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आम बजट : कृषि क्षेत्र के लिए सरकार को क्या करना चाहिए?

ए के भट्टाचार्य /  01 16, 2020

क्या केंद्र सरकार कृषि पर पर्याप्त खर्च कर रही है? आम बजट से पहले यह सवाल फिर सुर्खियों में है। खासकर, इसलिए क्योंकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए ज्यादा संसाधनों के आवंटन की मांग की जा रही है। इसके पीछे यह सोच है कि कृषि पर व्यय बढऩे से भारतीय किसानों के हाथों में खर्च करने योग्य आय बढ़ेगी और मांग बढऩे से ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी पटरी पर लौटेगी। ऐसे में सरकार को क्या करना चाहिए?

पिछले कई केंद्रीय बजट में वित्त मंत्रियों ने भाषणों में किसानों के कल्याण के वास्ते बड़ी-बड़ी बातें कीं लेकिन कृषि क्षेत्र के लिए बजट का पर्याप्त आवंटन नहीं किया। उदाहरण के लिए 2017-18 का ही बजट लीजिए जिसके लिए अंकेक्षित आंकड़े उपलब्ध हैं। इसमें करीब एक दर्जन पैराग्राफ किसानों को समर्पित थे। लेकिन पिछले साल जुलाई में जारी 'बजट: एक नजर' दस्तावेज के मुताबिक कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों पर कुल 52,628 करोड़ रुपये की राशि खर्च होने का अनुमान है जो 2017-18 में सरकार के कुल व्यय का महज 2.45 फीसदी है। 

फरवरी 2019 में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) की घोषणा के बाद इसमें थोड़ा अंतर आया है। 2019-20 के अंतरिम बजट में इस योजना की घोषणा की गई थी और इसके तहत दो हेक्टेयर से कम जोत वाले सभी किसानों को सालाना 6,000 रुपये नकद देने का वादा किया गया था। इस योजना को पिछली तारीख से 1 दिसंबर, 2018 से लागू किया गया और देश में करीब 86 फीसदी कृषि योग्य भूमि इसके दायरे में हैं। 

कृषि और संबंधित गतिविधियों पर सरकार का खर्च 2018-19 में बढ़कर 86,602 करोड़ रुपये पहुंच गया जो उस साल सरकार के कुल खर्च का 3.5 फीसदी था। अगर इसमें से पीएम-किसान की राशि को हटा दें तो कृषि क्षेत्र पर सरकारी व्यय केवल 66,602 करोड़ रुपये यानी सरकार के कुल खर्च का महज 2.7 फीसदी था। 

2019-20 में पूरे साल के लिए पीएम-किसान योजना की राशि दी गई जिससे कृषि और संबंधित गतिविधियों पर सरकार का खर्च बढ़कर 1.51 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया जो कुल सरकारी खर्च का करीब 5.4 फीसदी है। उल्लेखनीय है कि इसमें से करीब आधी राशि (75,000 करोड़ रुपये) पीएम-किसान के हिस्से की थी। सरकार ने अब इस योजना का दायरा बढ़ाकर सभी किसानों को इसमें शामिल कर लिया है जिससे इसका वार्षिक व्यय बढ़कर 89,000 करोड़ रुपये पहुंचने की संभावना है। कृषि और उससे संबंधित गतिविधियों पर सरकारी खर्च में पीएम-किसान की सबसे अधिक हिस्सेदारी है। संभवत: हाल के वर्षों में यह किसानों के लिए सबसे बड़ी बजट घोषणा थी। किसानों के बैंक खातों में प्रत्यक्ष नकदी अंतरण कृषि पर खर्च का सबसे जरिया बन गया है। 

शायद यही आगे का रास्ता है। किसानों को प्रत्यक्ष नकदी अंतरण के तहत ज्यादा राशि दीजिए और उन्हें ही यह करने दीजिए कि इसे कहां और कैसे खर्च करना है। यह ग्रामीण भारत के लिए आंशिक आय समर्थन योजना की तरह होगा। मांग पर इसका वृद्धिशील प्रभाव उल्लेखनीय होगा, किसानों की आय पर इसका उल्लेखनीय प्रभाव होगा और इस योजना के कारण अतिरिक्त खर्च का बोझ अपेक्षाकृत मध्यम होगा। 

अगर हर किसान परिवार को सालाना नकदी अंतरण की राशि दोगुना भी की जाती है तो भी अतिरिक्त खर्च केवल 90,000 करोड़ रुपये होगा। संक्षेप में कहें तो 2020-21 के आम बजट में कांग्रेस की न्याय (न्यूनतम आय योजना) की अपनेे ढंग से पैकेजिंग की जा सकती है जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को दम मिलेगा। 

कृषि पर सरकार का खर्च केवल पीएम-किसान या फसल बीमा, कृषि ऋण पर ब्याज सब्सिडी या किसानों के लिए पेंशन तक ही सीमित नहीं है। सरकार उर्वरक और खाद्य सब्सिडी पर भी अच्छी खासी राशि खर्च करती है जिससे अप्रत्यक्ष तौर पर किसानों को फायदा होता है। उदाहरण के लिए 2019-20 में सरकार के उर्वरक सब्सिडी पर करीब 80,000 करोड़ रुपये और खाद्य सब्सिडी पर 1.84 लाख करोड़ रुपये खर्च करने का अनुमान है। इस तरह 2019-20 में किसानों की कल्याणकारी योजनाओं पर सरकारी खर्च करीब 4.15 लाख करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है जबकि 2018-19 में यह राशि 3.28 लाख करोड़ रुपये और 2017-18 में 2.19 लाख करोड़ रुपये थी। 

इस सब्सिडी को ज्यादा कारगर और लाभार्थियों के लिए लक्षित बनाने के वास्ते बजट में क्या किया जा सकता है? अनाज की खरीद में भी प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के इस्तेमाल के लिए बजट में एक योजना पर विचार होना चाहिए और इसे पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए। पहले ही सरकार यह सुनिश्चित कर चुकी है कि उर्वरक पर सब्सिडी किसानों को वास्तविक बिक्री के आधार पर ही जारी की जाए। अब ऐसी व्यवस्था का समय आ गया है कि गेहूं और धान का खरीद मूल्य सीधे किसानों के बैंक खाते में जाए। अगर जरूरी हुआ तो इसके लिए आधार आधारित पहचान प्रणाली का इस्तेमाल किया जा सकता है। ओडिशा और पंजाब की सरकारें अपने राज्यों में इसी तरह की योजना लाने की कोशिश कर रही हैं। 2020-21 के आम बजट में पूरे देश में इस तरह की योजना लाने पर विचार किया जा सकता है। इससे सब्सिडी योजनाओं की खामियों को दूर कर इनकी लागत में कटौती हो सकती है। साथ ही देश में मौजूदा अनाज खरीद प्रणाली को मजबूत करने की जरूरत है।

अंत में बजट में कृषि में निवेश बढ़ाने पर ध्यान देने की जरूरत है। नैशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन पर हाल में जारी रिपोर्ट के मुताबिक बजट में 22,000 ग्रामीण हाट को ग्रामीण कृषि बाजार में अपग्रेड करने के लिए राशि आवंटित की जानी चाहिए। बजट में आने वाले वर्षों में कृषि क्षेत्र में बुनियादी ढांचे में निवेश की योजना का खाका तो पेश किया ही जा सकता है।

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