बिजनेस स्टैंडर्ड - बैंकों पर भारी पड़ेगा फंसा कर्ज
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बैंकों पर भारी पड़ेगा फंसा कर्ज

अभिजित लेले और देव चटर्जी / मुंबई 01 07, 2020

होगी मुश्किल

बैंक बड़ी संख्या में फंसे ऋणों का समाधान करने में नाकाम
जनवरी अंत तक कुछ बिजली कंपनियों के मामलों के निकल सकते हैं हल
फंसे ऋण के समाधान के लिए बैंक चाहते हैं अतिरिक्त समय
अब सारा दारोमदार आरबीआई पर

बिजनेस स्टैंडर्ड बैंकों पर भारी पड़ेगा फंसा कर्जफंसे ऋणों का मुद्दा नहीं सुलझने की स्थिति में बैंकों को मार्च 2020 तिमाही में अतिरिक्त 20 प्रतिशत रकम का प्रावधान करना पड़ सकता है। गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) पर 7 जून को आए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के परिपत्र में फंसे ऋणों के समाधान की समय सीमा 7 जनवरी को समाप्त हो गई है। बैंकरों ने कहा कि वे दिवालिया न्यायालयों से इतर समाधान पर ध्यान दे रहे हैं और उम्मीद है कि जनवरी अंत तक बिजली क्षेत्र के कुछ फंसे ऋण सुलझ जाएंगे। बैंकों का कहना है कि इससे उन्हें इस तिमाही में प्रावधान नहीं करने होंगे।

बैंकों ने फंसे ऋणों का अंबार खत्म करने के लिए आरबीआई से कुछ और समय मांगा है। बिजली कंपनियों में बैंकों के करीब 2.2 लाख करोड़ रुपये फंसे हैं। इनमें भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) का सबसे अधिक 57,000 करोड़ रुपये फंसा है और शेष रकम विभिन्न बैंकों ने दिए हैं। एसबीआई के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि आरबीआई के दिशानिर्देशों के अनुसार बैंक केवल 20 प्रतिशत ही अतिरिक्त प्रावधान कर सकते हैं, जो समाधान योजना लागू होने के बाद दोबारा अपने खाते में जोड़े जा सकते हैं।

अधिकारी ने कहा, 'फिलहाल हमें यह देखना है कि कितने मामलों के लिए हमारे पास टिकाऊ समाधान योजनाएं उपलब्ध हैं। इन मामलों के लिए बैंक अंतर-कर्जदाता समझौता (आईसीए) कर सकते हैं और मार्च 2020 से पहले योजना का क्रियान्वयन नहीं होने की स्थिति में 20 प्रतिशत प्रावधान कर सकते हैं।'

बैंकों ने अतिरिक्त समय के लिए आरबीआई में अपना प्रतिनिधिमंडल भी भेजा है। आईएलऐंडएफएस और दीवान हाउसिंग फाइनैंस (डीएचएफएल) जैसे कई बड़े मामले राष्टï्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में विचाराधीन हैं। एसबीआई के अधिकारी ने कहा कि रतनइंडिया पावर, प्रयागराज पावर और अंवता का झाबुआ पावर जैसे मामलों का समाधान जनवरी से पहले कर पाएंगे। अधिकारी ने कहा कि फंसे ऋण खातों से मुक्ति पाने के लिए बैंकों को कम से कम नौ से दस महीने का समय चाहिए। 

आबीआई ने पिछले साल 7 जून को अपने परिपत्र में ऋण समाधान योजना के लिए 210 दिनों का समय दिया था। इस समय सीमा का अनुपालन नहीं करने पर बैंकों को संबंधित कंपनी को दीवालिया न्यायालय भेजना होगा या 20 प्रतिशत अतिरिक्त रकम का प्रावधान करना होगा। इसके साथ ही उन्हें ऋण शोधन एवं दीवालिया संहिता (आईबीसी) से बाहर समाधान खोजना होगा। औसतन बैंक दिवालिया न्यायालयों के माध्यम से 50 प्रतिशत से भी कम रकम वसूल पा रहे हैं और इसमें भी उन्हें लंबी कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इन कारणों से बैंक न्यायालयों से इतर ऋण समाधन योजना तलाश रहे हैं। (साथ में सुब्रत पांडा)

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