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रोजगार सृजन और खपत पर जोर देने वाला हो बजट

देवांग्शु दत्ता /  January 08, 2020

शतरंज के प्रतिभाशाली खिलाड़ी और माहिर संगीतकार अक्सर जबरदस्त याद्दाश्त के मालिक होते हैं और याद रखने की उनकी क्षमता जादू से कम नहीं लगती। संगीतकार किसी भी धुन को केवल एक बार सुनेगा और उसे ज्यों का त्यों बजा देगा। शतरंज की बिसात पर किसी भी खिलाड़ी को हजारों बाजियां एक-एक चाल के साथ याद रहती हैं। ये स्मृतियां किसी संदर्भ से जुड़ी होती हैं और विन्यास या डिजाइन से जुड़ी हैं। शतरंज के खिलाड़ी मोहरों और प्यादों की चालों को एक आकृति या डिजाइन या पैटर्न की शक्ल में पहचानते और याद रखते हैं। अगर मोहरों को बिना किसी क्रम या पैटर्न के लगा दिया जाए तो खिलाड़ी उसे ठीक ढंग से याद नहीं रख सकते। संगीतकार धुनों को याद रखते हैं। अगर धुन के हिस्सों को क्रम के बगैर सुना दिया जाए तो उन्हें आसानी से याद नहीं रखा जा सकता।

निवेश के मामले में भी ऐसा ही होता है। जरूरी नहीं कि निवेशक को बहीखातों में कुछ खास आंकड़े याद हों, लेकिन उनके भीतर यह समझ जरूर होती है कि अच्छे कारोबार में आंकड़े एक-दूसरे के साथ किस तरह चलते हैं। उन्हें किसी कंपनी में नकदी प्रवाह या बताए गए मुनाफों का ब्योरा चाहे याद न रहे मगर वे आंकड़े यदि लगातार एक खास तरह के होते हैं तो उन्हें याद आ जाएंगे। इससे उन्हें पता चल जाएगा कि कारोबार में लगातार मुनाफा हो रहा है या नहीं और प्रवर्तक ईमानदार हैं या नहीं।

इसी प्रकार किसी देश की सेहत के बारे में जानने के लिए वृहद आर्थिक आंकड़े खंगालना भी क्रम समझने जैसा ही है। कोई भी आंकड़ा अच्छा भी लग सकता है और खराब भी। लेकिन आंकड़े एक-दूसरे के साथ जिस तरीके से संबंधित रहते हैं, वह तरीका लगातार बना रहना चाहिए। वह सतत तरीका या क्रम अब नहीं दिख रहा है क्योंकि कई आंकड़े बताते हैं कि अर्थव्यवस्था अच्छी नहीं है मगर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में अब भी ऊंची दर से ही वृद्घि हो रही है।

तमाम आंकड़े बता रहे हैं कि खपत में काफी कमी आई है। अगर आप वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को गैर सरकारी वृद्घि की जगह रखें तो तस्वीर बहुत निराश करने वाली है। अप्रैल से दिसंबर के बीच जीएसटी संग्रह पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले करीब 3.5 फीसदी अधिक रहा है। यह नॉमिनल है। बजट में जीएसटी संग्रह में लगभग 20 फीसदी की नॉमिनल वृद्घि की उम्मीद लगाई गई थी।

अप्रैल से अक्टूबर के बीच मुद्रास्फीति के सूचकांकों में भी काफी फर्क रहा। थोक मुद्रास्फीति सूचकांक में 1 फीसदी वृद्घि हुई और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 4.5 फीसदी चढ़ गया। असल आंकड़ा इन दोनों के बीच कहीं होने की संभावना है। यदि हम कुछ मुद्रास्फीति मान लेते हैं तो जीएसटी संग्रह से पता चलता है कि गैर सरकारी गतिविधि बहुत धीरे बढ़ी या बिल्कुल भी नहीं बढ़ी। आधिकारिक अनुमान है कि गैर सरकारी जीडीपी वास्तविक अर्थों में 3.5 से 3.8 फीसदी के बीच है।

जीडीपी का लगभग 60 फीसदी हिस्सा खपत से आता है और खपत गैर सरकारी गतिविधि का और भी बड़ा हिस्सा है। जीएसटी के आंकड़ों को खपत के दूसरे ज्ञात संकेतकों जैसे वाहन बिक्री, बिस्कुट बिक्री, माल ढुलाई, बिजली की खपत आदि से जोड़ें तो यह धारणा और भी मजबूत हो जाती है कि खपत कम हो रही है। एक अनुमान है कि 2019-20 में खपत करीब 5-7 फीसदी की दर से बढ़ी, जबकि उससे पहले पूरे दशक में यह 20 फीसदी के करीब बढ़ती रही थी (ये सांकेतिक आंकड़े हैं और मुद्रास्फीति से नहीं जोड़े गए हैं)।

जीडीपी में वृद्घि की दर बढ़ाने के उद्देश्य से उठाए गए किसी भी नीतिगत कदम का लक्ष्य खपत में वृद्घि को बढ़ाना होना चाहिए। इसी को लक्ष्य बनाकर बजट तैयार किया जाना चाहिए और बजट से इतर सभी नीतियां भी इसी दिशा में होनी चाहिए। सरकार ने पहले कॉरपोरेट कर में कटौती जैसे दूसरे तरीके आजमाकर देख लिए हैं और उसने सरकारी व्यय को भी खतरनाक स्तरों तक पहुंचा दिया है। कॉरपोरेट कर में कटौती का फायदा कुछ कंपनियों को हुआ और उनका मुनाफा बढ़ा, लेकिन इसकी वजह से निवेश बढऩे की अपेक्षा पूरी नहीं हुई। यह अपेक्षा तब तक पूरी नहीं होगी, जब तक खपत जोर नहीं पकड़ती है।

खपत को कैसे बढ़ाया जा सकता है? एक तरीका तो आयकर की दरों में कटौती करना होगा। दूसरा तरीका यह हो सकता है कि सरकारी बैंकों को व्यक्तिगत ऋण की ब्याज दरों में कटौती कर खुदरा ऋण पोर्टफोलियो बढ़ाने के लिए कहा जाए। तीसरा तरीका ई-कॉमर्स में भारीभरकम छूट को बढ़ावा देना होगा, लेकिन इसके लिए उस क्षेत्र में हुए नीतिगत फैसले वापस लेने होंगे। चौथा तरीका जीएसटी की दरों को तर्कसंगत बनाना हो सकता है, जिसमें 28 फीसदी कर वाली सूची में शामिल वस्तुओं को 18 फीसदी कर वाली सूची में लाया जा सकता है। ऊपर बताए गए उपाय खपत पर निर्भर कारोबारों पर सकारात्मक प्रभाव डालेंगे और इन उपायों जैसी कुछ नीतियां बजट में शामिल नहीं होती हैं तो हैरत की बात होगी। इसके लिए खपत बढ़ाने के उपाय करने होंगे और रोजगार सृजित करने वाली नीति बनानी होगी।

औसत उपभोक्ता को इस समय भारी बेरोजगारी का माहौल दिख रहा है और जिनके पास रोजगार है, उनकी प्रति व्यक्ति आय में भी बहुत सुस्त वृद्घि हो रही है। इसलिए जिन लोगों के पास ठीकठाक बचत है, वे भी खर्च करने से हिचक रहे हैं। जो क्षेत्र रोजगार देते हैं, उन्हें बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाई गई नीतियां इस बार के बजट में दिख सकती हैं। इन क्षेत्रों में रियल एस्टेट, निर्माण एवं रिटेल शामिल हैं। यदि मान लें कि बजट तर्कसंगत होगा तो इन क्षेत्रों पर नजर रखनी होगी।
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