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अमेरिका में असमानता को सामने रखते शैक्षणिक तथ्य

पार्थसारथि शोम /  January 17, 2020

शैक्षणिक आंकड़ों से भी इस बात की पुष्टि होती है कि अमेरिका के समाज में असमानता बढ़ी है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं पार्थसारथि शोम

 
गत माह अपने स्तंभ में मैंने अमेरिका में बढ़ती असमानता का जिक्र किया था। बीसवीं सदी के अंत तक वहां आर्थिक वृद्घि धीमी पड़ चुकी थी तथा आय और संपत्ति की असमानता में इजाफा हुआ था। जो भी लाभ थे वे आबादी के एक छोटे हिस्से को मिले जो शीर्ष पर था। सन 2003 में जब थॉमस पिकेटी और एमेनुएल साएज ने पर्चे में फ्रांसीसी आंकड़ों का इस्तेमाल करके यह दर्शाया था कि सन 1970 और 1980 के दशक में शीर्ष पर आय और उसके घटकों में चक्करदार वृद्घि देखने को मिली थी। उसके बाद कर आंकड़ों के इस्तेमाल से विश्लेषण का चलन बढ़ा था। 
 
बाजार का तथाकथित 'प्राकृतिक कानून' जो आश्वस्त करता था कि अर्थव्यवस्था के विकसित होने का लाभ सभी को मिलेगा, वह विफल हो गया। पूंजी पर प्रतिफल की दर आर्थिक वृद्घि की दर से आगे निकल गई और असमानता में इजाफा होने लगा। आर्थिक वृद्घि के क्षेत्र के जानकार रॉबर्ट सोलो ने दोहराया कि समतामूलक वृद्घि केंद्रीय आर्थिक विषय है। आय का वितरण तेजी से असमान होता गया। संपत्ति के आगमन ने इसमें अहम भूमिका निभाई। संपत्ति का एक हिस्सा जिसमें पैसा, परिसंपत्ति, शेयर, बॉन्ड और अन्य तरह की पूंजी शामिल है, को छिपाया जा सकता है। गैब्रिएल जकमैन के अनुसर विश्व के सकल घरेलू उत्पाद का 11.5 फीसदी हिस्सा यानी करीब 8.7 लाख करोड़ डॉलर की राशि विदेशी खातों में छिपाई गई है। 
 
आय और संपत्ति वितरण की स्थिति खराब होने से वृहद आर्थिक पहलुओं का विश्लेषण होने लगा और यह सामने आने लगा कि कैसे खराब वितरण ने अर्थव्यवस्था और उसकी गतिविधियों को प्रभावित किया। हीथर बाउशे ने इसकी व्यापक समीक्षा की। राज चेट्टी ने असमानता को कुछ इस प्रकार देखा, 'आय वितरण को देखा जाए तो मध्य वर्ग और निम्र वर्ग के कुछ ही बच्चे अपने माता-पिता से बेहतर स्थिति में हैं।' ऐसा करते हुए वह सन 1960 और 1970 के दशक की उपलब्धियों का प्रतिकार करते हैं। चेट्टी तथा अन्य का अनुमान है कि यदि आय और संपत्ति में असमानता पर नियंत्रण रहता तो विशुद्ध गतिशीलता में 70 फीसदी की कमी नहीं आती।
 
आर्थिक असमानता से स्वास्थ्यगत असमानता उत्पन्न हुई और लोगों द्वारा हासिल किए जाने वाले कौशल में भी अंतर आया। क्लॉडिया गोल्डिन, लॉरेंटस काट्ज, जैनेट क्यूरी, डगलस अलमॉन्ड और डंकन थॉमस ने इसे कई तरह से दर्शाया।  ब्रिटेन में एक ही सप्ताह में पैदा हुए 17,000 बच्चों पर किशोरावस्था में अध्ययन किया गया कि पता चला कि जो बच्चे स्वस्थ थे उन्होंने हाईस्कूल अंग्रेजी और गणित अच्छे से पास की। उन्हें रोजगार भी ज्यादा मिले और 33 वर्ष की उम्र में उनका वेतन भी दूसरों से अधिक था। इसी आधार पर सन 1999 में क्यूरी और रोजमैरी हायसन ने यह नतीजा निकाला कि जन्म के समय बच्चों के स्वास्थ्य का संबंध बड़ी उम्र में उनके स्वास्थ्य से है। वहीं वयस्क रोजगार का संबंध जन्म के समय कम वजन से है। स्पष्ट है कि विद्यालय में बच्चों और परिवार का व्यवहार तथा बिताए गए वर्ष काफी हद तक भविष्य का निर्धारण करते हैं। महामारीविद डेविड बार्कर ने बीमारियों के मामले में जेनेटिक या खराब जीवन शैली के बजाय माओं के पोषण और स्वास्थ्य को अहम बताया। अन्य लोगों ने जन्म के समय के वजन को हाईस्कूल पास करने की संभावना से जोड़ा। शोधकर्ताओं ने माना कि मातापिता की स्थिति जीवन भर प्रभावित करती है।
 
शिक्षा में अंतर का संबंध भी असमानता से है। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन के 31 देशों में बच्चों का ध्यान रखे जाने की बात करें तो इस क्रम में अमेरिका 20वें स्थान पर आता है। वहीं प्रीस्कूल नामांकन के मामले में वह 29वें स्थान पर है। संयुक्त लेखन करने वालों द्वारा करीब आधी सदी पहले कम आय वर्ग वाले मिशिगन परिवारों के 123 अफ्रीकी अमेरिकी बच्चों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि 3-4 वर्ष की उम्र में बच्चे यादृच्छिक रूप से बेहतर गुणवत्ता वाले प्रीस्कूल में शामिल हुए या उससे बाहर रहे। जब ये बच्चे 40 के आसपास की उम्र में पहुंचे तो जिन बच्चों ने प्रीस्कूल की पढ़ाई की थी उनके स्कूली पढ़ाई पूरी करने का प्रतिशत ज्यादा था। कॉलेज में भी वे ज्यादा गए, उनकी आय अधिक थी, आवास के मामले में स्थायित्व था और पारिवारिक रिश्तों में बेहतरी थी।
 
शिक्षा में अंतर, संसाधनों तक पहुंच में अंतर के रूप में भी सामने आता है। केरिस कूपर और किटी स्टीवर्ट ने सन 1988 से 2012 के बीच के शोध के आधार पर निष्कर्ष दिया कि गरीब बच्चों का प्रदर्शन उनकी गरीबी की बदौलत खराब रहा। स्पष्ट था कि उन परिवारों के पास पैसा पहुंचने पर उनका प्रदर्शन बेहतर होता।  केवल नकदी नहीं बल्कि मां का पोषण, साफ पेयजल, प्री-स्कूल सेवाएं, स्कूल की गुणवत्ता, पड़ोस की सुरक्षा, पुस्तकालय, पार्क, चिडिय़ाघर, संग्रहालय आदि सभी का बच्चों पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा। बेहतर परिवार कल्याण के लिए माता-पिता को सवैतनिक अवकाश देने की बात की गई। हालांकि अमेरिका इस मामले में भी यूरोप से पीछे है। गैरे रामे और वैलेरी रामे की दलील है कि कॉलेज शिक्षा प्राप्त मां-बाप बच्चों के साथ अधिक समय बिताते हैं ताकि उन्हें शीर्ष कॉलेजों में दाखिला मिल सके। जाहिर है ऐसा न होने पर बच्चे प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाएंगे।
 
नतीजा पेश करते हुए बाउशे का कहना है कि बच्चों और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर उनके प्रभाव को समग्रता में देखना होगा।  बाउशे के मुताबिक इसके लिए कुछ कदम उठाए जाने चाहिए: (1) हर बार जब आधिकारिक रूप से आय और संपत्ति में वृद्धि के आंकड़े दिए जाएं तो बताया जाए कि आय और संपत्ति का वितरण किस प्रकार हुआ। (2) अवसरों को शीर्ष लोगों तक सीमित न रहने दिया जाए क्योंकि इससे अन्य लोगों के अवसर या लाभान्वित होने की संभावना प्रभावित होती है। (3) इसे हासिल करने के लिए सामाजिक आर्थिक नीति ऐसी हो कि बेहतर बाल स्वास्थ्य, प्रीस्कूल, सरकारी स्कूल और जन स्वास्थ्य हासिल किया जा सके। (4) बुनियादी निवेश को प्राथमिकता दी जाए। (5) समुचित प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाने और आर्थिक वृद्धि को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने वालों का नियमन। (6) एकाधिकार पर लगाम ताकि अधिक सरकारी राजस्व अर्जित किया जा सके, उसका इस्तेमाल जरूरी व्यय में किया जा सकता है। (7) कामगारों की सामूहिक मोलभाव की क्षमता में इजाफा और (8) ऐसे वित्तीय उत्पादों में पूंजी निवेश को हतोत्साहित करना जो वास्तविक उत्पादक गतिविधि में शामिल नहीं होते या आर्थिक स्थिरता नहीं बढ़ाते।
Keyword: america, education,,
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