बिजनेस स्टैंडर्ड - थोड़ी स्थिरता हासिल मगर जोखिम बाकी
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थोड़ी स्थिरता हासिल मगर जोखिम बाकी

नीलकंठ मिश्रा /  January 20, 2020

धीरे-धीरे वृद्धि में स्थिरता आ रही है लेकिन अभी भी कई चक्रीय कारक मौजूद हैं जिनका जोखिम बरकरार है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
मांग में कमी से उत्पन्न आर्थिक मंदी की इकलौती अच्छी बात यह है कि माल कम करने से वह समाप्त हो जाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि कटौती अनंतकाल तक जारी नहीं रखी जा सकती है। बीती छह तिमाहियों में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में जो गिरावट आई है उसकी एक अहम बात है इन्वेंटरी में गिरावट। जीडीपी में जब गतिविधियों का आकलन किया जाता है तो इन्वेंटरी का आकार वृद्धि में जोड़ा जाता है। कम इन्वेंटरी का असर उलटा होता है। बीती छह तिमाहियों में सेवा और उद्योग जगत में वृद्धि के अंतर तथा जीएसटी संग्रह में कमी में इसे महसूस किया जा सकता है। तिमाही सेवा वृद्धि के आकलन में दिक्कत हो सकती है लेकिन इसमें उद्योग की तरह गिरावट नहीं आई है। शायद ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सेवा क्षेत्र में ज्यादा इन्वेंटरी नहीं हो सकती।
 
इससे पहले ऐसा वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की शुरुआत के पहले वाली तिमाही में देखने को मिला था। उस वक्त उद्योग और सेवा की वृद्धि में समान भिन्नता नजर आई थी। वस्तु आपूर्ति शृंखला ने इन्वेंटरी कम करके जीएसटी के साथ नई शुरुआत करने की सोची। बीती पांच तिमाहियों में ऐसा वित्तीय हालात तंग होने से हुआ। क्योंकि इसका असर वितरकों, थोक विक्रेताओं और खुदरा कारोबारियों को ऋण की उपलब्धता पर पड़ा। ऐसे प्रमाण हैं कि माल में कमी का दौर अब समाप्त हो चुका है। बिजली की मांग वृद्धि जो अक्टूबर और नवंबर में दो अंक में थी वह दिसंबर में केवल 2 फीसदी कम रही। जनवरी के पहले सप्ताह में इसमें मामूली इजाफा हुआ। जीएसटी संग्रह और रेल मालवहन भी सकारात्मक वृद्धि दर्शा रहे हैं। ये आंकड़े अभी भी कमजोर हैं लेकिन पहले आई तीव्र कमी से तो बेहतर ही हैं। यदि बाकी सब सामान्य रहा तो एक बार फिर इन्वेंटरी भरनी शुरू हो जाएगी और इसका लाभ वृद्धि को मिलेगा।
 
परंतु वित्तीय स्थिति तंग बनी हुई है। जिन वित्तीय कंपनियों के पास पूंजी, उत्पाद और पूंजी तक पहुंच है वे भी वृद्धि में धीमेपन के चलते ऋण देना कम कर रही हैं। नॉमिनल जीडीपी वृद्धि दर आधी हो जाने के बाद यदि मौजूदा कर्जदारों के लिए ऋण की गुणवत्ता का नए सिरे से आकलन किया जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा व्यय में कटौती वृद्घि की राह में एक और बाधा होगी क्योंकि वे ऐसे वर्ष में अपने राजकोषीय घाटे की पूर्ति करने का प्रयास करेंगे जहां कर प्राप्ति तय लक्ष्य से कम रही हो। पहले आठ महीनों के दौरान केंद्र सरकार का व्यय 13 फीसदी बढ़ा। लेकिन प्राप्तियों में कमी को देखते हुए यदि यह राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर कायम रहा तो अंतिम चार महीनों में व्यय पिछले साल से एक फीसदी कम होगा। यदि विनिवेश प्रक्रिया बजट से कमजोर रही तो कहीं अधिक बड़ी कमी उत्पन्न हो जाएगी। राज्य सरकारों के लिए वित्त वर्ष के मध्य तक ऋण के लक्ष्य स्थिर हो जाते हैं और वे अपने घाटे में और इजाफा नहीं कर सकतीं। उनके लिए व्यय में कटौती करना आवश्यक है। वे पहले ही भुगतान करने में देरी कर रही हैं। उदाहरण के लिए फसल बीमा का नुकसान। बल्कि वित्त वर्ष के अंत तक राज्य सरकार के कर्मचारियों के वेतन में भी देरी हो सकती है। ऐसे कदमों से कमजोर उपभोक्ता रुझान और कमजोर हो सकते हैं और कंपनियों की निवेश योजनाएं और कमजोर हो सकती हैं।
 
कई नैसर्गिक स्थिरता प्रदान करने वाले कारक अब काम नहीं कर रहे हैं। कमजोर आर्थिक वृद्धि प्राय: ब्याज दरों को प्रभावित करती है लेकिन जैसा कि हम अक्सर कहते आए हैं कमजोर वृद्धि और कम मुद्रास्फीति के बावजूद कर्जदारों के लिए ब्याज दर अपरिवर्तित रही है। गत वर्ष देश के विदेशी मुद्रा भंडार में भी जीडीपी के दो फीसदी से अधिक का इजाफा हुआ है। ऐसा इसलिए क्योंकि पूंजीगत आवक और निर्यात तब भी बढ़े जब कमजोर घरेलू मांग से आयात कम हुआ। यदि विदेशी बचतकर्ता देश की जरूरत से अधिक धन देना चाहते हैं तो या तो मुद्रा का अधिमूल्यन होगा या फंड की लागत घटेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस बीच केंद्रीय बैंक द्वारा सरकारी बॉन्ड खरीदने का एक जोखिम यह है कि मुद्रा कमजोर होगी लेकिन भुगतान संतुलन का ऐसा अधिशेष दिखाता है कि फिलहाल ऐसा कोई जोखिम नहीं है।
 
आम चर्चा की बात करें तो बीते कुछ महीनों में बैलेंस शीट की समस्याओं की तादाद बढ़ी है। वह सही हो सकती है और हमें यह याद रखना चाहिए कि बैलेंस शीट पर दबाव कमजोर वृद्धि के कारण भी उत्पन्न हो सकता है। जरूरी नहीं कि ऐसा हमेशा चोरी या भ्रष्टाचार के कारण हो। उदाहरण के लिए केंद्र सरकार का 45 प्रतिशत का ऋण-जीडीपी अनुपात स्थायी नजर आया और उसमें निरंतर गिरावट आ रही है क्योंकि नॉमिनल वृद्धि दर ऊंची रही लेकिन वृद्धि में धीमापन आने और ऋण की लागत के करीब 7 फीसदी तथा ब्याज दर के जीडीपी के 3 फीसदी रहने के कारण जीडीपी अचानक खस्ता नजर आने लगी। गत वर्ष ये वृद्धिकारी व्यय का तिहाई था। यदि कर 8 फीसदी की दर से बढ़ते हैं और नॉमिनल जीडीपी के अनुरूप गैर विवेकाधीन व्यय मसलन ब्याज और वेतन आदि उसी गति से बढ़ते हैं तो राजकोषीय समावेशन कैसे होगा? अतिरिक्त व्यय की तो बात ही छोड़ दी जाए। यदि नॉमिनल जीडीपी वृद्धि में आया धीमापन तनावग्रस्त ऋण को बढ़ावा देता है तो सही उपाय यही होगा कि वृद्धि को गति प्रदान की जाए, न कि बैलेंस शीट सुधारने की कवायद की जाए।
 
आर्थिक कारक समय-समय पर अपनी भूमिका निभाते हैं भले ही यह वांछित से धीमी गति से हो।  कम ब्याज दर पर बात करें तो वृद्धि में सुधार के लिए वह आवश्यक है। बैंक जमा दर में गिरावट आने लगी है और समय बीतने के साथ इसका असर ऋण दर पर भी पड़ेगा। मोर्गेज दर बीते पांच महीने में करीब 50 आधार अंक कम हुई है। बजट प्रस्तुत होने के बाद राजकोषीय घाटे और व्यय को लेकर अनिश्चितता कुछ हद तक कम होगी। अप्रैल के बाद केंद्र और राज्य सरकारें व्यय सुधारने में कामयाब हो सकती हैं। तब तक संभवत: शीर्ष मुद्रास्फीति भी सार्थक सुधार के साथ नजर आए। यदि वित्तीय तंत्र में कोई और गड़बड़ी नहीं होती है तो ऋण विस्तार में भी गिरावट आएगी, भले ही यह धीमी गति से हो। अर्थव्यवस्था शायद धीमी गति से स्थिरता हासिल करे, वृद्धि मौजूदा स्तर से थोड़ी सुधर सकती है, हालांकि वह वांछित लक्ष्य से फिर भी कोसों दूर रहेगी।
 
(लेखक क्रेडिट स्विस में इंडिया स्ट्रैटिजिस्ट और एशिया पैसिफिक स्ट्रैटिजी के को-हेड हैं)
Keyword: india, economy, GDP, GST,,
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