बिजनेस स्टैंडर्ड - खाड़ी संकट में तैयारी
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खाड़ी संकट में तैयारी

संपादकीय /  January 06, 2020

इराक दौरे पर गए ईरान के शीर्ष सैन्य अधिकारी कासिम सुलेमानी की अमेरिकी हमले में हुई हत्या ने पश्चिम एशिया में हालात बिगाड़ दिए हैं। इस इलाके के सशस्त्र संघर्ष के मुहाने पर पहुंच जाने से तेल कीमतों में अचानक उछाल आई है। ईरानी सेना की विशिष्ट इकाई कुद्स फोर्स के मुखिया के रूप में सुलेमानी क्षेत्रीय राजनीति में अहम स्थान रखते थे और खुद ईरान के भीतर वह काफी लोकप्रिय एवं सशक्त थे।

इस हत्या के बाद खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढऩे के आसार नजर आ रहे हैं। ऐसा होने पर अल्पावधि से लेकर मध्यम अवधि में तेल कीमतों के रुख को लेकर कोई भी अनुमान लगा पाना आसान नहीं है। एक तरफ तो अमेरिका का शेल तेल उत्पादन तेज है जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में मांग कमजोर है। वैसे बाजार किसी भी तरह  जरूरत से ज्यादा आपूर्ति की तरफ बढ़ रहा था। लेकिन समस्या यह है कि सीमित संघर्ष में भी तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जा सकता है। आपूर्ति शृंखला से हटा देने पर तेल की किल्लत पैदा हो सकती है जिससे अल्पावधि से मध्यावधि के भीतर तेल कीमतें चढ़ सकती हैं।

इस तरह भारत सरकार को तीन पहलुओं पर ध्यान देते हुए अपनी तैयारियां करनी होंगी। ये पहलू कई दशकों से एकसमान रहे हैं और पश्चिम एशिया में स्थिरता पर भारत की निर्भरता का कारण भी हैं। पहला बिंदु तेल की आपूर्ति से जुड़ा है। भारत को अपनी 84 फीसदी तेल जरूरतें आयात से पूरी करनी पड़ती हैं। इस तरह तेल कीमतों में उछाल न केवल घरेलू लागत परिस्थितियों बल्कि भुगतान संतुलन पर भी बड़ा अंतर डालता है। तेल कीमतें बढऩे से पूरी अर्थव्यवस्था में स्वाभाविक तौर पर स्फीतिकारी दबाव पड़ेंगे। लिहाजा भारतीय रिजर्व बैंक को ब्याज दरें तय करते समय कहीं अधिक सजगता दिखाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

अतीत में ऊंची तेल कीमतों ने बाह्य खाते को खासा कमजोर किया है। पश्चिम एशिया में 1991 में पैदा हुए ऐसे ही संकट के बाद भारत के समक्ष भुगतान संतुलन का संकट पैदा हुआ था जिसके बाद देश में उदारीकरण की शुरुआत हुई थी। आज 450 अरब डॉलर के साथ भारत का विदेशी मुद्रा भंडार काफी सुविधाजनक स्थिति में है और तेल कीमतों के मौजूदा स्तर पर रहने पर इससे अगले नौ-दस महीनों तक तेल आयात का इंतजाम हो सकता है। अगर तेल कीमतों में लगातार एवं तीव्र वृद्धि होती है तो फिर इस बफर में सेंध लग सकती है। हालांकि दो पहलू ऐसे हैं जो सरकार के लिए चिंता का विषय हैं। इन दोनों का ताल्लुक पश्चिम एशिया खासकर फारस की खाड़ी क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारतीय समुदाय की मौजूदगी है।

निश्चित रूप से उनकी सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। अतीत में भारत ने खाड़ी देशों में रहने वाले अपने नागरिकों की सुरक्षित वापसी के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाया था। पहले खाड़ी युद्ध के समय कुवैत और हाल में लीबिया से अपने नागरिकों को सुरक्षित वापस लाया गया था। खाड़ी देशों से भारतीयों की सुरक्षित निकासी की योजना इस बार कहीं अधिक बड़े पैमाने पर अंजाम देनी होगी, वैसे ऐसी स्थिति आने की संभावना कम ही लग रही है। 

हालांकि तनाव गहराने से आने वाली गिरावट के चलते बड़ी संख्या में अस्थायी कामगारों को भारत लौटना पड़ सकता है। ऐसा होने पर भारत को खाड़ी देशों से भेजा जाने वाला पैसा भी कम हो जाएगा। वर्ष 2016-17 में अकेले संयुक्त अरब अमीरात से 27 फीसदी विदेशी धन भारत में आया था और अन्य खाड़ी देशों का भी योगदान 27 फीसदी रहा था। भारत आने वाली आधी से भी अधिक विदेशी मुद्रा केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु एवं कर्नाटक राज्यों में आती है। धन की आवक में बड़ी कमी होने से बाह्य खाते एवं इन राज्यों की अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ेगा। लिहाजा भारत सरकार को खाड़ी के घटनाक्रम पर नजदीकी निगाह रखने के साथ अपनी तैयारियां भी रखनी होंगी।
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