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देश के बुनियादी विकास में तेजी की तैयारी

ए के भट्टाचार्य /  January 06, 2020

बीते वर्ष के अंतिम दिन एक संवाददाता सम्मेलन में टास्क फोर्स ऑन नैशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन फॉर 2019-25 की रिपोर्ट जारी करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दो महत्त्वपूर्ण संदेश दिए। पहला, उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि उन्हें 2020-21 का आम बजट पेश करने से एक महीना पहले मीडिया से मिलने में कोई परेशानी नहीं है। दूसरा, यह कि उन्हें अर्थव्यवस्था की स्थिति को देखते हुए देश को यह बताने में देरी का कोई कारण नजर नहीं आता कि वरिष्ठ सरकारी अधिकरियों के एक समूह ने बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निवेश को पटरी पर लाने के लिए क्या सिफारिश की है। 

अमूमन बजट से पहले वित्त मंत्री और वित्त मंत्रालय मीडिया से दूर ही रहते हैं। ऐसा कम ही होता है कि वित्त मंत्रालय का कोई अधिकारी बजट पेश होने से चार हफ्ते पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस करे, वित्त मंत्री तो दूर की बात है। बजट को लेकर गोपनीयता बरती जाती है और बजट में की जाने वाली घोषणाओं को गोपनीय रखने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाते हैं। इसलिए, बजट से एक महीना पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस से परहेज किया जाता है। ऐसी स्थिति में बजट से एक महीना पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का मकसद यही रहा होगा कि सभी को यह स्पष्टï संदेश दिया जाए कि सरकार बुनियादी ढांचे में ज्यादा निवेश को लेकर गंभीर है। 

हालांकि, इस प्रक्रिया में एनआईपी टास्क फोर्स की रिपोर्ट में 1 फरवरी को पेश किए जाने वाले बजट के बारे में कुछ अहम संकेत दिए होंगे। उदाहरण के लिए टास्क फोर्स के अनुमान के मुताबिक 2019-20 में सकल घरेलू अनुपात (जीडीपी) की नॉमिनल वृद्घि करीब 8 फीसदी रहेगी जबकि पहले इसके 12 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया था। नॉमिनल संदर्भ में 2019-20 में जीडीपी के 205.37 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है जो 2018-19 में 190 लाख करोड़ रुपये थी। टास्क फोर्स के मुताबिक नॉमिनल जीडीपी के 2020-21 में 10.5 फीसदी और 2021-22 में 12 फीसदी की रफ्तार से बढऩे का अनुमान है। 

आर्थिक मामलों के सचिव अतनु चक्रवर्ती टास्क फोर्स के प्रमुख हैं। नीति आयोग के मुख्य कार्याधिकारी और वित्त मंत्रालय तथा दूसरे प्रशासनिक मंत्रालयों के सचिव इसके सदस्य हैं। तो क्या टास्क फोर्स के आंकड़ों से आपको मौजूदा आर्थिक वृद्धि परिदृश्य की थाह नहीं मिलती है जिसमें अगले वर्ष का बजट बनाया जा रहा है? हर कोई जानता है कि आर्थिक वृद्धि की गति धीमी पड़ रही है लेकिन इस रिपोर्ट के जारी होने से पहले सरकार में किसी ने भी नहीं कहा था कि 2019-20 में नॉमिनल वृद्धि केवल 8 फीसदी रहेगी। जाहिर है कि सरकार के कर राजस्व पर इसका प्रतिकूल असर होगा। 

एनआईपी टास्क फोर्स की रिपोर्ट से यह पता भी चलता है कि बुनियादी ढांचा क्षेत्र के लिए अगले बजट में क्या हो सकता है। 2018-19 में बुनियादी ढांचा क्षेत्र के लिए केंद्र सरकार की सकल बजट सहायता 1.39 लाख करोड़ रुपये रही थी जो विभिन्न मदों के तहत सभी पूंजीगत व्यय के लिए सरकार की कुल बजट सहायता का 44 फीसदी है। 2019-20 में कुल पूंजीगत खर्च के लिए सकल बजट सहायता में बुनियादी ढांचा क्षेत्र के लिए बजट सहायता का हिस्सा 45 फीसदी यानी 1.53 लाख करोड़ रुपये है। टास्क फोर्स के मुताबिक 2020-21 में बुनियादी ढांचा क्षेत्र के लिए 1.86 लाख करोड़ रुपये के बजट सहायता की जरूरत होगी। अगर अगले वर्ष भी 44-45 फीसदी हिस्सेदारी बरकरार रहती है तो पूंजीगत व्यय के लिए केंद्र सरकार की सकल बजट सहायता 22 फीसदी बढ़कर 4.13 लाख करोड़ रुपये बढऩी चाहिए। 22 फीसदी से कम बढ़ोतरी का मतलब होगा कि वित्त मंत्रालय ने अपनी समिति की रिपोर्ट ही स्वीकार नहीं की है।

एनआईपी टास्क फोर्स का साथ ही कहना है कि बुनियादी क्षेत्र के लिए सरकार का कुल खर्च 2020-21 में 21 फीसदी बढ़कर 4.58 लाख करोड़ रुपये होना चाहिए जो 2019-20 में 3.77 लाख करोड़ रुपये है। यह एक महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य है क्योंकि 2019-20 में बुनियादी क्षेत्र के लिए कुल व्यय में केवल 6.5 फीसदी की बढ़ोतरी की गई थी। 

सरकार के कुल पूंजीगत खर्च (भारतीय रेल सहित सार्वजनिक इकाइयों की आंतरिक और अतिरिक्त बजट संसाधनों सहित) में बुनियादी क्षेत्र पर कुल सरकारी खर्च का हिस्सा 38 से 43 फीसदी के बीच रहा है। अगर यह हिस्सा 2020-21 में बरकरार रहता है तो अगले साल के बजट में सरकार के कुल पूंजीगत व्यय में 21 फीसदी बढ़ोतरी के साथ 10.65 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान होना चाहिए। 

इन आंकड़ों से साफ है कि एनआईपी टास्क फोर्स ने अगले साल बुनियादी क्षेत्र के लिए सरकारी फंड में भारी बढ़ोतरी का सुझाव दिया है। क्या सरकार बुनियादी क्षेत्र के लिए ज्यादा वित्तीय खर्च की मांग को नजरदांज कर सकती है? और क्या बजट से कुछ दिन पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस कर एनआईपी टास्क फोर्स की रिपोर्ट जारी करने के फैसले का मकसद सरकार के भीतर प्रभावशाली वर्गों पर ज्यादा खर्च करने की जरूरत स्वीकार करने और राजकोषीय समेकन लक्ष्यों के लिए ज्यादा दबाव डालना है।

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