बिजनेस स्टैंडर्ड - दिल्ली विधानसभा चुनाव और आप के दावे की हकीकत
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दिल्ली विधानसभा चुनाव और आप के दावे की हकीकत

इंदिवजल धस्माना /  January 13, 2020

पूर्वी दिल्ली के पटपडग़ंज में एक अपार्टमेंट के बाहर सिलाईकरने वाले एक दर्जी को इस महीने की शुरुआत में सरकारी बालिका विद्यालय में अभिभावक-शिक्षक बैठक (पीटीएम) में शामिल होने का मौका मिला। इस स्कूल में उनकी दो बेटियां पढ़ती हैं। उनकी खुशी उनके चेहरे से साफ झलकती है क्योंकि उन्हें इस बात का संतोष है कि स्कूल में अच्छी पढ़ाई हो रही है और वहां काफी सुधार दिखता है। लेकिन उन्हें इस बात की चिंता है कि उनकी एक बेटी गणित विषय में कमजोर है जिसे इस बार 10वीं कक्षा की परीक्षा देनी है।

वह आम आदमी पार्टी (आप) सरकार के कार्यकाल में सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था की तारीफ करते हुए कहते हैं, 'मेरी बेटी को पढ़ाने वाले शिक्षकों ने बताया कि वह गणित में कमजोर है और ऐसे में उन्हें उस पर ज्यादा ध्यान देना होगा। शिक्षकों ने मुझसे भी कहा कि मैं भी यह ध्यान रखूं कि वह गणित विषय पढऩे में खूब मेहनत करे।' 

अपार्टमेंट में काम करने वाली एक घरेलू सहायिका का कहना है कि उनकी बेटी भी एक दूसरे सरकारी स्कूल में जाती है और उसे भी गणित विषय में सुधार लाने के लिए कहा गया है। हालांकि उन्हें इस बात पर हैरानी है कि पीटीएम के दौरान भी शिक्षक सेल्फी लेने और व्हाट्सऐप पर मेसेज भेजने में व्यस्त थे तो आखिर कक्षा में क्या पढ़ाते होंगे। एक शिक्षक ने बताया कि उस घरेलू सहायिका को यह बात नहीं मालूम होगी कि तस्वीरें सबूत के तौर पर खिंची जाती हैं ताकि अधिकारियों को दिखाया जा सके कि पीटीएम वास्तव में हुआ था।

आप भी स्कूली शिक्षा क्षेत्र में किए गए काम को लेकर आत्मविश्वास से इस हद तक भरी है कि इसने अपनी पार्टी के कार्यकाल के दौरान वर्ष 2015-19 के बीच शिक्षा क्षेत्र में किए गए काम का एक रिपोर्ट कार्ड भी पेश कर दिया है। यह कार्ड भी छात्रों की पढ़ाई में प्रगति से जुड़ी रिपोर्ट कार्ड की तरह ही दिखती है। इसमें फर्क सिर्फ इतना है कि छात्र खुद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हैं और रिपोर्ट कार्ड पर 'दिल्ली' का ब्योरा है। इस रिपोर्ट कार्ड में कहा गया है कि दिल्ली सरकार ने फरवरी में खत्म हो रहे अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान शिक्षा पर खर्च को 6,600 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 15,600 करोड़ रुपये कर दिया है। फरवरी में विधानसभा चुनाव होने हैं। 

शिक्षक इस बात को लेकर सहमति जताते हैं कि बच्चों के लिए सामान खरीदने के लिए उनके पास काफी पैसे हैं। उनका कहना है कि विज्ञापन, खेल, चित्रकारी आदि से जुड़े क्लबों के पास भी पहले के मुकाबले ज्यादा संसाधन हैं। हालांकि कुछ  लोगों को इस बात का अफसोस है कि पूरा जोर शिक्षा की गुणवत्ता के बजाय बड़े पैमाने पर शिक्षा देने पर है। रिपोर्ट कार्ड के मुताबिक सरकारी स्कूलों के नतीजे पहली बार निजी स्कूलों के मुकाबले बेहतर रहे। एक शिक्षक ने नाम न बताने की शर्त पर बताया, '2019 में सरकारी स्कूलों में 12वीं कक्षा के 96.2 फीसदी छात्र पास हुए जबकि निजी स्कूल के 93 फीसदी छात्र ही पास हुए। सरकार का जोर ज्यादा पढ़ाई पर है और इसका दबाव शिक्षकों पर पड़ रहा है।'

मिसाल के तौर पर अगर छात्र बोर्ड की परीक्षा में फेल होता है तब उन्हें कारण बताओ नोटिस मिल जाता है। एक शिक्षक ने बताया, 'हम परीक्षा में फेल होने के कारण के तौर पर स्कूल में छात्रों की अनुपस्थिति के बारे में लिखना चाहते हैं लेकिन ऐसा नहीं कर सकते हैं क्योंकि अभिभावक हम पर राजनीतिक दबाव डाल कर छात्रों को परीक्षा में बैठने देने की अनुमति चाहते हैं। परीक्षा में बैठने के लिए न्यूनतम उपस्थिति की जरूरत होती है। एक बार जब हम छात्रों को बैठने की अनुमति दे दें तब हम उनके फेल होने की वजहों में उनका कक्षा में अनुपस्थित रहना नहीं लिख सकते।'

प्रथम की मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) रुक्मिणी बनर्जी कहती हैं कि आप शिक्षा को लेकर गंभीर रही है और इसने पांच सालों तक शिक्षकों, स्कूल के बुनियादी ढांचे और निर्देश देने के तरीके जैसे कई पहलुओं पर काम किया है। बनर्जी का कहना है कि उन्होंने अभी बजट के आंकड़े नहीं देखे हैं लेकिन वह इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में वित्तीय समर्थन की वजह से यह सब संभव हुआ। 

मोहल्ला क्लिनिक

पूर्वी दिल्ली के पश्चिमी विनोद नगर में आप सरकार द्वारा बनाए गए क्लिनिक में करीब 10 महिलाएं अपने बच्चों के साथ कतार में खड़ी हैं। उनमें से एक ने बताया कि यहां डॉक्टर बुखार, सरदर्द, डेंगू, उच्च रक्तचाप आदि जैसी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों का इलाज करते हैं। एक दूसरी महिला बताती है कि ज्यादा गंभीर बीमारियों के लिए मरीजों को सरकारी अस्पतालों में भेजा जाता है और एमआरआई स्कैन जैसी महंगी जांच टेस्ट मुफ्त में की जाती है जब मरीजों को सरकारी अस्पताल में भेजा जाता है। हालांकि एक तीसरी महिला ने बताया कि शुगर की जांच बाहर से कराना पड़ता है जिसके बाद ही डॉक्टर दवाइयां देते हैं। इस क्लिनिक में इलाज कराने के लिए आधार कार्ड दिखाना अनिवार्य होता है। 

रिपोर्ट कार्ड के मुताबिक स्वास्थ्य पर खर्च 3,500 करोड़ रुपये से बढ़कर 7,500 करोड़ रुपये हो गया है। बजट के कागजों से भी इस बात की पुष्टि होती है। केजरीवाल सरकार के सत्ता में आने से पहले 2014-15 में मेडिकल और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर कुल खर्च 3,551.94 करोड़ रुपये था जो बजट अनुमानों के मुताबिक 2019-20 में बढ़कर 7,300.86 करोड़ होने का लक्ष्य रखा गया है।  

दिल्ली चिकित्सा परिषद के अध्यक्ष अरुण गुप्ता ने बताया, 'पहले कामगारों को छोटी-छोटी बीमारियों के लिए भी सफदरजंग जैसे बड़े अस्पतालों में जाना पड़ता था और उन्हें डॉक्टरों से मिलने, स्वास्थ्य जांच होने और रिपोर्ट मिलने में ही तीन दिन लग जाते थे। अब ऐसे लोगों का इलाज मोहल्ला क्लिनिक में हो जाता है जहां एमबीबीएस डॉक्टरों के साथ उनकी मदद के लिए नर्स भी मौजूद होती हैं। एक दिन में करीब 50,000 लोगों का रोजाना इलाज होता है। अब केवल तीन फीसदी मरीजों को ही बड़े अस्पतालों में इलाज के लिए भेजा जाता है।' 

सस्ती बिजली

लोगों को सीधे तौर पर बिजली के क्षेत्र में आर्थिक मदद मिली है। रिपोर्ट कार्ड में कहा गया है कि प्रत्येकउपभोक्ता को 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली दी गई है। इसका अर्थ यह हुआ कि करीब 31 लाख घरों के लोगों को बिजली के लिए कोई भुगतान नहीं करना पड़ता। इस रिपोर्ट कार्ड के मुताबिक जो लोग 200-400 यूनिट बिजली की खपत करते हैं उनका बिजली बिल आधा हो जाता है और इससे करीब 12 लाख परिवारों को फायदा मिलता है। मध्यम वर्ग के लोगों का भी कहना है कि उन्हें भी सर्दियों में सब्सिडी का फायदा मिलता है। गर्मी के दिनों में उनकी खपत बढ़ जाती है इसी वजह से रियायती दरों का फायदा उठाना मुश्किल हो जाता है। बिजली पर दिल्ली सरकार के राजस्व व्यय को देखकर भी इसका अंदाजा मिलता है जो वर्ष 2014-15 के 853.43 करोड़ रुपये से बढ़कर अगले ही साल 1,678.36 करोड़ रुपये हो गया। बजट अनुमानों के मुताबिक वित्त वर्ष 2020 तक इसे बढ़ाकर 1,749.22 करोड़ रुपये कर दिया गया है।  

राजस्व अधिशेष बजट 

आम जनता को कई मुफ्त सेवाएं देने के बावजूद दिल्ली सरकार ने राजस्व बचत वाला बजट पेश किया। दिल्ली कुछ सालों से राजस्व अधिशेष दे रही है लेकिन यह आंकड़ा मौजूदा वित्तीय वर्ष में कम होकर 5,235.69 करोड़ रुपये हो गया जो 2014-15 में 6,075.09 करोड़ रुपये और उसके बाद के साल में 7,210.70 करोड़ रुपये था। 

आप ने रिपोर्ट कार्ड में दावा किया है कि दिल्ली ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहां देश में राजस्व अधिशेष है। हालांकि यह दावा उतना सही है। राज्य के वित्तीय पहलू पर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात सहित अन्य 19 राज्यों में 2019-20 के बजट अनुमान के मुताबिक राजस्व अधिशेष है। सब्सिडी के रूप में मुफ्त सेवाएं देने से राजस्व खर्च में बढ़ोतरी होगी और सरकार की वित्तीय स्थिति का जायजा लेने के लिए राजस्व बैलेंस का अंदाजा लेना ही उपयुक्त होगा।

हालांकि रिपोर्ट कार्ड के मुताबिक स्कूलों की नई इमारतों में 20,000 से ज्यादा नई कक्षाएं बनी हैं और 4,300 नई दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन बसें लाई गई हैं और ये सारे खर्च पूंजीगत खर्च में आते हैं। सरकार के वित्तीय पहलू का अंदाजा लगाने के लिए दिल्ली सरकार के राजस्व घाटे पर पर नजर डालने की जरूरत है। राज्य का वित्तीय अधिशेष 2014-15 में 218.82 करोड़ रुपये है जो 2015-16 में 427.90 करोड़ रुपये के घाटे में बदल गया। यह घाटा आगे और बढ़ सकता है और वित्त वर्ष 2020 में 5,901.90 करोड़ रुपये हो सकता है।

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