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वृद्धि रुझान की फिक्र करें, चक्र की नहीं

अजय शाह /  January 15, 2020

वृहद-आर्थिक परिणामों को दीर्घावधि रुझान बनाम अल्पावधि कारोबारी चक्र अनियमितता में बांट देना उपयोगी है। भारत की विकास कहानी में 2011-12 के दौरान वृद्धि रुझान गिरावट पर आ गया था। इससे जुड़ा पहलू यह है कि हमें कारोबारी चक्र परिस्थितियों में पतन देखना पड़ा था। ये दोनों परिघटनाएं आज एक साथ घटित हो रही हैं। भारत में वृहद-आर्थिक नीति के परंपरागत साधन अस्पष्ट हैं और वृद्धि रुझान में गिरावट पर यह ज्यादा फर्क नहीं डाल पाते हैं। भारतीय अर्थशास्त्र में सबसे अहम सवाल वृद्धि रुझान में गिरावट को समझने और उसे पलटने का है।

भारत में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आकलन से जुड़ी कई समस्याएं हैं। हम मजबूत आंकड़ों से काफी कुछ सीख सकते हैं। अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाली संस्था सीएमआईई के आंकड़े करीब 50,000 फर्मों पर निगाह रखते हैं और इससे आधुनिक क्षेत्र के बारे में एक तस्वीर उभरती है। हम अर्थव्यवस्था के सबसे महत्त्वपूर्ण घटक निजी गैर-वित्तीय फर्मों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वर्ष 1990-91 से लेकर 2011-12 की अवधि में उच्च वृद्धि का दौर रहा था लेकिन उसके बाद वृद्धि दर में नीचे का रुझान है।

बिक्री में वृद्धि के आंकड़ों से हम शुरुआत करते हैं। 1991 से 2011-12 की अवधि में नॉमिनल बिक्री वृद्धि प्रति वर्ष औसतन 16.4 फीसदी रही। उसके बाद के सात वर्षों में यह दर गिरकर 10.5 फीसदी प्रति वर्ष हो गई। निवेश को जांचने का बढिय़ा तरीका शुद्ध अचल संपत्तियों की प्रतिशत वृद्धि है। वर्ष 1990-91 से 2011-12 के दौरान इसकी औसत वृद्धि दर 17.4 फीसदी थी और उसके बाद के सात वर्षों में यह अपेक्षाकृत कम 10.3 फीसदी रहा है। यह वृद्धि रुझान में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव है। 

दीर्घावधि वृद्धि रुझान से जुड़ी हुई कारोबार चक्र अनियमितता की परिघटना है। ये कम समय तक चलने वाला उफान और गिरावट है, जो फर्मों के जरिये स्टॉक-निवेश-लाभपरकता की अनिश्चितता का सदाबहार चक्र है। हमारी यहां और अब समस्या 2018 के अंत में शुरू हुए कारोबारी चक्र हालात में पतन है। कारोबार चक्र की उठापटक को कुछ हद तक वृहद-आर्थिक नीति के परंपरागत तरीकों- राजकोषीय एवं मौद्रिक नीति से भी साधा जा सकता है। हममें से कई लोग समष्टि अर्थशास्त्र की अंतरराष्ट्रीय किताबें पढ़ते रहे हैं और हममें इस निष्कर्ष पर पहुंचने की प्रवृत्ति होती है कि समष्टिवादी नीति के साधन कारोबार चक्र अनिश्चितता से मुकाबले में कारगर हैं। 

हालांकि भारत की स्थिति में हमें अपनी आकांक्षाओं को लेकर बहुत सीमित होना चाहिए। भारत में राजकोषीय नीति इस तरह से नहीं बनी है जो स्थिरीकरण में मदद करे। वर्ष 2015 में मुद्रास्फीति को काबू में रखने की शुरुआत होने से पहली बार मौद्रिक नीति कारोबार चक्र स्थिरीकरण में मदद मिलने लगी है। जब भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति को चार फीसदी के नीचे रखना चाहती है तो इससे कारोबारी चक्र उठापटक पर काबू पाने के लिए नीतिगत दरों में कभी तेजी तो कभी नरमी के हालात बनेंगे। उसी के साथ हमारे पास एक अल्पविकसित वित्तीय प्रणाली होने से आरबीआई की क्षमता भी सीमित है। 

हमें मुद्रास्फीति नियंत्रण का काम ठीक से करना चाहिए लेकिन हमें यह भी पता होना चाहिए कि भारत में इसकी क्षमता कम है और हमें पता होना चाहिए कि भारत में राजकोषीय नीति समष्टि-अर्थशास्त्रीय स्थिरीकरण का हिस्सा नहीं है। नतीजतन, किताबों की तरह भारत में वृहद आर्थिक नीति के जरिये स्थिरीकरण नहीं हो पाता है। वैसे हमें बहुत निराश होने की जरूरत नहीं है। कारोबार चक्र की हरेक गिरावट के बारे में एक बात अच्छी है कि अगर उसे यूं ही छोड़ दें तो वह खुद-ब-खुद ठीक हो जाएगी। भारत में कारोबारी उठापटक का लंबा इतिहास हमें आश्वस्त करता है कि वृहद नीतियों के निष्प्रभावी एवं भ्रमित होने के बावजूद अतीत में गिरावट थम गई। 

इससे कहीं बड़ी समस्या वृद्धि रुझान में गिरावट है जिस पर हमें फिक्र करनी चाहिए। आज भारतीय अर्थव्यवस्था में सबसे अहम सवाल यह है कि 1990 से 2011 के दौरान हमारी वृद्धि इतनी ऊंची क्यों थी और फिर 2011 के बाद इसमें गिरावट का रुझ क्यों रहा? इस समस्या को समझ पाने में हम जिस हद तक कामयाब होते हैं और ठोस बौद्धिक समझ के आधार पर अपने रास्ते बदल पाते हैं तो वह कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण होगा। 

इस प्रक्रिया में हमें कारण और प्रभाव की सरलीकृत धारणाओं से परहेज करना चाहिए। इस बात का खतरा है कि 1991 में शुरू हुए उच्च वृद्धि के सिलसिले के लिए जुलाई 1991 के बजट भाषण को श्रेय दिया जाए। इसी तरह इस उफान के खत्म होने के लिए प्रणव मुखर्जी के 2011 के बजट भाषण को जिम्मेदार मानने का भी खतरा है। लेकिन इस पैमाने की सामाजिक परिघटना साधारण व्याख्या से रोकती है। वृद्धि रुझान में बदलाव ऐतिहासिक कारणों और कई वर्षों की मानव गतिविधियों का सामूहिक नतीजा रहा है।

1991-2011 बूम की बुनियाद कई कारकों ने रखी थी। भारतीय समाजवाद से दूर जाती आर्थिक नीति का भी इसमें योगदान रहा है। वर्ष 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद से 1991 तक कई कदम उठाए गए। जुलाई 1991 में बजट भाषण इस दिशा में नाटकीय बदलाव लाने वाला साबित हुआ।

इसी अंदाज में इस वृद्धि प्रकरण का अंत 2011-12 में मानव कृत्यों से नहीं हुआ था। जब भारत की जीडीपी काफी बढ़ गई तो  हमारे संस्थान बड़ी एवं अधिक जटिल अर्थव्यवस्था से निपटने में नाकाफी रहे थे। एक परिष्कृत निजी अर्थव्यवस्था को आपराधिक न्याय व्यवस्था, विवाद निपटान, न्यायपालिका, आर्थिक नियमन और कर प्रणाली में काबिलियत की जरूरत होती है। इसके लिए आर्थिक आजादी एवं राजनीतिक स्वतंत्रता के इर्दगिर्द बुनी लोक नीति के मूल्यों की जरूरत होती है। लेकिन हम वर्ष 2014 में दो लाख करोड़ डॉलर की जीडीपी पर सिमटकर रह गए जिसकी संस्थागत क्षमता 1982 की 20 हजार करोड़ डॉलर अर्थव्यवस्था लायक ही थीं।

समय बीतने के साथ निजी क्षेत्र की जरूरतों एवं संस्थाओं की क्षमताओं के बीच असंतुलन लगातार बिगड़ता गया। इस बढ़ते असंतुलन ने 2011-12 में वृद्धि प्रकरण का अंत कर दिया। इस वृद्धि प्रकरण के माध्यम से निजी कारोबारियों की नजर में उम्मीद एवं अनुभव के बीच तनाव देखा गया। उस दौरान संस्थानों के कामकाज में कई कमजोरियां थीं। हालांकि निजी स्तर पर लोग अपने अविश्वास को तिलांजलि देने को तैयार थे और वे यह मानना चाहते थे कि आज हालात खराब होने के बावजूद वे सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और सरकार की तरफ से समय-समय पर विपदा खड़ी करने पर समाधान निकाल लिया जाएगा। भारत के प्रति प्रतिबद्ध होने, भारत में ही कारोबार खड़ा करने और भारत में वित्तीय पूंजी निवेश करने के साथ यह मान्यता भी थी। वर्ष 2011-12 तक बदल जाने वाली बात यह थी कि इस आशावाद का क्षय हो गया।
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