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नए साल में कैसे होंगे भारत-अमेरिका संबंध

अनीता इंदर सिंह /  January 06, 2020

नवनर्ष 2020 में भारत-अमेरिका संबंधों के लिए क्या परिदृश्य दिख रहा है? वर्ष 2006 में असैन्य परमाणु समझौते पर हुए हस्ताक्षर इस रिश्ते में उछाल की बानगी थी लेकिन वर्ष 2017 में डॉनल्ड ट्रंप के अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद हालात बदलने लगे। वर्ष 1991 के बाद अमेरिकी आकलन में भारत की हैसियत ऊपर होने का सबसे बड़ा कारण आर्थिक प्रगति थी। करीब डेढ़ दशक तक इसकी उच्च वृद्धि दरों ने अमेरिका को यह यकीन दिला दिया था कि भारत को तेजी से उभरते सर्वाधिकारवादी चीन के बरक्स खड़ा किया जा सकता है।

इसके अलावा एक बहुसांस्कृतिक लोकतंत्र के तौर पर भारत के स्थायित्व ने भी अमेरिका को प्रभावित किया, खासकर 1991 में यूगोस्लाविया और सोवियत संघ के पतन के बाद। हालांकि 2019 आने तक दुनिया के समक्ष यह साफ हो चुका है कि भारत की अर्थव्यवस्था गत छह वर्षों से पतन की राह पर है। इसके अलावा 2014 के बाद से ही सांप्रदायिक हिंसा की बढ़ती घटनाएं और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लेकर देश भर में छिड़े विरोध प्रदर्शन राजनीतिक एवं सामाजिक ध्रुवीकरण को बयां कर रहे हैं। ये परिस्थितियां अपने लोकतंत्र की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

आर्थिक गिरावट और इससे जल्द उबरने की संभावना खारिज करने के बाद चीन के मुकाबले भारत को खड़ा करने के लिए ट्रंप की तरफ से पेश 'हिंद-प्रशांत' की अवधारणा भी सवालों के घेरे में आ गई है। बीते दशक में भारत और अमेरिका ने 15 अरब डॉलर से अधिक मूल्य वाले रक्षा सौदों पर दस्तखत किए हैं और हाल ही में अमेरिका ने एक अरब डॉलर मूल्य की नेवल गन बेचने की भी पेशकश रखी है। लेकिन भारत को चिढ़ाने वाली बात यह है कि एक औपचारिक सहयोगी नहीं होने से अमेरिका अब भी उसे संवेदनशील सैन्य तकनीक देने से मना कर देता है।

संप्रभुता कहती है कि भारत को रूस से एस-400 मिसाइलें खरीदने का हक है, वहीं इस हवाई सुरक्षा प्रणाली के चलते अमेरिका के साथ नजदीकी सैन्य संबंध अवरुद्ध हो जाते हैं। अमेरिका रूस को अपनी सुरक्षा के लिए एक खतरे के तौर पर देखता है। अगर एक गठबंधन का अभाव अपनी सामरिक स्वायत्तता बनाए रखने की भारतीय प्रतिबद्धता को दर्शाता है तो यह अमेरिका को भारत के साथ संबंधों की व्यवहार्यता को लेकर संदिग्ध बना देता है।

कारोबारी मुद्दे भी उनके रिश्ते में अहम हैं। भारत की लालफीताशाही और संरक्षणवादी शुल्क अमेरिका को नागवार गुजरते हैं। ये मुद्दे एक व्यापारिक साझेदार के तौर पर भारत की चमक फीकी कर देते हैं। अमेरिकी निर्यात का महज 2.1 फीसदी ही भारत आता है और 2.2 फीसदी आयात भारत से होता है। वहीं भारतीय आयात का 15 फीसदी अमेरिका से आता है और उसके निर्यात का 16 फीसदी अमेरिका को जाता है। लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था के पतनोन्मुख होने के बीच चीन ने अपनी बेल्ट एवं सड़क पहल (बीआरआई) का विस्तार दुनिया भर में कर अपनी आर्थिक प्रगति का प्रदर्शन किया है। यूरोपीय संघ के कई सदस्य देशों और भारत के सारे पड़ोसियों ने बीआरआई का हिस्सा बनना स्वीकार कर लिया है।

चीन के वित्तीय घूंसे ने उसे इन अर्थव्यवस्थाओं में सबसे बड़े निवेशक के तौर पर स्थापित कर दिया है। यह म्यांमार और बांग्लादेश को सबसे बड़ा हथियार विक्रेता भी है। हिंद महासागर में उसकी बढ़ती मौजूदगी एक प्रभावशाली दक्षिण एशियाई ताकत के तौर पर भारत की हैसियत के समक्ष मुश्किल सवाल खड़े करता है। 

घरेलू मोर्चे पर सीएए पारित होने के बाद देश भर में उठे विरोध के स्वरों ने भारत की धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक छवि को लेकर अमेरिका में बहुतों को आशंकित कर दिया है। उसके पहले भी अमेरिकी विदेश विभाग ने गत वर्ष जून में कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के समय भारत में धार्मिक असहिष्णुता बढ़ी है। भारत ने इसका प्रतिवाद करते हुए कहा था कि किसी विदेशी सरकार को उसके अंदरूनी मामलों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है।

वॉशिंगटन में दिसंबर में हुई 2प्लस2 बैठक में अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पिओ ने कहा कि अमेरिका हर जगह अल्पसंख्यकों एवं धार्मिक अधिकारों के संरक्षण को लेकर फिक्रमंद रहता है। उन्होंने हिंद-प्रशांत भागीदारी में विश्वास जताते हुए कहा कि यह सहयोग लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। 

अमेरिकी अधिकारियों के विचार एक-दूसरे से मेल नहीं खाते हैं। पॉम्पिओ का बयान घरेलू तनावों के चलते भारत पर ट्रंप प्रशासन की तरफ से कोई भी दबाव डालने की बात नकारता नजर आया लेकिन अमेरिकी सांसदों का रवैया कुछ अलग कहानी ही कहता है। अगस्त के बाद कश्मीर के हालात और नागरिकता कानून के विरोध में उठे विरोध से निपटने के लिए किए गए ताकत के इस्तेमाल का हवाला देते हुए अमेरिकी कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता पर सवालिया निशान लगाए हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी अल्पसंख्यकों को समान अधिकार देने का मुद्दा उठाया गया है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कश्मीर पर चर्चा के लिए अमेरिकी संसद की विदेश समिति से मिलने से मना कर दिया तो यही बात उठी कि मानवाधिकार का मुद्दा उठाने वाले अमेरिकी सांसद ऐसी हरकत की उम्मीद किसी तानाशाही सरकार से करते हैं, भारत से नहीं।

सामरिक भागीदारी के बावजूद भारत और अमेरिका का रिश्ता वर्ष 2020 में हिलोरें मारती तरंगों से ही गुजरेगा। लेकिन भारत और चीन के बीच आर्थिक फासला होने से हिंद-प्रशांत के लिए ट्रंप की योजना में भारत की अहमियत को लेकर सवाल खड़े होते हैं। चीन की प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत की तुलना में चार गुने से भी अधिक है। इसी तरह चीन का 177.6 अरब डॉलर का रक्षा बजट भारत का तिगुना है। जहां चीन वर्ष 2050 तक विश्व स्तरीय सेना बनाने की मंशा रखता है, वहीं भारत को अपने सशस्त्रबलों को आधुनिक बनाना भी मुश्किल हो रहा है। 

अमेरिका पर अपनी आर्थिक एवं सैन्य निर्भरता से भारत जहां जलता है वहीं अमेरिका को इससे कोफ्त होती है। ट्रंप प्रशासन समृद्ध सहयोगी पसंद करता है क्योंकि इस तरह वे साझा खतरों का सामना बेहतर ढंग से कर सकते हैं।

नए साल की शुरुआत में भारत की लोकतांत्रिक स्थिरता एवं आर्थिक प्रगति अनिश्चित नजर आ रही है। भले ही नागरिकता कानून के खिलाफ हो रहे व्यापक प्रदर्शन रोजगार के मौके कम होने से उपजे गुस्से को भी बयां करते हैं लेकिन सरकार आर्थिक एवं सामाजिक-राजनीतिक संकट से उबरने के लिए वित्तीय एवं मानव संसाधनों के इस्तेमाल का कोई संकेत नहीं दिखा रही है। इसके बजाय नागरिकता कानून पर अमल की दिशा में बढऩा यह दिखाता है कि वह धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र से दूर होने की कोशिश से अस्थिरकारी संघर्षों के पनपने की चेतावनी को नजरअंदाज करती है।

हिंद महासागर में भारत की सामरिक स्थिति ऐसी है कि अमेरिका उसे नजरअंदाज नहीं कर सकता है। लेकिन वर्ष 2020 यह बताएगा कि क्या घरेलू स्तर पर आर्थिक एवं राजनीतिक मुश्किलों में घिरा भारत अमेरिका के साथ सामरिक सहयोग के लिहाज से बेमेल है या दोनों देशों के बीच करीबी सामरिक संबंध संभव हैं?

(लेखिका सेंटर फॉर पीस ऐंड कॉन्फ्लिक्ट रिजॉल्यूशन, नई दिल्ली की संस्थापक प्रोफेसर हैं)
Keyword: US, India, Trade, GSP, General Scheme of Preference, Data, Revenue, Product, CAA, Tariff,
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