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बहुलांश बनाम अल्पांश शेयरधारक: दोनों की स्थिति में जबरदस्त संतुलन की दरकार

सुदीप्त दे /  January 19, 2020

कंपनी मामलों के मंत्रालय गैर-सूचीबद्ध कंपनियों के लिए अधिग्रहण संबंधी मानदंड तैयार करने की प्रक्रिया में है। कानून विशेषज्ञ बता रहे हैं कि नए नियमों से बहुलांश एवं अल्पांश शेयरधारकों के लिए स्थितियां किस प्रकार बदल सकती हैं। 

गैर-सूचीबद्ध कंपनियों के लिए अधिग्रहण संबंधी मानदंड तैयार करने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? ये प्रावधान कंपनी कानून 1956 की धारा 395 के तहत हैं और ये कंपनी कानून 2013 की धारा 236 के तहत भी आते हैं। हालांकि नियमों और दिशानिर्देशों के अभाव में इन्हें कभी अधिसूचित नहीं किया गया।

ये मानदंड मुख्य तौर पर उन मामलों में अल्पांश शेयरधारकों (10 फीसदी से कम हिस्सेदारी) के फायदे के लिए थे जहां किसी अधिग्रहणकर्ता को कंपनी में 90 फीसदी हिस्सेदारी हासिल होती है। इस प्रकार के मामलों में अल्पांश शेयरधारकों को निर्धारित मूल्यांकन के अनुसार कंपनी से बाहर होने का विकल्प दिया जाता था।

कानून फर्म जे सागर एसोसिएट्ïस के पार्टनर ललित कुमार का कहना है कि इस प्रावधान से अल्पांश शेयरधारकों को तब तक फायदा मिलना चाहिए जब तक अल्पांश शेयरधारकों के शेयरों का अनिवार्य अधिग्रहण नहीं किया जाता। साथ ही अल्पांश शेयरधारकों को एक विकल्प दिया गया है कि वे अपने शेयरों की बिक्री करें अथवा नहीं।

फिनसेक लॉ एडवाइजर्स के मैनेजिंग पार्टनर संदीप पारेख के अनुसार, गैर-सूचीबद्ध कंपनियों के लिए जिस अधिग्रहण ढांचे की परिकल्पना की गई है वह सूचीबद्ध कंपनियों के लिए बाजार नियामक सेबी के अधिग्रहण दिशनिर्देश के तहत दिए गए ढांचे से अलग है। उन्होंने कहा, 'अल्पांश शेयरधारकों के हितों की रक्षा के लिए नियंत्रण हिस्सेदारी में बदलाव होने पर सेबी के अधिग्रहण संबंधी दिशानिर्देशों के तहत उन्हें बाहर होने संबंधी अधिकार दिए गए हैं।' पारेख का मानना है कि इन मानदंडों में बहुलांश एवं अल्पांश शेयरधारकों के अधिकारों में सावधानीपूर्वक संतुलन स्थापित करने की जरूरत है।

विशेषज्ञों का कहना है कि गैर-सूचीबद्ध कंपनियों के कंपनी प्रशासन में उजागर हुए हालिया खामियों के मद्देनजर इन मानदंडों की आवश्यकता महसूस होने लगी। कंपनी सचिव गौरव पिंगले ने कहा, 'सरकार को गैर-सूचीबद्ध कंपनियों के स्वामित्व अथवा प्रबंधन में बदलाव के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए उत्सुक रहना होगा। इसका उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना होगा।' 

मानदंड में बदलाव से बहुलांश एवं अल्पांश शेयरधारकों की स्थिति में किस प्रकार का बदलाव आएगा?

विशेषज्ञों का कहना है कि अधिग्रहण संबंधी मानदंड सीमा, मूल्य, अनुपालन, खुलासा, पेशकश के तरीके आदि के संदर्भ में होने चाहिए। हाल में सरकार ने गैर-सूचीबद्ध कंपनियों के लिए अनुपालन संबंधी कई उपायों की घोषणा की है जिसमें शेयरों को अनिवार्य तौर पर कागज रहित बनाना शामिल है। इसके अलावा गैर-सूचीबद्ध कंपनियों के लिए एक तिमाही खुलासा ढांचा भी तैयार करने का प्रस्ताव है।

पारेख के अनुसार, गैर-सूचीबद्ध कंपनियों के लिए प्रस्तावित अधिग्रहण मानदंड तैयार करते समय काफी विचार-विमर्श और सावधानी बरतने की जरूरत है। इनगवर्न रिसर्च सर्विसेस के प्रबंध निदेशक श्रीराम सुब्रमण्यन ने भी इससे सहमति जताई। उन्होंने कहा, 'अल्पांश शेयरधारकों के बाहर होने के लिए एक सरल ढांचा स्थापित करने की जरूरत है जिसमें पहले इनकार करने का अधिकार भी शामिल है। यदि अल्पांश शेयरधारक किसी तीसरे पक्ष को अपने शेयरों की बिक्री करना चाहता है तो पहले इनकार करने के अधिग्रहण के तहत बहुलांश शेयरधारकों को उस तीसरे पक्ष द्वारा तय मूल्यांकन पर खरीदारी का पहला अधिकार होगा।' विशेषज्ञों ने गैर-सूचीबद्ध कंपनियों में बहुलांश एवं अल्पांश शेयरधारकों के बीच सूचनाओं में अंतर को लेकर भी चिंता जताई। सुब्रमण्यन ने कहा कि बहुलांश शेयरधारकों को आंतरिक सूत्रों से सूचना मिल सकती है और वे उसका इस्तेमाल अल्पांश शेयरधारकों के शेयरों की खरीद में कर सकते हैं। लेकिन इस मामले में काफी जटिलता दिखती है क्योंकि कंपनी कानून और बाजार नियामक सेबी के विभिन्न दिशानिर्देशों के तहत गैर-सूचीबद्ध कंपनियों को परिभाषित नहीं किया गया है। 

अन्य देशों में इस मुद्दे की क्या स्थिति है?

अधिकतर देशों में गैर-सूचीबद्ध कंपनियों के विलय एवं अधिग्रहण संबंधी लेनदेन काफी हद तक संबंधित कंपनी के लिए कायदे-कानून एवं अन्य सहायक कानूनों जैसे- अनुबंध संबंधी कानून, प्रतिस्पर्धा कानून, कर कानून, श्रम कानून, विदेशी मुद्रा विनिमय कानून आदि द्वारा विनियमित होते हैं।

विधि सेंटर फॉर रिसर्च पॉलिसी की वरिष्ठï अनुसंधान फेलो आस्था पांडे ने कहा, 'जहां तक गैर-सूचीबद्ध कंपनियों का सवाल है तो देश में उनके विलय एवं अधिग्रहण के लिए कोई खास अधिग्रहण संहिता अथवा अधिग्रहण कानून नहीं है।' इन देशों में अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, डेनमार्क, फिनलैंड, नीदरलैंड, स्वीडन और जापान शामिल हैं।
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