बिजनेस स्टैंडर्ड - चार दिन का कामकाजी हफ्ता अभी महज आकांक्षा ही रहेगा
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चार दिन का कामकाजी हफ्ता अभी महज आकांक्षा ही रहेगा

श्यामल मजूमदार /  January 15, 2020

फिनलैंड की युवा प्रधानमंत्री सना मारिन ने चार कार्य दिवस के सप्ताह को अपना समर्थन देकर दुनिया भर के कर्मचारियों का दिल जीत लिया है। इस घोषणा से कर्मचारियों को होने वाले लाभ पूरी तरह स्पष्ट हैं: बिना कामकाजी दायित्व का एक और दिन मिलने के साथ ही उन्हें सफर भी नहीं करना पड़ेगा। इससे उनके पास अधिक व्यक्तिगत समय होगा जिससे उनके तनाव में कमी और उत्पादकता में वृद्धि हो सकती है।

कुछ वैश्विक कंपनियां पहले ही चार दिन का सप्ताह लागू कर बढिय़ा नतीजे हासिल कर चुकी हैं। माइक्रोसॉफ्ट ने जापान में इसे गत अगस्त में लागू किया था और इस दौरान अपनी बिक्री में 40 फीसदी वृद्धि होने का दावा किया। इस प्रयोग के अन्य लाभ भी हैं। कंपनी का बिजली उपभोग एक चौथाई तक गिर गया और मुद्रित किए गए कागजों में भी 59 फीसदी गिरावट आई। दूसरी कंपनियों ने भी चार दिन के कामकाजी सप्ताह की दिशा में प्रायोगिक परीक्षण किए हैं और उन्हें भी ऐसे ही नतीजे मिले हैं। हार्वर्ड बिज़नेस रिव्यू में एक और परीक्षण के बारे में प्रकाशित रिपोर्ट भी बताती है कि छोटे कामकाजी सप्ताह में उत्पादकता बढ़ गई।

इन परिणामों से अचरज नहीं होना चाहिए क्योंकि खुशहाल कर्मचारी कंपनी की समग्र समृद्धि में योगदान देते हैं। असल में, समूचे इतिहास में यह देखा गया है कि कामकाजी घंटे कम होने पर उत्पादकता बढ़ी है। हेनरी फोर्ड ने 1926 में जब पांच दिन का कार्य सप्ताह लागू किया तो उन्हें भी ऐसे नतीजे मिले थे। फोर्ड 40 घंटे का कार्य सप्ताह लागू करने वाली शुरुआती कंपनियों में से एक है। उसके चार साल बाद केलॉग ने जब एक दिन में छह घंटे की ड्यूटी लागू की तो कारखाने में होने वाले हादसे 40 फीसदी तक कम हो गए।

सवाल उठता है कि क्या कंपनियों को चार दिवसीय कार्य सप्ताह के बारे में गंभीरतापूर्वक सोचने का वक्त आ गया है? दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से इसका जवाब ना है। यहां तक कि फिनलैंड भी ऐसा कुछ करने की नहीं सोच रहा है। मारिन की घोषणा के बाद जिस तरह से धन्यवाद देने वाले संदेशों की भरमार हुई तो उनके कार्यालय को यह सफाई देने के लिए आगे आना पड़ा कि चार दिन का हफ्ता सरकारी योजना का हिस्सा नहीं है और निकट भविष्य में ऐसा होने की संभावना भी नहीं है। लोगों की निराशा उस समय और बढ़ गई जब यह पता चला कि मारिन ने यह बयान प्रधानमंत्री बनने के पहले दिया था और यह महज आकांक्षा-जनित बयान था। 

हफ्ते में चार दिन काम कर पूरा वेतन लेने वाले कर्मचारियों का विचार व्यवहार्य नहीं होने के पीछे एक वजह है। कार्यदिवसों में कोई भी कटौती तब तक बर्दाश्त नहीं की जा सकती है जब तक उत्पादकता में आनुपातिक वृद्धि या वेतन में समान कटौती न की जाए। यह सच है कि कर्मचारियों को बढ़ी उत्पादकता और मनोबल के संदर्भ में कुछ लाभ मिलेंगे लेकिन चार दिन के कामकाजी हफ्ते से मुनाफा बढऩे की संभावना होने पर ही कोई कंपनी इसे लागू करेगी।

एक और समस्या यह है कि चार-दिवसीय कार्य सप्ताह को सेवा क्षेत्र में लागू करना मुश्किल हो सकता है जहां ग्राहकों की जरूरतों का ध्यान रखना पड़ता है। ब्रिटेन में लेबर पार्टी समर्थित एक अध्ययन ने थकावट बढऩे को लेकर आगाह भी किया क्योंकि अनुबंधित कर्मचारियों पर इन चार दिन में काम का बोझ रहेगा। इसके अलावा अकुशल एवं अस्थायी कामगारों पर इसका नकारात्मक असर भी पड़ेगा क्योंकि उन्हें घंटों के हिसाब से भुगतान होता है।

इसकी वजह यह है कि नियोक्ताओं का काम हफ्ते के पांचों दिन आठ घंटे प्रतिदिन के पूर्णकालिक कार्य-सप्ताह से कम पर नहीं चल सकता है। अगर वे चार दिवसीय सप्ताह अपनाते हैं तो कर्मचारियों को रोजाना 10-10 घंटे काम करना होगा। ऐसे में लोग हफ्ते में एक और दिन का अवकाश मिलने से खुद को तरोताजा महसूस कर सकते हैं लेकिन एक दिन में काम पर लंबा वक्त बिताने से उनकी उत्पादकता कम भी हो सकती है। 

अमेरिका में तकनीकी क्षेत्र की बड़ी मानव संसाधन फर्म ट्रीहाउस ने वर्ष 2016 में चार-दिवसीय सप्ताह लागू किया था लेकिन प्रतिस्पद्र्धा में टिक पाना मुश्किल होने पर वह फिर से पांच-दिवसीय सप्ताह की तरफ लौट आई। ट्रीहाउस के मुख्य कार्यकारी रेयान कार्सन ने दी वाशिंगटन पोस्ट से कहा था, 'अगर आप अपने प्रतिस्पद्र्धियों की तुलना में 80 फीसदी वक्त ही काम कर रहे हैं तो मुकाबला कर पाना खासा मुश्किल हो जाता है।'

मोटे तौर पर यह साफ है कि एक सप्ताह में कुल कामकाजी घंटों को नीचे लाने की जरूरत है। शोध से पता चला है कि हफ्ते में 50 घंटे से अधिक काम करने पर कर्मचारी के योगदान में गिरावट आती है और 55 घंटे के बाद तो यह धराशायी ही हो जाता है। शोध बताते हैं कि जो कर्मचारी हफ्ते में 70 घंटे तक काम करते हैं वे असल में अतिरिक्त 15 घंटों में कोई उत्पादक काम नहीं करते हैं। यह साक्ष्य है कि दफ्तर में देर रात तक समय बिताने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि योगदान बढ़ा ही है और इससे समझदार कर्मचारी भी हाशिये पर धकेले जा सकते हैं। 

खतरा यह है कि मुख्य कार्याधिकारी के आसपास ऐसे मल्टी-टास्किंग, तीव्रगामी 'जॉम्बी' इक_ïा हो जाएंगे जो यह सोचे बगैर हमेशा लिफ्ट का बटन दबाते रहते हैं कि इससे लिफ्ट काम करना बंद कर देगी।

लेकिन भारतीय कंपनी जगत चार दिवसीय कार्य सप्ताह इसलिए नहीं लागू कर सकता है कि यह काफी महंगा है। इस तरह की सोच पर अमल करने का सीधा मतलब है कि आपको नए कर्मचारी रखने होंगे और ऐसा कर पाना उनके लिए आर्थिक रूप से सही नहीं होगा। इस तरह मौजूदा समय में यही बेहतर है कि कंपनियां अपने कर्मचारियों को कामकाज के लचीले घंटे और घर से काम करने की छूट दें और चार दिन के हफ्ते को फिलहाल आकांक्षा ही रहने दें।
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