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शोध के बाद नई सर्पविषरोधी दवा जल्द हो सकती है तैयार

देवांग्शु दत्ता /  January 19, 2020

बेंगलूरु के साइजीनोम रिसर्च फाउंडेशन के सोमशेखर शेषगिरि की अगुआई में 42 वैज्ञानिकों के दल ने नाग की भारतीय प्रजाति नाजा नाजा के जीनोम का क्रम तैयार किया है। इससे जल्दी ही सर्पविषरोधी दवा के उत्पादन की तकनीक में सुधार आ सकता है। साथ ही इससे ऐसी व्यापक सर्पविषरोधी दवा तैयार की जा सकती है जो विभिन्न तरह के सांपों के विष के खिलाफ कारगर साबित होगी। 

सांप के कांटने से भारत में हर साल 46,000 लोगों की मौत हो जाती है। भारत के अलावा पूरी दुनिया में सर्पदंश से सालाना करीब 55,000 लोग मारे जाते हैं। इसी तरह 500,000 लोग सर्पदंश के कारण भारी दर्द, अपंगता और लकवे का शिकार हो जाते हैं और कई लोगों के अंग काटने पड़ते हैं। भारत में सर्पदंश के अधिकांश मामले सांपों की चार प्रजातियों करैत, नाग, सॉ-स्केल्ड वाइपर और रसेल वाइपर से जुड़े होते हैं। हालांकि भारत में विषैले सांपों की 60 से अधिक प्रजातियां हैं। 

सांप का जहर विभिन्न तरह के प्रोटीन और पेप्टाइड का मिश्रण होता है जिसका स्राव विषग्रंथि से होता है। सांप के जहर को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों न्यूरोटॉक्सिक, साइटोटॉक्सिक, कार्डियोटॉक्सिक या हीमोटॉक्सिक में बांटा जा सकता है। अलग-अलग प्रजाति के सांपों में अलग तरह का विष पाया जाता है। न्यूरो विष से लकवा हो सकता है, साइटो विष रक्त कोशिकाओं को तोड़ता है जबकि कार्डियो विष से हृदय काम करना बंद कर सकता है। हीमो विष रक्त में ऑक्सीजन के साथ मिलता है जिससे दम घुट सकता है। सर्पविषरोधी दवा का निर्माण मुश्किल, श्रमसाध्य और महंगी प्रक्रिया है और प्रकृति में इसकी मात्रा बहुत कम है। 

पहले तो सांप को विष संग्रह जार के ऊपर लटकते मांस को काटने के लिए उकसाया जाता है। इस तरह विष एकत्र किया जाता है। इसके बाद इसका बहुत थोड़ा गैर-विषैला हिस्सा घोड़े को इंजेक्ट किया जाता है। घोड़ा एंटीबॉडी बनाकर इसके प्रभाव से लड़ता है। इसके बाद घोड़े के रक्त के प्रसंस्करण से सर्पविषरोधी दवा बनाई जाती है। लेकिन इसमें घोड़े की बीमारियों के लिए विशिष्टï दूसरी एंटीबॉडी भी होती हैं। ये न केवल मनुष्य के लिए अप्रासंगिक है बल्कि इससे भयानक एलर्जी भी हो सकती है। कई सर्पविषरोधी दवाओं को मिलाकर एक व्यापक दवा बनाई जा सकती है लेकिन यह सफल या नाकाम प्रयोग हो सकता है, जहां सर्पविषरोधी दवा कुछ खास सांपों के अलावा दूसरे सांपों के काटने पर कारगर नहीं होगी। इसे सबसे पहले 1890 के दशक में इस्तेमाल किया गया था और आज के आधुनिक तरीके भी कमोबेश उसी तरह के हैं। एक बड़ी बाधा यह है कि शोध के लिए पर्याप्त मात्रा में सर्पविष नहीं है।

'नेचर जेनेटिक्स' में प्रकाशित एक नए शोधपत्र में दावा किया गया है कि नाजा नाजा के 38 गुणसूत्रों में से 95 फीसदी जीनोम डिकोड कर लिया गया है। इसमें विषग्रंथि के जीनोम पर खास जोर दिया गया है। शोध दल ने 14 विभिन्न प्रजातियों के नागों के ऊतकों के जीन एक्सप्रेशन डेटा का इस्तेमाल किया। 

इसमें कहा गया है कि 12,346 जीन विषग्रंथि से ताल्लुक रखते हैं और इनमें 139 का ताल्लुक 33 विषैली प्रकृति के जीन परिवार से हैं। 139 विषैली जीन में से 19 जीन खासतौर पर विषग्रंथि को दर्शाती हैं और संभवत: ये न्यूनतम मुख्य विष प्रभावकारी प्रोटीन को कूटबद्ध करते हैं। शोधकर्ताओं को यह पता लगाने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ी कि कौन सी जीन केवल विषग्रंथि से जुड़ी है। 

विष के निर्माण की गुत्थी सुलझाने और दवा बनाने के लिए 33 विषैले परिवारों से ताल्लुक रखने वाली 139 जीनों का समूह और नाग से जुड़े 19 जीन बेहद अहम हैं। यदि इनका संश्लेषण होता है तो सबसे पहले इनका इस्तेमाल बड़ी संख्या में सिंथेटिक विष बनाने में हो सकता है। फिर इससे सिंथेटिक सर्पविषरोधी दवा बनाया जा सकता है। इस तरह का सिंथेटिक सर्पविषरोधी दवा में एलर्जी पैदा करने वाली घोड़े की एंटीबॉडीज नहीं होगी।

इसमें पुन:संयोजक डीएनए प्रौद्योगिकी मददगार साबित हो सकती है जिसमें विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आनुवंशिक सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। हर विष के आनुवंशिक क्रम को बढ़ाने के लिए खमीर या ई-कोलाई में डाला जाएगा और इससे बड़ी मात्रा में अलग-अलग विष का उत्पादन होगा। फिर हर विष को मानव ऐंटीबॉडी के साथ मिलाया जाएगा ताकि यह पता लगाया जा सके कि कौन सा विष कारगर है। फिर विभन्न प्रकार के विष के मिश्रणों के साथ ऐसा किया जा सकता है। 

यह प्रक्रिया बेहद जटिल और श्रमसाध्य है लेकिन इससे बेहतर सर्पविषरोधी दवा बन सकती है। एक बार दूसरे सांपों का जीनोम मैप होने के बाद व्यापक सर्पदंशरोधी दवा बन सकती है। इससे आधुनिक प्रयोगशाला प्रक्रियाएं भी विकसित हो सकती हैं जिससे घोड़े को शामिल किए बिना उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। यह प्रक्रिया महंगी होगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2030 तक सर्पदंश से होने वाली मौतों की संख्या आधा करने का लक्ष्य रखा है। इसलिए नई सर्पदंशरोधी दवा बनाने के लिए पैसों की समस्या नहीं होगी।

शोध के अनुसार, जीनोम को सर्प जीनोम के लिए संदर्भ के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, यह आगे आने वाले अध्ययनों में मददगार साबित हो सकता है और इससे विष आधारित औषधि की खोज का रास्ता साफ होगा। विष से जुड़ी विशिष्टï जीनों की पहचान के लिए जिन विधियों का इस्तेमाल किया गया, उन्हें दूसरे सांपों के जीनोम को डिकोड करने में उपयोग किया जा सकता है। सांप के विष के प्रभावों को अभी तक अच्छी तरह नहीं समझा गया है लेकिन विष के सक्रिय तत्त्वों से कई तरह की दवाएं बनाई जाती हैं। इनसे रक्तचाप काबू में रखने और थक्के को तोडऩे में मदद मिलती है। इस तरह यह शोधपत्र सर्पदंश के खिलाफ लड़ाई में एक बड़ी कामयाबी है। डब्ल्यूएचओ ने सर्पदंश को उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारी में श्रेणीबद्ध किया है।

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