बिजनेस स्टैंडर्ड - खाद्य तेल का उत्पादन
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खाद्य तेल का उत्पादन

संपादकीय /  January 15, 2020

भारत ने रिफाइंड और प्रसंस्कृत पाम ऑयल के आयात को सीमित किया है। यूरोपीय संघ ने भी परिवहन ईंधन के रूप में पाम ऑयल के इस्तेमाल को चरणबद्ध रूप से समाप्त करने का प्रस्ताव रखा है। ये दोनों वैश्विक पाम ऑयल क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाने वाले हो सकते हैं। भारत और यूरोपीय संघ इंडोनेशिया और मलेशिया से पाम ऑयल के सबसे बड़े आयातक हैं। दुनिया के कुल उत्पादन में इन दोनों देशों की हिस्सेदारी 85 प्रतिशत है।

आयात को लेकर भारत के निर्णय पर भले ही मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद की जम्मू कश्मीर तथा नए नागरिकता कानून पर टिप्पणियों का असर हो लेकिन इसकी जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। ऐसा इसलिए ताकि घरेलू खाद्य तेल उद्योग को बचाया जा सके। यूरोपीय संघ का कदम पाम ऑयल की खेती के पर्यावरण संबंधी दुष्प्रभावों से प्रेरित है। इसके चलते वन क्षेत्र में कमी आई और तमाम जीवों का रहवास नष्ट हुआ। इसमें दो राय नहीं कि पाम ऑयल की आपूर्ति करने वाले देश विश्व व्यापार संगठन में इसे चुनौती देंगे लेकिन इसका असर शायद ही हो क्योंकि मामला व्यापार से अधिक पर्यावरण से संबंधित है।

भारत के निर्णय पर भी विश्व व्यापार संगठन की शरण ली जाएगी या नहीं यह अभी तय नहीं है। प्रथम दृष्ट्या लगता नहीं कि इससे किसी स्थापित अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवहार को क्षति पहुंची हो। न तो यह किसी देश से संबंधित है और न ही आयात पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है। इसके तहत केवल रिफाइंड पाम ऑयल के आयात के लिए पूर्व अनुमति को आवश्यक किया गया है। बहरहाल, मलेशिया की अर्थव्यवस्था पर इसका असर अवश्य पड़ेगा।

पाम ऑयल मलेशिया का सबसे बड़ा कृषि निर्यात उत्पाद है और उसके सकल घरेलू  उत्पाद में इसकी हिस्सेदारी 2.8 फीसदी है। आश्चर्य नहीं कि मलेशिया कीमतों में रियायत के साथ-साथ पाम ऑयल के बदले भारत से चीनी और भैंसे के मांस के आयात में बेहतर सौदेबाजी पर विचार करे। उधर, इंडोनेशिया को कारोबार बढऩे से लाभ मिलने की आशा है।

भारत की बात करें तो विदेशों से रिफाइंड पाम ऑयल की अबाध आवक रोकने का यह बेहतर अवसर है। मलेशिया नियमित रूप से अपने पाम ऑयल शुल्क ढांचे में बदलाव करता रहता है ताकि रिफाइंड ऑयल के निर्यात को बढ़ावा दिया जा सके। इससे भारतीय खाद्य तेल उद्योग को नुकसान पहुंचता है। उसने खाद्य तेल की रिफाइनिंग क्षमता में भारी निवेश किया है लेकिन उसका अधिकांश हिस्सा अभी इस्तेमाल नहीं हो रहा।

औसत क्षमता इस्तेमाल घटकर 46 प्रतिशत रह गया है। कई छोटे और मझोले स्तर की रिफाइनरी बंद हो गई हैं जिससे हजारों लोग बेरोजगार हो चुके हैं। सस्ते आयात ने घरेलू खाद्य तेल कीमतों को कम रखा जिसका नुकसान स्थानीय तिलहन किसानों को उठाना पड़ा। घरेलू तिलहन उत्पादन के मांग से तालमेल न बिठा पाने की यह भी एक वजह है।

पाम ऑयल की खेती के मामले में अभी भारत में काफी कुछ किया जाना है। इस दिशा में केवल सरकारी प्रोत्साहन से बात नहीं बनेगी क्योंकि जमीन की उपलब्धता और पौधों को तैयार होने में लगने वाला लंबा वक्त भी बाधा है। भारत में अन्य फसलों का उत्पादन बढ़ाने और वृक्ष आधारित तेल की मदद से खाद्य मेल की कमी दूर करने तथा उसे खाद्य प्रसंस्करण, सौंदर्य प्रसाधन और औषधि क्षेत्र में इस्तेमाल करने की पर्याप्त संभावना है। परंतु किसानों द्वारा तिलहन फसलों में निवेश करने और उत्पादकता बढ़ाने के लिए जरूरी है कि लाभकारी कीमत सुनिश्चित की जा सके। आयात को कम करके सस्ते खाद्य तेल की आवक को रोकना इस दिशा में एक कदम साबित हो सकता है।
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