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युवाओं की नाराजगी की शिकार मोदी सरकार

शेखर गुप्ता /  January 12, 2020

प्रतिस्पर्धी खेलों में लीग व्यवस्था होती है। ये लीग उच्च, मध्य, निम्र, वरिष्ठ और कनिष्ठ समेत तमाम वर्गों में विभाजित होती हैं। किसी प्रतिभागी का कद देखकर ही यह निर्णय होता है कि वह किस लीग में खेलेगा या खेलेगी। जो खिलाड़ी निचले स्तर की लीग में युवतर खिलाडिय़ों (या कहें बच्चों) के साथ खेलता है, वह अपना ही कद कमजोर करता है। देश की राजनीति पर भी इस बात को लागू किया जा सकता है। खासतौर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार छात्रों के विरोध प्रदर्शन से जिस तरह निपट रही है उसे देखते हुए ऐसा किया जा सकता है।

इसे समझने का एक सामान्य तरीका वह है जो हम पहलवान से अभिनेता बने दारा सिंह से सीख सकते हैं। दारा सिंह खुद को कुश्ती की चुनौती देने वालों से कहते थे कि पहले वह उनके भाई रंधावा को पराजित करे तभी वह उनसे कुश्ती लड़ पाएगा। मैंने उनसे सवाल किया कि वह ऐसा क्यों करते हैं तो उन्होंने जवाब दिया कि 'कोई भी लल्लू पंजू यह डींग हांकना चाहेगा कि वह दारा सिंह के साथ लड़ चुका है। मैं उन्हें खुश करने के लिए अपना कद क्यों छोटा करूं?'

वापस राजनीति की बात करते हैं। भाजपा की ताकतवर सरकार बीते एक महीने से यही कर रही है: वरिष्ठ, शक्तिशाली स्त्री और पुरुष, बच्चों से लड़ रहे हैं। उनकी नीतियों के विरोध में देश भर के शैक्षणिक परिसरों में आग भड़की हुई है। भाजपा जहां सत्ता में है वहां इसका मुकाबला वह पूरी शक्ति से कर रही है। इंटरनेट और संचार सीमित किया जा रहा है और उत्तर प्रदेश में तो सामूहिक जुर्माना तक लगाया गया है। यदि इतने बहुमत से जीतकर आई सरकार छात्रों की बात सुनने के बजाय उनसे लडऩे लगती है तो तीन घटनाएं लाजिमी तौर पर घटती हैं: 

सबसे पहले तो इससे अत्याचारी बनाम शोषित की कहानी बनती है। दूसरा, इससे ऐसी तस्वीरें पैदा होती हैं जो वैश्विक स्तर पर भारत की छवि धूमिल करती हैं। इन्हें बाहर निकलने से किसी तरह रोका नहीं जा सकता है। तीसरी और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इससे युवाओं के बीच 'बच्चे बनाम अंकल/आंटी' वाला माहौल बनता है। इसे विस्तार से समझते हैं। सन 2014 और 2019 के हर एक्जिट और ओपिनियन पोल में यही दर्शाया गया कि देश के युवा, खासतौर पर पहली बार मतदान करने वाले नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं। मैंने सन 2019 के आम चुनाव के दौरान देश भर के युवाओं से बात की और वे केवल एक नेता का नाम लेते थे: मोदी।

मैंने नई दिल्ली में सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की एक बहस में उन कारकों पर बात की थी जो मोदी की बड़ी जीत में योगदान कर रहे हैं। खासतौर पर इस बात का कि कैसे युवा पहचान आधारित बातों मसलन जाति, भाषा, जातीयता और कई मामलों में धर्म को भी परे रखकर मोदी को अपना रहे हैं। उनकी आंखों में आशावाद, खुशी, बेहतर जीवन की आकांक्षा नजर आई। वे अपने परिवारों की पुरानी राजनीतिक वफादारी को इसलिए नहीं छोड़ रहे थे क्योंकि वे उनसे नफरत करते थे या डरते थे। यदि 2014 का चुनाव बेहतर जीवन की आशा का चुनाव था तो 2019 का चुनाव उस वादे के नवीनीकरण का चुनाव था।

बहरहाल, छह महीने के भीतर उन्हें लगा कि उन्हें कुछ अलग ही मिला है। अर्थव्यवस्था में जबरदस्त गिरावट आई है। गिरावट का सिलसिला लंबे समय से जारी है और वृद्धि एवं अच्छे दिन की बात अब कपोल कल्पना लग रही है। युवाओं के बीच सन 1970 के दशक के मध्य जैसा निराशावाद और असहायता घर कर रही है। नए रोजगार नहीं हैं। भले ही हर रोजगार महत्त्वपूर्ण होता है लेकिन सच यही है कि कॉलेज में पढऩे वाला हर युवा स्विगी या जोमैटो के लिए डिलिवरी करने या ओला अथवा उबर के लिए वाहन चलाने का इरादा नहीं रखता।

मोदी ने उनसे इसका वादा नहीं किया था। उनकी आकांक्षाएं और जरूरतें एकदम स्पष्ट हैं और वे पूरी नहीं हो रही हैं। जाहिर है इसकी भरपाई कश्मीर के एकीकरण और उस पर नियंत्रण से अथवा पाकिस्तान को सबक सिखाने से नहीं हो सकती है। न ही मुस्लिमों का भय दिखाने या प्रवासी मुस्लिमों से घृणा करने का दबाव बनाने से उनकी जरूरतें पूरी होंगी।

इनमें से कोई कदम ऐसा नहीं है जो उन्हें रोजगार दिला सके, बेहतर आजीविका सुनिश्चित कर सके या बेहतर जीवन दे सके। यकीनन तब तक नहीं जब तक कि वे आपके वैचारिक अनुयायी न हों। कॉलेज जाने वाले युवाओं के बीच मोदी को लेकर तेजी से मोहभंग हुआ है।

किसी के मन में यह गलत धारणा नहीं रहनी चाहिए कि ऐसा वाम और उदार रुझान वाले चुनिंदा सरकारी विश्वविद्यालयों में 'अर्बन नक्सल' की वजह से हो रहा है। अब यह गुस्सा महंगे निजी विश्वविद्यालयों में भी फैल चुका है। जबकि वहां किसी तरह की राजनीति या राजनीतिक संगठनों की जगह नहीं है। इन विश्वविद्यालयों में पढऩे वाले बच्चों के माता-पिता बहुत अधिक धन खर्च करके बच्चों को यहां पढ़ाते हैं। मैंने देश के कई हिस्सों में लोगों से बात की और पाया कि लोगों में वैसा ही गुस्सा है जैसा कि जेएनयू, जामिया अथवा बीएचयू में नजर आ रहा है।

छात्रों में यह भावना प्रबल हो रही है, 'हमने इसलिए तो मतदान नहीं किया था।' मैं सुनिश्चित तौर पर यह भी कह सकता हूं कि इन युवाओं में बड़ी तादाद उनकी है जिन्होंने मोदी को वोट दिया था और उनमें भी ज्यादातर ने पहली बार मतदान किया था।

द प्रिंट महीने में एक बार अभिव्यक्ति की आजादी के एक कार्यक्रम का आयोजन करता है जिसका नाम है 'डेमोक्रेसी वॉल'। यह आयोजन किसी प्रमुख शैक्षणिक परिसर में किया जाता है। इसकी विशेषताओं में एक विशालकाय बैनर शामिल है जो देखने में दीवार जैसा नजर आता है। छात्र अपने मन की बात उस पर लिखकर हस्ताक्षर कर सकते हैं। बीते छह महीनों में इस पर लिखी जाने वाली इबारत में बदलाव आया है। पिछले तीन महीनों में तो यह बदलाव नाटकीय रहा है।

ये सभी महंगे निजी विश्वविद्यालयों से हैं। हाल के दिनों में इनमें क्रोध और निराशा भी नजर आने लगी है। इस बीच चतुराई का प्रयोग भी होता है। मिसाल के तौर पर 'मेरा देश जल रहा है' लिखने के बाद हैशटैग के साथ ऑस्ट्रेलिया को बचाने की गुहार की जाती है। सबसे आम नजर आने वाला वाक्य है 'बुरे दिन वापस कर दो।' तीन महीने पहले तक कुछ आलोचना होती थी। आज तो तारीफ का एक शब्द देखने को नहीं मिलता। 

ज्यादातर अवसरों पर राष्ट्रवाद, धर्म और किसी नेता के व्यक्तित्व के मिश्रण के बल पर एक चुनाव जीता जा सकता है। परंतु इसके बल पर लगातार दो चुनाव नहीं जीते जा सकते। मोदी के दूसरी बार सरकार बनाने के छह महीने के भीतर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को संवाददाताओं को संबोधित करके छात्रों को दंगाई और देशद्रोही बताना पड़ रहा है। मैं माफी चाहता हूं लेकिन सवाल यह भी है कि देश में पुलिस पर यकीन ही कौन करता है। कैबिनेट मंत्री टेलीविजन चैनलों पर बैठकर छात्र-छात्राओं को बता रहे हैं कि कैसा व्यवहार करें और कैसे देशभक्त बनें। लेकिन आज का युवा चतुर है।

तिरंगा लहराते हुए विरोध करके वे इन नेताओं को चुप करा देते हैं, वे बड़ी तादाद में एकत्रित होकर संविधान की प्रस्तावना पढ़ते हैं और राष्ट्रगान गाते हैं। महज छह महीने पहले बॉलीवुड का एक बड़ा तबका मोदी के साथ सेल्फी ले रहा था। आज उनमें से कई विरोध प्रदर्शन करने वालों के साथ हैं। जो शेष हैं, वे भी खामोश हैं। कोई फिल्मी सितारा सरकार के पक्ष में सामने नहीं आया है। यदि आपको संदेह है तो आप जांच लीजिए कि नागरिकता संशोधन अधिनियम के समर्थन में कैबिनेट मंत्री के मुंबई में आयोजित रात्रिभोज में कौन-कौन शामिल हुआ। कुछ नामों को पहचानने के लिए आपको गूगल की मदद लेनी पड़ सकती है।

इन तमाम बातों के बीच दीपिका पडुकोणे का मजाक उड़ाने और ताना मारने के लिए दूसरी बार मंत्री बनी स्मृति इरानी जैसी शख्सियतों को उतार दिया जाता है। याद रहे कि आप खेलने के लिए जिस लीग का चुनाव करते हैं उससे आपका कद पता चलता है।
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