बिजनेस स्टैंडर्ड - भारतीय 'बनिया' पार्टी की वापसी
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भारतीय 'बनिया' पार्टी की वापसी

शेखर गुप्ता /  January 19, 2020

उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने अपने उस वक्तव्य पर तुरंत स्पष्टीकरण दे दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि एमेजॉन के संस्थापक जेफ बेजोस भारत में निवेश करके उस पर कोई अहसान नहीं कर रहे हैं। अब उनका कहना है कि हर तरह के निवेश का स्वागत है, बशर्ते कि वह देश के नियमों के अनुरूप हो। इस पर बहस मुमकिन नहीं।

इसके साथ ही हमें यह ध्यान रखना होगा कि कारोबार में एकाधिकार पर दृष्टि रखने वाले भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने बीते दिनों 'अनुचित' कारोबारी व्यवहार के लिए एमेजॉन की खिंचाई की थी। स्वदेशी जागरण मंच और व्यापारी संघों ने इसकी जमकर सराहना की थी। यह कोई दुष्टतापूर्ण षडयंत्र नहीं बल्कि विशुद्ध राजनीति है। यह केवल इस बात को रेखांकित करता है कि भाजपा बनियावाद की अपनी मूल प्रवृत्ति की ओर लौट रही है। इसे स्पष्ट किए जाने की जरूरत है। राजीव गांधी के बाद कांग्रेस और वाम ने भाजपा को हिंदू पार्टी कहना शुरू कर दिया।

उससे पहले दशकों तक इंदिरा गांधी ऐसा कहने से बचती थीं। इससे पहले इसी स्तंभ में मैंने आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइजर के पूर्व संपादक शेषाद्री चारी को उद्धृत किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि इंदिरा गांधी भाजपा को बनिया पार्टी कहा करती थीं। इन दिनों भाजपा उन्हें सही साबित करते हुए अपनी वणिक मानसिकता में लौटती नजर आ रही है।

स्वदेशी का दर्शन ऐसे ही उत्पन्न होता है। यानी अगर किसी को व्यापार या उद्यमिता से लाभ मिलना है तो अच्छा हो कि वह हमारे लोगों को ही मिले। यदि हम बाहरी लोगों को कारोबार करने भी देते हैं तो बेहतर होगा वह हमारे अहसानमंद हों। इसमें कई मजबूत भावनाओं का मिश्रण हो जाता है: राष्ट्रवाद, संरक्षणवाद, वाणिज्यवाद और दंभ इसमें शामिल हैं। आखिर आप हैं कौन जो हमारे बाजार में आकर, देसी कारोबारियों को प्रतिस्पर्धा से बाहर करके आशा करते हैं कि मैं आपका धन्यवाद करूं?

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का फैशन सन 1990-91 में शुरू हुआ। उस वक्त शीतयुद्ध समाप्त हुआ था और वही वक्त था जब देश में आर्थिक संकट बढ़ रहा था। विश्वनाथ प्रताप सिंह की कैबिनेट में मधु दंडवते वित्त मंत्री थे। उन्होंने कुछ ऐसा कहा था कि वह एफडीआई के खिलाफ नहीं हैं लेकिन वे इसकी तलाश में नहीं निकलेंगे। चूंकि वह पुराने समाजवादी थे इसलिए उनके एफडीआई को बेमन से स्वीकार करने को भी खुशी की वजह माना गया लेकिन इससे विदेशी निवेशक आकर्षित नहीं हुए। सन 1991 के सुधार से हालात बदलने लगे लेकिन आंतरिक रुख नहीं बदला। देश पहले ही चार दशक की समाजवादी, संरक्षणवादी, स्वदेशी व्यवस्था से गुजर चुका था जहां निर्यात अच्छा था और आयात बुरा।

इसका असर तमाम राजनीतिक फलक पर पड़ा था। आर्थिक दक्षिणपंथ की बात करें तो एक समय ताकतवर रही स्वतंत्र पार्टी इंदिरा गांधी की लोकप्रियता में पूरी तरह ध्वस्त हो गई। उस वक्त तक जन संघ भी वही समाजवादी तराना गुनगुना रहा था और अपने आर्थिक राष्ट्रवाद की चहारदीवारी में कैद था। आधुनिक मुक्त व्यापार की दृष्टि देखें तो अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा के इकलौते सुधारवादी नेता रहे लेकिन उनके पास वक्त कम था।

निष्पक्ष होकर कहें तो पुरानी विचारधाराएं बहुत रूढ़ होती हैं। इन्हें कई वर्ष बीतने पर भी न तो मोड़ा जा सकता है और न ही सीधा किया जा सकता है। कुछ नेता अपने स्तर पर अवश्य बदलाव पैदा कर सकते हैं: कांग्रेस के लिए पीवी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह और भाजपा के लिए वाजपेयी ने ऐसा किया।

बीते साढ़े पांच वर्ष में हमें संरक्षणवाद, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विरोध आदि की तीव्र वापसी देखी है। यह सरकार आयात की तुलना में भारत में बनी पूंजीगत वस्तुओं को 20 फीसदी का लाभ देती है। यह पुराने दौर की वापसी की तरह है। इसका अर्थ यह हुआ कि एक विदेशी कंपनी अब टुकड़ों में अपनी सामग्री भारत में लाकर यहां उससे माल तैयार करे और अगर वह एक भारतीय अल्पांश भागीदार के साथ मिलकर उसकी बिक्री करे तो आयात की तुलना में कहीं अधिक ऊंची कीमत पर उस माल को बेच सकती है। एक के बाद एक बजट में हमने देखा है कि टैरिफ में इजाफा किया जा रहा है, क्षेत्रवार संरक्षण बढ़ाया जा रहा है। इस्पात इसका स्पष्ट उदाहरण है। नियामकों समेत तमाम संगठन विदेशी निवेशकों के पीछे हैं। खासतौर पर खुदरा क्षेत्र में। पिछले बजट के बाद और उसे लेकर भाजपा की बहस को देखें तो आयात प्रतिस्थापन की भुला दी गई भावना ने वापसी कर ली। 

वैश्विक कारोबारी समुदाय का मोदी शासित भारत से लगाव समाप्त होने की यह भी एक वजह रही। सार्वजनिक रूप से कोई यह बात नहीं स्वीकारेगा। ऐसे कारोबारी तो बिल्कुल नहीं जिन्होंने भारत में निवेश किया हो या जिनके कर्मचारी या अन्य हित भारत में हों। एक मजबूत सरकार से कौन पंगा लेना चाहेगा? वोडाफोन जैसी मजबूत कंपनी के सीईओ ने दुखी होकर भारत छोडऩे की बात कही लेकिन फिर उन्हें अपनी बात वापस लेनी पड़ी। यह बात अलग है कि नियामकीय कार्रवाइयों और कर झटकों के चलते अरबों की राशि गंवाने तथा व्याप्त अनिश्चितता के बाद उन्हें अभी भी यही करना पड़े। इसके और प्रमाण चाहिए तो देखें कैसे सन 2014 में जेफ बेजोस की पिछली भारत यात्रा के वक्त मोदी और अन्य ने उनका इस्तकबाल किया था और कैसे इस बार उन्हें उपेक्षित किया गया।

इस बार भी स्पष्टीकरण सन 1990 के दंडवते जैसा ही है: मैं एफडीआई के खिलाफ नहीं हूं लेकिन... आप अब भी जानना चाहते हैं कि यह भावना कहां से आ रही है? आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के गत वर्ष दशहरे के अवसर पर दिए भाषण के कुछ हिस्सों को दोबारा सुनिए जिसमें वह अपना आर्थिक सिद्धांत सामने रखते हैं। हम इसे एक शब्द में परिभाषित कर सकते हैं: संरक्षणवादी, विदेशियों से भय, स्वदेशी। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि हम एफडीआई के खिलाफ नहीं हैं लेकिन केवल उन्हीं क्षेत्रों में जहां हमें उसकी जरूरत है। जब तक यह देश के कारोबारों को नुकसान नहीं पहुंचाता और नियंत्रण भारतीयों के पास रहता है।

मोदी सरकार के कार्यकाल के छठे वर्ष में यह देखना गौरतलब है कि वह नागपुर की आकांक्षाओं का किस कदर ध्यान रख रही है। गाय, अनुच्छेद 370, सीएए, तीन तलाक, पाकिस्तान विरोध आदि सभी मोर्चों पर उसने इसका ध्यान रखा है। वाजपेयी की तरह आरएसएस की उपेक्षा करने के बजाय मोदी सरकार ने उसके साथ तालमेल बिठाने में दो दशक के सुधारों की दिशा उलट दी है। सन 2014 में और उसके बाद 2019 में भारत ने एक मजबूत सरकार और प्रधानमंत्री चुना क्योंकि वह दशकों तक मनमोहन सिंह के अधीन कमजोर सरकार से त्रस्त हो चुका था। यह सरकार कई क्षेत्रों में मजबूत और निर्णायक साबित हुई। आतंकी हमलों के विरोध से लेकर अनुच्छेद 370 और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई तक। परंतु आर्थिक मोर्चे पर नहीं। खामीयुक्त जीएसटी और आईबीसी के अलावा कोई बड़ा सुधार नजर नहीं आता।

जरा इस बारे में सोचिए। मनमोहन सिंह जैसी कमजोर सरकार के पास भी यह साहस था कि वह भारत-अमेरिका नाभिकीय समझौता कर सके। ऐसा करके उसने देश की भूसामरिक स्थिति को बदल दिया था। जबकि मोदी की मजबूत सरकार अमेरिका के साथ एक छोटा व्यापार समझौता तक नहीं कर पा रही। वाजपेयी की कमजोर सरकार ने जीएम बीजों की इजाजत देकर कपास क्रांति लाने में मदद की। मोदी की मजबूत सरकार कृषि जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आगे बढऩे का साहस नहीं जुटा पा रही। वाजपेयी जिन स्वदेशी वालों की परवाह नहीं करते थे वह उनके लिए फिक्रमंद है।

यहां एक पुरानी दलील सामने आती है: क्या मजबूत और पूर्ण बहुमत की सरकारें  अनिवार्य तौर पर बेहतर होती हैं या वे इस उलझन में रहती हैं कि कहीं उन्हें नुकसान न उठाना पड़े। उनके पास सैद्धांतिक आग्रहों और मजबूरियों का बहाना नहीं होता। वे निरंतर अपना चेहरा बचाने के दबाव में रहती हैं। क्या कमजोर सरकारें अधिक निर्णायक और जोखिम से मुक्त होती हैं क्योंकि उनमें लचीलापन और विनम्रता अधिक होती है? यह उकसाने वाला मुद्दा है। इसे इसीलिए उठाया भी गया है।
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