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आम समझ से अलग

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  January 17, 2020

मोदी सरकार को अभी जो सबक सीखने हैं उनमें से एक यह भी है कि आर्थिक समस्याओं का हल आम समझ के प्रतिकूल भी हो सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो जरूरी नहीं कि पहली नजर में जो आपको अच्छा लगे वही सही हो। जैसा कि हमने नोटबंदी के समय देखा, काले धन की समस्या का हल नकदी की जमाखोरी पर हल्लाबोल कर नहीं निकाला जा सका क्योंकि अधिकांश पुराने नोट रिजर्व बैंक के पास वापस आ गए। इसी तरह कर में कमी का हल अनिवार्य तौर पर कर दरों में इजाफा करना नहीं है। गौरतलब है कि वस्तु एवं सेवा कर के संदर्भ में थोड़े समय के लिए ही सही, यह हल सुझाया गया था। इसी तरह व्यापार घाटे का हल आयात प्रतिबंधित करना नहीं है। सन 1991 का अनुभव हमें दिखा चुका है कि व्यापक व्यापार घाटे का हल अर्थव्यवस्था को खोलना ही है, न कि संरक्षणवादी उपाय अपनाना। इसी प्रकार निर्यात को प्रोत्साहन देने का काम निर्यात सब्सिडी समाप्त करके अधिक बेहतर ढंग से किया जा सकता है, बजाय कि रुपये के बाहरी मूल्य को समायोजित करने के। 

 
यदि हालिया अनुभवों को देखें तो लगता है कि ये अथवा ऐसे अन्य सबक सीखे नहीं गए हैं। ऐसे में औषधि कीमतों में बढ़ोतरी की प्रतिक्रिया स्वरूप कीमतों की अधिकतम सीमा तय कर दी गई। गत सितंबर में घरेलू बाजार में प्याज की कमी की प्रतिक्रिया स्वरूप निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया। जैसा कि डॉनल्ड ट्रंप की व्यापारिक नीतियों का विरोध करने वालों ने कहा भी था कि चीन से आने वाली वस्तुओं पर अतिरिक्त आयात शुल्क लागू करने से घरेलू आपूर्ति की लागत में इजाफा हुआ। जेपी मॉर्गन के अनुसार इससे एक परिवार के सालाना बजट में 1,000 डॉलर का बोझ पड़ा। भारत में भी किसी को ऐसी कवायद करनी चाहिए ताकि इस्पात आयात पर लगे अतिरिक्त शुल्क, टैरिफ बढ़ोतरी और देश को विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए दी जाने वाली निर्यात सब्सिडी, कुछ वस्तुओं के आयात पर लगने वाले अतिरिक्त शुल्क आदि की लागत निकाली जा सके। इसके अलावा मलेशिया से पाम ऑयल के आयात पर लगे प्रतिबंध और तुर्की से पेट्रोलियम आयात पर रोक आदि की भी लागत निकाली जानी चाहिए।
 
इसके बाद जेफ बेजोस और एमेजॉन को लेकर हमारी प्रतिक्रिया में बेअदबी की झलक रही। विश्व व्यापार में एक फर्म के भीतर होने वाले कारोबार और वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सा बनने के महत्त्व को देखते हुए बेजोस के 10 अरब डॉलर के अतिरिक्त निर्यात के वादे की सरकार को सराहना करनी चाहिए थी या कम से कम शांत रहना चाहिए था। परंतु इसके उलट सरकार का उत्तर मित्रतापूर्ण होने से कोसों दूर था। यकीनन इसमें इस तथ्य का भी योगदान होगा कि बेजोस एक समाचार पत्र के मालिक भी हैं जो मोदी सरकार का आलोचक है। इसकेअतिरिक्त छोटे व्यापारियों की लॉबी का दबाव भी होगा जिन्हें डर है कि वे भारी नकदी वाली एमेजॉन जैसी कंपनी का मुकाबला नहीं कर पाएंगे। ऐसी ही समस्याओं से निपटने के लिए प्रतिस्पर्धा आयोग का गठन किया गया था। हालांकि वह उस वक्त कदम नहीं उठाता जब उसे उठाना चाहिए। जियो का मामला हमारे सामने है। व्यापक बात यह है कि छोटे स्टोर मालिकों के पास यह क्षमता नहीं है कि वे व्यापक आपूर्ति शृंखला बना सकें। वे विनिर्माण आधार भी नहीं बना सकते और न ही गुणवत्तापूर्ण रोजगार दे सकते हैं। जाहिर है सरकार का रुख गलत था।
 
झारखंड इसका विशेष उदाहरण प्रस्तुत करता है जहां वस्त्र उद्योग में नियोक्ताओं को प्रति कर्मचारी प्रति माह 5,000 रुपये की सब्सिडी प्रदान की जाती है। यह देश में वस्त्र उद्योग में प्रतिस्पर्धा की कमी को दर्शाता है। ध्यान रहे कि श्रम की लागत को प्रतिस्पर्धा में कमी की सबसे अहम वजह नहीं माना जा सकता है क्योंकि चीन दुनिया का सबसे बड़ा वस्त्र निर्यातक है जबकि उसकी श्रम लागत काफी ज्यादा है। हालांकि उक्त सब्सिडी पर उद्योग जगत सकारात्मक दिख रहा है। परंतु इसे अच्छी खबर मानने में संदेह ही है।
 
किसी भी उद्योग को यदि व्यापक प्रोत्साहन मिलेगा तो वह निवेश करेगा लेकिन करदाताओं के पैसे का इससे कहीं बेहतर उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए। बेहतरीन की तलाश में ऐसे तमाम शिथिल समझौते कर लिए जाते हैं जो दिक्कतदेह हो सकते हैं। ऐसे समझौतों से ही उच्च लागत वाली ऐसी अर्थव्यवस्था निर्मित हो जाती है जिसके साथ हम लंबे अरसे तक रहे और अभी हाल फिलहाल तक हम जिससे दूरी बनाने में लगे थे।
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