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कमाऊ वारिस दुर्घटना में मुआवजे के हकदार

एम जे एंटनी /  January 19, 2020

वाहन दुर्घटना के दावों में कमाऊ पुत्र और शादीशुदा बेटियां अपनी कामकाजी मां की मौत के मामले में मुआवजे के लिए आवेदन कर सकती हैं। उच्चतम न्यायालय ने पिछले सप्ताह नैशनल इंश्योरेंस कंपनी बनाम बिरेन्दर वाद में अपने फैसले में यह व्यवस्था दी। हालांकि वे पूरी तरह अपनी कामकाजी मां पर आश्रित नहीं थे लेकिन मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166 के मुताबिक मुआवजा पाने के लिए कानूनी प्रतिनिधि हैं। इस मामले में महिला मोटर बाइक की पिछली सीट पर बैठकर अपने सरकारी दफ्तर जा रही थी कि तभी एक डंपर की टक्कर में उनकी मौत हो गई। उनके दो बेटों ने मुआवजे के लिए याचिका दायर की। बीमा कंपनी ने कई आधारों पर इसका विरोध किया लेकिन मुख्य आधार यह था कि महिला के दोनों बेटे कृषि मजदूर के तौर पर कमाई कर रहे हैं और अपनी मां की आय पर आश्रित नहीं हैं। यह मामला पंचाट से पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय से होते हुए आखिरकार उच्चतम न्यायालय पहुंचा। आखिरकार शीर्ष न्यायालय ने घोषित किया कि महिला के बेटे भले ही वेतन पा रहे हैं और विवाहित हैं लेकिन वे अपनी मां के कानूनी प्रतिनिधि होने के कारण मुआवजा पाने के हकदार हैं। न्यायालय ने कहा कि संबंधित कानूनी प्रतिनिधियों की निर्भरता की अनुपस्थिति के कारण बीमा कंपनी का दायित्च खत्म नहीं हो जाता है। मुआवजे में मृतका की संपत्ति का हिस्सा शामिल है। इस कारण मृतका के कानूनी प्रतिनिधि उनकी संपत्ति के वारिस होंगे। 

इंडियन बैंक लापरवाही का दोषी करार

उच्चतम न्यायालय ने इंडियन बैंक को पश्चिम बंगाल के डीएवी पब्लिक स्कूल को 25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। बैंक की लापरवाही से स्कूल को भारी नुकसान हुआ था। स्कूल के बैंक खातों में नेट बैंकिंग की सुविधा नहीं थी। लेकिन जब प्रधानाचार्य ने स्कूल के तीन खातों में फंड के हस्तांतरण के लिए एक बचत नेट बैंकिंग खाता खोला तो पता चला कि स्कूल के खातों से 25 लाख रुपये अवैध तरीके से हस्तांतरित किए गए हैं। इस बारे में बैंक को बताया गया तो उसने इस लेनदेन की जांच में पूरा एक दिन लगा दिया। तब तक स्कूल के खातों से और पैसा गायब हो गया। पता चला कि पैसों के हस्तांतरण के लिए एक डुप्लिकेट सिम कार्ड का इस्तेमाल किया गया। राज्य उपभोक्ता आयोग और राष्ट्रीय आयोग को स्कूल के दावे में कमियां दिखी और केवल एक लाख रुपये का मुआवजा दिया गया। अपील पर उच्चतम न्यायालय ने कहा कि बैंक ने स्कूल के अनुरोध के बिना प्रधानाचार्य के खाते को स्कूल के खातों से जोड़ा। इसलिए, इस स्कूल के लिए न तो स्कूल और न ही प्रधानाचार्य जिम्मेदार थे और बैंक को स्कूल को मुआवजा देना चाहिए। 

शराब विक्रेता को 650 किमी दूर जाने की अनुमति

उच्चतम न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के एक फैसले को खारिज कर दिया और भारत में बनी विदेशी शराब के एक थोक विक्रेता को पश्चिमी तट पर माहे में स्थित अपनेे कारोबार को 650 किमी दूरी पूर्वी तट पर कराईकल ले जाने की अनुमति दे दी। पुदुच्चेरी आबकारी कानून के तहत अधिकारियों ने इसे कराईकल ले जाने की अनुमति दी थी लेकिन वहां के कुछ निवासियों ने इसका विरोध किया और यह मामला मुकदमेबाजी में फंस गया। उनकी दलील थी कि कारोबार का हस्तांतरण कराईकल के निवासियों के हितों के खिलाफ है। कराईकल के नेदुनकाडु सॢकल में 35 घरों के लिए पहले से ही शराब की 35 दुकानें चल रही थीं। साथ ही उनका कहना था कि उच्चतम न्यायालय ने राजमार्गों के आसपास 500 मीटर तक शराब की दुकान खोलने पर प्रतिबंध लगाया है। उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उच्च न्यायालय ने मैसर्स सीईई सीईई ऐंड सीईई बनाम के देवमणि मामले में याची के पक्ष में फैसला दिया। डीलर ने इसके खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील की। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि दक्षिण भारत में चार अलग-अलग कोनों में फैले इस केंद्रशासित प्रदेश के आबकारी नियम में थोक या खुदरा कारोबार को हस्तांतरित करने की अनुमति दी गई है। फैसले में कई अन्य दुकानों का भी हवाला दिया गया जिन्हें बेहतर राजस्व के लिए अन्य क्षेत्रों से कराईकल में हस्तांतरित किया गया। न्यायालय ने डीलर को आबकारी अधिकारियों द्वारा तय की गई शर्तों के साथ अपना कारोबार हस्तांतरित करने की अनुमति दे दी। न्यायालय ने साथ ही इसमें अपनी तरफ से भी दो शर्तें जोड़ दीं। दुकान में साझा प्रवेश और निकास होनी चाहिए तथा उसकी चहारदीवारी में सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए। 

देरी के कारण गंवाना पड़ सकता है मुआवजा

जिन किसानों की जमीन किसी परियोजना के लिए अधिग्रहीत की गई है, वे भूमि अधिग्रहण कानून के तहत मुआवजे के लिए देरी नहीं कर सकते हैं और फिर उस पर ब्याज का दावा नहीं कर सकते हैं। एक्जीक्यूटिव इंजीनियर बनाम महाराष्ट्र राज्य वाद में बंबई उच्च न्यायालय ने किसानों के एक समूह को बढ़ा हुआ मुआवजा दिया जबकि दूसरा समूह साढ़े पांच साल बाद आगे आया। उच्च न्यायालय ने इस देरी को मान लिया और अधिकरियों को देरी से मुआवजे पर ब्याज देने का आदेश दिया। उच्चतम न्यायालय अधिकारियों की अपील को आंशिक रूप से सही ठहराया। न्यायालय ने बढ़ा हुआ मुआवजा देने को कहा लेकिन इस पर ब्याज देने के उच्च न्यायालय के फैसले को खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा, 'परियोजना कार्यकारी को मुआवजे के भुगतान में देरी की अवधि के लिए ब्याज देने को नहीं कहा जा सकता है क्योंकि वह इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं।' 

आईबीसी फैसले के तक इंतजार नहीं 

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कहा है कि मध्यस्थता कानून के तहत पंचाट के फैसले को खारिज करने के लिए दायर याचिका को इस वजह से लंबे समय तक लटका कर नहीं रखा जा सकता है कि परिचालन ऋणदाताओं ने कर्जदार के खिलाफ धनशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के प्रावधान का सहारा लिया है। न्यायालय ने सिरपुर पेपर मिल्स लिमिटेड बनाम आईके मर्चेंट्स लिमिटेड वाद में अपने फैसले में यह बात कही। मिल ने पंचाट के फैसले को खारिज करने का आवेदन किया था। उसका कहना था कि कॉरपोरेट कर्जदार के तौर पर उसके खिलाफ आईबीसी के तहत कॉरपोरेट दिवालिया कार्यवाही शुरू की गई है। मिल का जेके पेपर लिमिटेड ने अधिग्रहण कर लिया था जो एनसीएलटी के समक्ष समाधान आवेदक थी। उच्च न्यायालय ने कहा कि मध्यस्थता कानून के तहत अपील को लटकाने का कोई आधार नहीं है। न्यायालय ने कहा, 'इस मामले में कॉरपोरेट कर्जदार होने के नाते मिल को इसे पंचाट में जीतने वाले के दावे को अनिश्चितकाल के लिए लटकाने के लिए आईबीसी के प्रावधानों का सहारा लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।' 

पेटेंट मामले में रोक से इनकार

दिल्ली उच्च न्यायालय ने एस्ट्राजेनेका एबी द्वारा एमक्योर फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड के खिलाफ दायर दो आवेदनों को पिछले सप्ताह खारिज कर दिया। यह मामला एक्यूट कोरोनरी सिंड्रोम के इलाज में काम आने वाली एक दवा के पेंटेट से जुड़ा है। इस यौगिक का नाम टिस्काग्रेलर है। एस्ट्राजेनेका ने अपने यौगिक को ब्रिलिंटा और एक्सर नाम दिया है जबकि भारतीय कंपनी के उत्पाद का ब्रांड नाम टिकाप्लैट और टियारे है। एस्ट्राजेनेका ने दावा किया कि उसकी दवा ज्यादा कारगर है जबकि एमक्योर का कहना था कि उसके ब्रांड में ज्यादा नयापन नहीं है। उच्च न्यायालय ने कहा कि प्रथम दृष्टïया एस्ट्राजेनेका ने अपने पक्ष में जोरदार दलील दी है लेकिन पेटेंट पिछले महीने खत्म हो गया और एमक्योर पहले ही अपना उत्पाद उतार चुकी है। इसलिए न्यायालय ने अंतिम फैसला आने तक रोक लगाने का आदेश नहीं दिया। 

ऑनलाइन पर सीसीआई का बढ़ता शिकंजा 

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) देश के ऑनलाइन शॉपिंग जगत में मजा किरकिरा कर सकता है। दो प्रमुख ई-कॉमर्स वेबसाइट- एमेजॉन और फ्लिपकार्ट पर एक्सक्लूसिव डील और उत्पादों पर भारी छूट अब सीसीआई की जांच के दायरे में है। इसे आगे चलकर ऑनलाइन शॉपिंग के प्रति सीसीआई के रुख में सख्ती का संकेत माना जा रहा है।

ई-कॉमर्स क्षेत्र की इन दोनों प्रमुख कंपनियों की बाजार गतिविधियों की सीसीआई द्वारा की जा रही पहली औपचारिक जांच है। हालांकि सीसीआई के चेयरमैन अशोक गुप्ता ने दावा किया है कि दोनों कंपनियां पहले भी प्रतिस्पर्धा आयोग में उलझ चुकी हैं। प्रतिस्पर्धा कानून विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले दो-तीन वर्षों के दौरान बदलाव केवल इतना हुआ है कि सीसीआई अब ई-कॉमर्स को खुदरा बिक्री का एक अन्य माध्यम के तौर पर देख रहा है। आयोग खुदरा बाजार को दो श्रेणियों- ऑनलाइन और ऑफलाइन- में बांटकर उन पर अलग से नजर रख रहा है।

मौजूदा जांच का आदेश स्मार्टफोन एवं संबंधित ऐक्सेसरीज के छोटे व्यापारियों के संगठन दिल्ली व्यापार महासंघ की शिकायत पर दिया गया था। आयोग के पास यह शिकायत प्रतिस्पर्धा कानून की धारा 3 (1) और (4) के तहत दी गई है। इसके तहत उत्पादों के एक्सक्लूसिव लॉन्च के अलावा कुछ विक्रेताओं को तरजीह दिए जाने और छूट संबंधी गतिविधियों के कारण बाजार में प्रतिस्पर्धा पर विपरीत प्रभाव पडऩे का मुद्दा उठाया गया है। 

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि भारी छूट और बेहद सस्ती कीमत प्रतिस्पर्धा कानून का उल्लंघन तभी माना जा सकता है जब कोई प्रमुख कंपनी ऐसा करेगी। कानून फर्म लूथरा ऐंड लूथरा के पार्टनर अब्दुल्ला हुसैन ने कहा, 'सीसीआई का आदेश किसी बाजार में फ्लिपकार्ट अथवा एमेजॉन के वर्चस्व की जांच नहीं करता है।'

हालांकि आयोग ने बाजार में दोनों ई-कॉमर्स कंपनियों के संयुक्त वर्चस्व की शिकायत को खारिज कर दिया है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि एमेजॉन-फ्लिपकार्ट के मामले में प्रतिस्पर्धा आयोग दोनों प्लेटफॉर्म की बाजार स्थिति पर गौर कर रहा है जबकि स्मार्टफोन विनिर्माताओं की बाजार स्थिति को नजरअंदाज किया गया है। ट्राईलीगल की पार्टनर एवं राष्ट्रीय प्रमुख (प्रतिस्पर्धा कानून) निशा कौर ओबेरॉय ने कहा, 'यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सीसीआई प्रासंगिक बाजार को किस तरह परिभाषित करता है। ऐसा लगता है कि वह बाजार को दो हिस्सों- ऑनलाइन और ऑफलाइन- में बांटकर देख रहा है।'

नवंबर 2018 में ऑल इंडिया ऑनलाइन वेंडर्स एसोसिएशन ने फ्लिपकार्ट के खिलाफ इसी तरह की शिकायत की थी जिसे प्रतिस्पर्धा आयोग ने खारिज कर दिया था जिससे पता चला था कि भारत में मार्केटप्लेस आधारित ई-कॉमर्स मॉडल खुदरा वितरण के एक हिस्से तौर पर उभर रहा है जो काफी हद तक तकनीक से संचालित है। आयोग ने 2018 के अपने आदेश में कहा था, 'वृद्धि की संभावनाओं के साथ-साथ कुशलता एवं इस बाजारों से ग्राहकों के संभावित फायदे को देखते हुए आयोग का मानना है कि इस प्रकार के बाजारों में कोई भी दखल देने से पहले सावधानी बरतने की जरूरत है ताकि कोई नवाचार न प्रभावित हो।'

आयोग ने 2015 में इन दोनों ई-कॉमर्स कंपनियों के खिलाफ दायर पहली शिकायत को इस आधार पर बंद कर दिया था कि किसी विनिर्माता और ई-पोर्टल के बीच बिक्री संबंधी विशेष व्यवस्था से बाजार में प्रतिस्पर्धा पर शायद ही कोई बुरा प्रभाव पड़ेगा, विशेषतौर पर मोबाइल फोन एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जैसे अधिकतर उत्पाद एकाधिकार अथवा वर्चस्व के दायरे में नहीं थे।

तो क्या पिछले दो-तीन वर्षों के दौरान बदलाव केवल इतना दिख रहा है कि भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने अपना रुख बदल लिया है? ओबेरॉय के अनुसार, बाजार की परिभाषा में बदलाव के लिए आयोग की दलील में डिजिटल बाजार के उभार की रफ्तार भी शामिल है, खासकर ऑनलाइन यात्रा बाजार के संदर्भ में। ओबेरॉय ने कहा, 'डिजिटल बाजार के उभार की रफ्तार पारंपरिक बाजार के मुकाबले काफी तेज है और इसलिए उसका आकलन करने में मौजूदा बाजार की वास्तविकताओं एवं प्रतिस्पर्धा संबंधी पहलुओं पर गौर करना जरूरी है।'

ई-कॉमर्स बाजार पर भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग का ताजा अध्ययन एमेजॉन-फ्लिपकार्ट की जांच के आदेश का लगभग पूर्वगामी है और उससे आयोग के नजरिये में हुए बदलाव का भी पता चलता है। आयोग ने अपने निष्कर्ष को स्व-विनियमन कहा है और उसमें उन्हीं समस्याओं का उल्लेख किया गया है जिनकी जांच ताजा शिकायत के तहत फिलहाल चल रही है।

प्रतिस्पर्धा कानून विशेषज्ञ विनोद ढल ने कहा, 'सीसीआई का यह आदेश अनुचित नहीं है। उसने नई प्रौद्योगिकी के लिए सम्मान दिखाया है और कहा है कि इन कंपनियों को ग्राहकों को फायदा देना चाहिए। ई-कॉमर्स पर यह अध्ययन इस क्षेत्र की बेहतर समझ के लिए किया गया है और उसमें इन समस्याओं को उठाया गया है।'

वैश्विक स्तर पर भी डिजिटल कंपनियों के खिलाफ नियामकीय कार्रवाई में तेजी दिख रही है। हुसैन ने कहा, 'वैश्विक स्तर पर कार्रवाई के लिए मांग उठा रही है क्योंकि गूगल, एमेजॉन, फेसबुक और ऐपल जैसी दिग्गज वैश्विक कंपनियों को उन्हीं मुद्दों के लिए अमेरिका और यूरोप में प्रतिस्पर्धा संबंधी जांच का सामना करना पड़ रहा है जिनका उल्लेख सीसीआई ने अपनी रिपोर्ट में की है।'

विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने पिछले दो वर्षों के दौरान अपने संगठन में काफी बदलाव किया है। सीसीआई के नए चेयरपर्सन ने नवंबर 2018 में अपना पदभार ग्रहण किया और उसके तुरंत बाद दो सदस्यों को नियुक्त किया गया।

हाल में ऑनलाइन यात्रा पोर्टल मेकमाईट्रिप को भी भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग की जांच का सामना करना पड़ा था। अब तक केवल ऑनलाइन फूड डिलिवरी प्लेटफॉर्म ही सीसीआई की जांच के दायरे से बाहर निकल पाए हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि जल्द ही अन्य ऑनलाइन क्षेत्र की अन्य प्रमुख कंपनियों को भी भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के सख्त रुख का सामना करना पड़ सकता है।

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