के साथ व्यापक चर्चा नहीं करनी चाहिए थी? इसी मकसद से लाए गए पिछले विधेयक एफआरडीआई पर देश भर में विरोध हुआ था और सरकार को उसे वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा था। क्या सरकार को उस प्रकरण से वाजिब सबक नहीं सीखना चाहिए था?
Keyword: IBC, code, NCLT, Resolution, RBI, Lender, Resolution Scheme, ARC, SC, Supreme Court, Circular, Asset Restructuring construction,
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