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बजट से ही आस

संपादकीय /  January 07, 2020

राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय (एनएसओ) ने चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर पांच फीसदी रहने का जो पहला अग्रिम अनुमान लगाया है वह भारतीय रिजर्व बैंक के हालिया रुख के अनुरूप ही है और अचरज में नहीं डालता है। लेकिन यह गत जुलाई में पेश आर्थिक समीक्षा में अनुमानित सात फीसदी की वृद्धि से खासा कम है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस वित्त वर्ष में विनिर्माण गतिविधियां दो फीसदी दर से बढऩे का अनुमान है जबकि वर्ष 2018-19 में यह 6.9 फीसदी रही थीं। इसी तरह रोजगार के लिहाज से अहम निर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर 3.2 फीसदी रहने का अनुमान है जो गत वित्त वर्ष में 8.7 फीसदी रही थी। सकल स्थायी पूंजी निर्माण के आंकड़े खास तौर पर चिंताजनक हैं। गत वित्त वर्ष में दस फीसदी पर रहा सकल स्थायी पूंजी निर्माण इस साल महज एक फीसदी की दर से ही बढ़ता दिख रहा है। हालांकि पिछले साल की तुलना में चालू वित्त वर्ष में सरकारी गतिविधियों में अधिक तेजी है लेकिन मौजूदा राजकोषीय स्थिति में यह भी दबाव में आ सकता है।

नॉमिनल संदर्भ में अर्थव्यवस्था के महज 7.5 फीसदी दर से ही बढऩे की संभावना है जबकि जुलाई में बजट पेश करते समय 12 फीसदी का अनुमान लगाया गया था। अपेक्षित स्तर से सुस्त वृद्धि हालात को अपने-आप जटिल बनाएगी। मसलन, अगर समग्र रूप में सकल राजकोषीय घाटा लक्षित स्तर तक ही सीमित रहता है तो अर्थव्यवस्था के आकार में अनुमान से कम वृद्धि जीडीपी प्रतिशत में घाटा बढ़ा देगी। इसके अलावा सरकार को अपने राजस्व में 2 लाख करोड़ रुपये की संभावित गिरावट से भी निपटना होगा।

सरकार के विनिवेश लक्ष्य हासिल नहीं कर पाने की आशंका समस्या को और बढ़ाने का ही काम करेगी। नतीजतन, सरकार को अपने व्यय में करीब 2.2 लाख करोड़ रुपये की कटौती करनी पड़ सकती है। राजस्व परिदृश्य के मद्देनजर व्यय को कुछ हद तक तर्कसंगत बनाना अपरिहार्य हो जाएगा लेकिन सरकार को आर्थिक गतिविधियों पर इसके प्रभाव को लेकर भी सजग रहने की जरूरत होगी। आंकड़े बताते हैं कि सरकारी व्यय का साथ नहीं मिलने पर वृद्धि और भी कमजोर होती। सुस्त नॉमिनल वृद्धि भारतीय कारोबारों को भी प्रभावित करेगी और कर्ज चुकाने में उन्हें अधिक मुश्किलें होने लगेंगी। यह बैंकिंग प्रणाली को दबाव में ला सकता है जिससे ऋण प्रवाह में भी कमी आएगी। 

आर्थिक वृद्धि में तेजी आने की संभावनाएं पश्चिम एशिया में पैदा हुए नए तनाव से धूमिल हुई हैं। कच्चे तेल की आपूर्ति में बाधा पडऩे और तेल के भाव बढऩे की आशंका वैश्विक एवं घरेलू वृद्धि दोनों पर असर डालेगी। तेल कीमतों में वृद्धि और रुपये के भाव में कमी शीर्ष मुद्रास्फीति बढ़ा सकती है जिससे निकट अवधि में ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम हो जाएगी। रुपये का व्यवस्थित मूल्यह्रास जहां भारतीय निर्यातकों को मदद पहुंचाएगा वहीं वैश्विक जोखिम से बचने की कोशिश मुद्रा बाजार में अस्थिरता बढ़ा सकती है।  

बहरहाल, मौजूदा स्थिति के लिहाज से वित्तीय बाजारों में जोखिम को बड़े केंद्रीय बैंकों के समझौतावादी रुख से एक हद तक संतुलित कर लिया जाएगा। वृद्धि को लेकर वैश्विक जोखिम होने के बावजूद इस समय भारत की चुनौतियां काफी हद तक घरेलू हैं। लिहाजा अर्थव्यवस्था की हालत पर नए सिरे से गौर करना होगा और सभी हितधारकों को यह देखने के लिए अब केंद्रीय बजट की तरफ नजरें टिकानी होंगी कि सरकार वृद्धि तेज करने के लिए क्या योजना बना रही है? वास्तविक आर्थिक एवं राजकोषीय स्थिति को स्वीकार करना इस लक्ष्य की तरफ उठाया जाने वाला पहला कदम होगा।

Keyword: Budget, NSO, GDP, government data, job, employment, divestment, revenue,
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