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तमिल शरणार्थियों को मिलेगी नागरिकता

गिरीश बाबू /  January 19, 2020

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार को कहा है कि तमिल शरणार्थी भले ही मौजूदा नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), 2019 का हिस्सा नहीं हैं लेकिन इसके बावजूद श्रीलंका के 95,000 तमिल शरणार्थियों को नागरिकता देने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। उनका कहना था कि पिछले छह सालों में 2,838 पाकिस्तानी नागरिकों, 912 अफगानी और 172 बांग्लादेशी शरणार्थियों सहित मुसलमानों को भारतीय नागरिकता दी गई और ये आंकड़े यह साबित करते हैं कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ लगाए जा रहे आरोप गलत हैं। नागरिकता संशोधन कानून पर चेन्नई सिटिजंस फोरम और न्यू इंडिया फोरम द्वारा आयोजित इवेंट को संबोधित करते हुए सीतारमण ने कहा कि 1964 और 2008 के बीच 4.61 लाख श्रीलंकाई तमिलों को भारतीय नागरिकता दी गई। 

नागरिकता संशोधन कानून, 2019 में श्रीलंका के तमिलों को क्यों नहीं शामिल किया गया है इस सवाल का जवाब देते हुए वित्त मंत्री ने कहा, 'कभी-कभी एक खास वर्ग को नागरिकता देने के लिए कानून में संशोधन किया जाता है। जब श्रीलंका के तमिल शरणार्थियों को नागरिकता दी जा रही थी तब आप यह पूछ सकते थे कि पाकिस्तान से आए लोगों को नागरिकता देने पर विचार क्यों नहीं किया गया था। मौजूदा संशोधित कानून में श्रीलंकाई तमिल शरणार्थियों का विकल्प नहीं देने का यह मतलब नहीं है कि उन्हें नागरिकता नहीं दी जाएगी। कानून के ही एक अंश में कुछ संशोधन किया गया है। 95,000 लोग अब भी शरणार्थी शिविरों में हैं। उन्हें भी नागरिकता देने की प्रक्रिया होगी।'

उन्होंने कहा कि सरकार ने पड़ोसी देशों के शरणार्थियों को नागरिकता दी है और उनमें मुस्लिम हैं। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के कुल 566 मुसलमानों को 2014 से ही नागरिकता दी गई है जिनमें पाकिस्तानी गायक अदनान सामी भी हैं जिन्हें 2016 में नागरिकता मिली है। वर्ष 2016-18 के दौरान 391 अफगानी और 1595 पाकिस्तानियों को नागरिकता दी गई थी। सरकार ने उन लोगों को मुआवजा भी दिया है जो पाकिस्तान से यहां आए थे। सरकार पाकिस्तान से आने वाले लोगों को मुआवजा भी देती रही है।  

वर्ष 2014 में पाकिस्तान से आने वाले 36,384 परिवारों को एक बार वित्तीय मदद दी गई थी। वर्ष 2019 में मंत्रिमंडल ने छंब से देश के दूसरे हिस्से में आने वाले और बाद में जम्मू कश्मीर क्षेत्र में जाने वाले 5,300 परिवारों को भी नागरिकता देने का फैसला किया जो पहले मुआवजे से वंचित रह गए थे। उन्होंने कहा, 'नागरिकता संशोधन कानून और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी)  को जोडऩा सही नहीं है क्योंकि एनआरसी के ब्योरे पर चर्चा नहीं हुई है और न ही उसे अंतिम रूप दिया गया है। जो लोग आरोप लगा रहे हैं और विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं उनका मानना है कि असम में चल रही एनआरसी की प्रक्रिया बाकी देश में भी लागू होगी। असम की एनआरसी प्रक्रिया उच्चतम न्यायालय के संज्ञान में हो रही है और यह उस क्षेत्र की जरूरत है।'

जम्मू कश्मीर सरकार के आंकड़े के मुताबिक करीब 50,000-1,00,000 कश्मीरी मुस्लिम और 1,50,000-3,00,000 कश्मीरी हिंदू आतंकवाद की वजह से विस्थापित हुए थे। एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के मुताबिक पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से तीन लाख से ज्यादा लोग देश के विभिन्न राज्यों में गए। 

उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा कि वह राज्यों का दौरा करते हुए नागरिकता संशोधन कानून का ब्योरा दे रही हैं और साथ ही वह केंद्रीय बजट पर भी काम कर रही है जिसे 1 फरवरी को संसद में पेश किया जाएगा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आयोजित उद्योग बैठक में अनुपस्थित रहने के आरोपों के संदर्भ में कहा कि वह अपना काम कर रही थीं और सरकार के संदेश को आम जनता तक पहुंचा रही थीं जो उनका कर्तव्य भी है। उन्होंने पिछली जुलाई में बजट पेश किए जाने के बावजूद आर्थिक उपायों से जुड़ी घोषणाएं हर शुक्रवार को किए जाने की आलोचना का जवाब देते हुए कहा था कि उन्होंने सभी सेक्टर की बात सुनने के बाद वे घोषणाएं की थीं और उनके मुद्दों का हल करने के लिए वे फैसले लिए थे। उन्होंने कहा, 'बिना कुछ जाने, आधी-अधूरी सूचनाओं के आधार पर विपक्ष यह आरोप लगा रहा है कि मुझे बैठक में बुलाया नहीं गया था। यह बैठक नीति आयोग ने आयोजित की थी और उन्होंने मेरे साथ-साथ सभी को बुलाया था। मैंने कहा था कि मैं बैठक में हिस्सा नहीं ले पाऊंगी क्योंकि एससी/एसटी सदस्यों, एमएसएमई उद्योग के सदस्यों और अन्य लोगों के साथ मेरी बैठक पहले से ही तय है। इस बैठक की योजना एक-डेढ़ महीने पहले ही तय हो गई थी। क्या मुझे यह कहना चाहिए था कि मैं प्रधानमंत्री की बैठक की वजह से इसमें शामिल नहीं हो पाऊंगी और वे दिल्ली की ठंड में मेरा इंतजार करें? मेरी पार्टी ऐसी नहीं है।'

देश के आर्थिक हालात को देखते हुए क्या यह वक्त नागरिकता संशोधन कानून के लिए सही था, इस पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि शरणार्थियों को नागरिकता देने का काम काफी लंबे समय से लंबित था और विचार यह था कि इसे जितनी जल्दी संभव हो उसे करना है। इसकी चर्चा पार्टी के घोषणापत्र में भी की गई और एक बार कांग्रेस के घोषणापत्र में भी यही एजेंडा था। उन्होंने कहा कि राज्य विधानसभा नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर सकते हैं लेकिन राज्यों का यह कहना संवैधानिक नहीं है कि वे इस कानून पर अमल नहीं करेंगे। सीतारमण ने राज्यों के ऐसे प्रस्ताव को असंवैधानिक  करार दिया।
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