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भारत की वृद्धि की कहानी की अधखुली परत

आलोक शील /  January 07, 2020

केंद्रीय सांख्यिकीय कार्यालय (सीएसओ) की तरफ से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के बारे में जारी आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2014-15 में शुरू हुआ आर्थिक विस्तार 2016-17 में 8.2 फीसदी के चरम पर पहुंच गया। उसके बाद 2017-18 में जीडीपी वृद्धि 7.2 फीसदी पर आ गई और फिर 2018-19 में यह 6.8 फीसदी हो गई। वित्त वर्ष 2019-20 की पहली छमाही में तो यह 4.8 फीसदी के स्तर पर लुढ़क चुकी है। 

तिमाही आंकड़े बताते हैं कि 2017-18 की चौथी तिमाही में 8.1 फीसदी के शिखर के बाद आर्थिक वृद्धि लगातार छह तिमाहियों में गिरावट पर रही है और 2019-20 की दूसरी तिमाही में तो यह 4.5 फीसदी के स्तर पर आ गई। सबसे ज्यादा गिरावट 2018-19 की दूसरी तिमाही में देखी गई जब वृद्धि एक तिमाही पहले की तुलना में पूरे एक फीसदी गिरकर सात फीसदी रह गई। उसकी अगली तिमाही में यह 6.6 फीसदी और फिर 5.8 फीसदी पर आ गई। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी गिरकर पांच फीसदी और फिर 4.5 फीसदी रह गई।

अर्थशास्त्रियों में इस बात को लेकर मतभेद है कि वृद्धि में आई गिरावट चक्रीय है या संरचनात्मक। इसके अलावा जीडीपी आकलन के लिए 2011-12 को नया आधार मानने से जुड़ा विवाद भी अभी तक सुलझा नहीं है। ये सारे आंकड़े इस नए आधार वर्ष के ही आधार पर जारी किए गए हैं। पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन और तत्कालीन आरबीआई गवर्नर दोनों ने ही 2011-12 सीरीज को वर्ष 2015 में लागू करते समय आशंकाएं जताई थीं। इसकी वजह यह है कि नए आंकड़े उच्च आवृत्ति वाले आंकड़े से मेल नहीं खाते हैं।

नई जीडीपी सीरीज के आधार पर पिछले आंकड़े सामने आने पर यह ताज्जुब और भी बढ़ गया। वर्ष 2003-04 से लेकर 2007-08 की अïवधि के लिए जीडीपी के 2004-05 सीरीज आधारित अनुमानों को संशोधित करते हुए 8.8 फीसदी से घटाकर 7.8 फीसदी कर दिया गया। इसका मतलब है कि वैश्विक तेजी के इस दौर में भारत की औसत वृद्धि दर 2014-15 और 2018-19 की अवधि में रही 7.5 फीसदी वृद्धि से महज 30 आधार अंक ही अधिक थी जबकि पुराने अनुमानों के हिसाब से 130 आधार अंकों का फर्क था। खास बात यह है कि सरकार ने ये संशोधन एक दशक बाद किए थे।

इन संदेहों को बल देने वाली बात यह थी कि राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग द्वारा रियल सेक्टर सांख्यिकी पर गठित समिति के तकनीकी विशेषज्ञों ने यह गणना की थी। इन गणनाओं में दिखा कि तीव्र वृद्धि के काल में जीडीपी वृद्धि असल में कहीं अधिक थी। विरोधी नेता इन आंकड़ों को लेकर सार्वजनिक रूप से भिड़ गए। इसकी वजह यह थी कि भले ही संप्रग-2 के समय वृद्धि कायम नहीं रही लेकिन संप्रग-1 यानी 2004-09 के दौरान वृद्धि 2014-19 के दौरान सत्तारूढ़ राजग सरकार से अधिक तेज थी। इसकी एक वजह यह है कि संप्रग-1 के समय वैश्विक तेजी का माहौल था। 

जीडीपी आंकड़ों को लेकर जारी बहस में अरविंद सुब्रमण्यन भी कूद पड़े हैं। उन्होंने गत जून एवं जुलाई में दो शोध-पत्रों के प्रकाशन के बाद इन पर अपनी राय रखी है। पहला, उन्होंने भारत के वृद्धि रुझानों की तुलना समान आधार वाले प्रमुख विकासशील देशों से की। दूसरा, उन्होंने प्रमुख जीडीपी आंकड़ों और उच्च आवृत्ति संकेतकों के बीच विसंगतियों पर भी गौर किया। इस आधार पर उन्होंने अनुमान जताया कि 2011-12 से आगे की अवधि के लिए भारत की वृद्धि सीएसओ अनुमान से करीब 2.5 फीसदी कम थी। उनके दूसरे पत्र में ये दलीलें दोहराए जाने के बावजूद अधिमूल्यांकन से बचने की कोशिश की गई थी। जीडीपी वृद्धि के आंकड़े मोटे तौर पर दूसरे आर्थिक आंकड़ों से मेल खाने चाहिए ताकि वृहद-आर्थिक तर्क पर उन्हें परखा जा सके। अगर ऐसा नहीं होता है तो जीडीपी आंकड़ों पर नए सिरे से गौर करने की जरूरत है।

इस तरह के कई डेटा समूहों के बारे में सोचा जा सकता है जिनका जीडीपी वृद्धि दर के मजबूत सकारात्मक सह-संबंध है। ऐसे मौके हो सकते हैं जब कुछ विशेष कारणों से एक खास संकेतक अल्प समय के लिए तालमेल में न रहा हो। सामूहिक तौर पर देखें तो यह कल्पना कर पाना मुश्किल है कि शीर्ष संकेतकों को जीडीपी से सकारात्मक सह-संबंध न हो। ऐसे सारे संकेतक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राष्ट्रीय आय की गणना का हिस्सा बनते हैं। 

औद्योगिक उत्पादन सूचकांक, कृषि उत्पादन सूचकांक, ऑटो उत्पादन, बिजली उत्पादन, रेल-सड़क-वायु मालवहन, निर्यात, केंद्रीय कर राजस्व, कॉर्पोरेट मुनाफा, रोजगार, बैंक क्रेडिट, सूचना प्रौद्योगिकी बाजार का आकार, शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और सेंसेक्स जैसे संकेतकों पर गौर किया जाता है। जहां कहीं भी मौद्रिक आंकड़ों का इस्तेमाल होता है वहां वे थोकमूल्य एवं उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति के औसत से अपस्फीतिकारी होते हैं। इसका कारण यह है कि वास्तविक जीडीपी वृद्धि से तुलना की जाती है। डॉलर के वर्चस्व वाली सीरीज को अंकित मूल्य पर लिया जाता है।

कुल मिलाकर ये डेटा समूह 2003-04 और 2007-08 के बीच जबरदस्त वृद्धि की तरफ इशारा करते हैं। उसके बाद 2008-09 और 2009-10 में वैश्विक वित्तीय एवं आर्थिक संकट के बीच इसमें भारी गिरावट आई। हालांकि 2010-11 में बहुत तेजी से हालात सुधरे और वृद्धि ने रफ्तार पकड़ लिया। लेकिन उसके बाद वृद्धि गिरी और पिछली अवधि से काफी नीचे आ गई। 

आंकड़े बताते हैं कि नई सरकार के काम संभालने के बाद 2014-15 और 2017-18 के बीच वृद्धि में मामूली सुधार ही हुए। हालांकि नोटबंदी एवं दोषपूर्ण कर सुधार (जीएसटी) की वजह से यह फिर से नीचे चली गई। आंकड़ों के मुताबिक 2014-15 और 2018-19 के बीच कुल वृद्धि 2003-04 और 2007-08 के दौर की वृद्धि से साफ तौर पर कम थी। 

एक समग्र मूल्यांकन के अभाव में जीडीपी वृद्धि के प्रामाणिक वैकल्पिक आंकड़े पेश कर पाना मुश्किल है। वैसे यह आंकड़ा सुब्रमण्यन के उस आकलन से काफी हद तक मेल खाता नजर आता है कि 2011-12 के परवर्ती काल में जीडीपी वृद्धि को 2-2.5 फीसदी तक बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है। इसका मतलब है कि 2014-15 और 2018-19 के बीच औसत वृद्धि दर पांच फीसदी के करीब हो सकती है जबकि सीएसओ ने 2011-12 सीरीज के आधार पर इसके 7.5 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है। एक मतलब यह भी है कि फिलहाल जीडीपी महज 2-2.5 फीसदी की दर से ही बढ़ रही है।

निष्कर्षत: अगर विवादास्पद जीडीपी आंकड़ों को परे रखकर अन्य आंकड़ों पर नजर डालें तो यह पता चल जाएगा कि 2011-12 के बाद से ही वृद्धि के मोर्चे पर सुधार कमजोर ही रहा है। वर्ष 2003-08 के समय के उच्च स्तर से वृद्धि संभावना में होने वाली गिरावट हिस्टैरिसिस प्रक्रिया के आधार पर संरचनात्मक नजर आएगी। दूसरी तरफ, पिछली कुछ तिमाहियों में आई तीव्र गिरावट निम्न आधार वाली जीडीपी पर संभवत: चक्रीय हो सकती है। 

जहां वृहद-आर्थिक नीतियां वृद्धि को दोबारा पांच फीसदी पर लौटा सकती हैं वहीं वृद्धि संभावना को 2003-08 के स्तर के आसपास भी लाने के लिए बड़े संरचनात्मक सुधारों की जरूरत होगी। पुराने मुद्दों के अलावा बैंकिंग प्रणाली की खामियां दूर करना, सरकार एवं आर्थिक गतिविधियों के बीच खोए भरोसे को बहाल करना और एक सुविचारित, अनुमानित एवं भविष्योन्मुख नीति का रोडमैप बनाना होगा।
(लेखक इक्रियर संस्थान में आरबीआई पीठ के प्रोफेसर हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)
Keyword: GDP, Fiscal Deficit, Slowdown, Business, Budget, Economic growth, CSO, NSO, केंद्रीय कर राजस्व, कॉर्पोरेट मुनाफा, रोजगार, बैंक क्रेडिट, सूचना प्,
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