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राज्य जीएसटी में वृद्धि अनुमानों में भारी अंतर से पैदा होते सवाल

ए के भट्टाचार्य /  January 12, 2020

नवंबर 2019 के आखिरी सप्ताह में विपक्षी दलों द्वारा शासित पांच राज्यों ने एक बयान जारी किया। इसमें कहा गया कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से घटते राजस्व का उनकी वित्तीय स्थिति पर असर पडऩा शुरू हो गया है। केंद्र ने राज्यों को हर्जाने के भुगतान में देरी कर दी थी। जीएसटी प्रणाली में उन राज्यों को यह हर्जाना देने का वादा किया गया है, जिनका इस नए कर से सालाना राजस्व 14 फीसदी से अधिक नहीं बढ़ पाएगा। 

इन पांच राज्यों- पंजाब, केरल, दिल्ली, राजस्थान और पश्चिम बंगाल ने एक संयुक्त बयान में कहा, 'केंद्र सरकार को अगस्त और सितंबर महीनों के जीएसटी हर्जाने का भुगतान अक्टूबर में करना था, लेकिन इसका आज तक भुगतान नहीं किया गया है।' इन राज्यों ने दावा किया कि उनकी राजकोषीय स्थिति पर दबाव है और उनमें से कुछ पहले ही 'वेज ऐंड मीन्स एडवांस' का सहारा ले रहे हैं। 'वेज ऐंड मीन्स एडवांस' केंद्रीय बैंक द्वारा केंद्र और राज्यों को मुहैया कराए जाने वाले कर्ज की विशेष सुविधा है। 

दिसंबर के पहले सप्ताह तक और बहुत से राज्य इस मांग के सुर में सुर मिलाने लगे थे कि केंद्र द्वारा जीएसटी हर्जाना जल्द जारी किया जाना चाहिए। अब ऐसे राज्यों (केंद्र शासित प्रदेशों समेत) की संख्या आठ हो चुकी थी। पहले के पांच राज्यों में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और पुदुच्चेरी भी शामिल हो चुके थे। इन राज्यों ने कहा कि अगर केंद्र ने बकाया हर्जाना जारी नहीं किया तो वे सर्वोच्च न्यायालय जाएंगे। ऐसा लगता है कि इस दबाव ने काम किया है। नई दिल्ली में 18 दिसंबर को जीएसटी परिषद की 38वीं बैठक से पहले केंद्र ने राज्यों को बकाया जीएसटी हर्जाने के रूप में 35,298 करोड़ रुपये जारी किए। 

इससे राज्यों की एक अहम मांग पूरी हुई है, जो जीएसटी राजस्व में सुस्ती और केंद्र के हर्जाना जारी करने में देरी से प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन इस देरी से केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों में खटास आई है। जीएसटी परिषद की 38वीं बैठक में लॉटरी पर कर की नई दर का फैसला लेने के लिए पहली बार मत विभाजन कराना पड़ा। इससे पहले जीएसटी परिषद में सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। हालांकि मत विभाजन का प्रावधान शुरू से ही मौजूद है।  

यह साफ तौर पर जीएसटी राजस्व में सुस्ती को दर्शाता है, जिससे निस्संदेह केंद्र प्रभावित हुआ है। लेकिन राज्य भी इतने ही चिंतित हैं क्योंकि उनके राजस्व अनुमान गलत साबित हुए हैं। राज्य जीएसटी या एसजीएसटी संग्रह की राज्यों के कर राजस्व में 43 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी है, इसलिए एसजीएसटी में किसी मंदी से राज्यों की वित्तीय स्थिति के लिए खतरे की घंटी बज जाती है। राज्यों के लिए स्थिति कितनी गंभीर है? वर्ष 2019-20 में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने 2018-19 के 5.52 लाख करोड़ रुपये के संशोधित अनुमानों के मुकाबले एसजीएसटी में 11 फीसदी बढ़ोतरी का अनुमान लगाया था। वित्त वर्ष 2019-20 के पहले आठ महीनों में कुल एसजीएसटी संग्रह 2.01 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जो 6.13 लाख करोड़ रुपये के सालाना राजस्व संग्रह के लक्ष्य का करीब एक तिहाई है। 

दूसरे शब्दों में राज्यों को अपने एसजीएसटी संग्रह में अहम गिरावट के लिए तैयार रहना होगा। चालू वर्ष की दो-तिहाई अवधि में संग्रहीत राजस्व लक्ष्य का महज एक-तिहाई रहा है। इसी वजह से हर्जाने की राशि जारी करने के लिए राज्यों के सुर तेज हो रहे हैं। लेकिन राज्यों को हर्जाने की मदद केवल 2017 से अगले पांच साल ही मिल पाएगी। अगर एसजीएसटी राजस्व में वृद्धि की रफ्तार वर्तमान समय की तरह सुस्त बनी रही तो वर्ष 2022 से राज्यों के राजस्व का क्या होगा? 

हालांकि इन राज्यों में से कुछ ऐसे भी हैं, जो खुद को मौजूदा राजकोषीय मुश्किल में डालने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। कम से कम 14 राज्यों का अनुमान था कि 2019-20 में एसजीएसटी राजस्व में वृद्धि 14 फीसदी से अधिक रहेगी। यह अनुमानित वृद्धि दर 14 से 27 फीसदी थी। जब ये राज्य चालू वित्त वर्ष के लिए एसजीएसटी राजस्व वृद्धि की दरें तय कर रहे थे, तब उनके वित्त मंत्री क्या कर रहे थे? 

निस्संदेह केंद्र भी उससे कहीं अधिक राजस्व वृद्धि का अनुमान लगाने के लिए दोषी है, जो उस समय के आर्थिक वृद्धि के माहौल में तर्कसंगत थी। लेकिन ये 14 राज्य भी फरवरी-मार्च में अपने-अपने बजट में उम्मीद से अधिक राजस्व के अनुमान तय करने के लिए कम दोषी नहीं हैं, जबकि उस समय आर्थिक वृद्धि में गिरावट आनी शुरू हो गई थी। उन राज्यों को आत्ममंथन करने की जरूरत है, जिन्होंने एसजीएसटी संग्रह की वृद्धि में बढ़ोतरी की ऊंची दर तय की थी। ऐसे राज्यों में केरल ने 26 फीसदी, राजस्थान ने 23 फीसदी और पंजाब और मध्य प्रदेश ने 20-20 फीसदी वृद्धि का अनुमान लगाया था। इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि ये सभी राज्य वही हैं, जो सबसे ज्यादा शिकायत कर रहे हैं। 

ये सवाल उन राज्यों की एसजीएसटी राजस्व वृद्धि के अनुमान में इस्तेमाल की जाने वाली प्रक्रियाओं को लेकर भी उठाया जाना चाहिए, जिन्होंने 2019-20 में संग्रह में कमी का अनुमान लगाया था। इन राज्यों में उत्तराखंड, गोवा, असम, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ शामिल हैं। उन्होंने किस वजह से एसजीएसटी संग्रह में कमी का अनुमान जताया, जबकि कुछ अन्य राज्यों को राजस्व वृद्धि में 25 से 27 फीसदी की बढ़ोतरी की संभावना नजर आ रही थी? यह समझना रोचक होगा कि क्यों गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने एसजीएसटी की वृद्धि दर 14 से 16 फीसदी रहने का अनुमान लगाया। जीएसटी परिषद को इन सभी मुद्दों की व्यापक पड़ताल करनी चाहिए और एक स्थिति रिपोर्ट पेश करनी चाहिए।
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