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नए साल में लें निवेश का हाल ताकि बरकरार रहे आपका माल

संजय कुमार सिंह /  01 06, 2020

साल 2020 आ गया है और हो सकता है कि सर्दियों के इस मौसम में आप अपनी पसंदीदा जगह की सैर कर रहे हों। यह भी हो सकता है कि सैर के खयालों को ताक पर रखकर आप अपने बरामदे में अंगीठी या अलाव के पास कंबल में पसरे हों और गर्म पकौडिय़ों या अदरक वाली चाय का लुत्फ ले रहे हों। हाड़ कंपाती सर्दी में इससे अच्छा और क्या हो सकता है। लेकिन इस सबके बीच आप एक जरूरी काम को नजरअंदाज तो नहीं कर रहे? वह जरूरी काम है अपनी वित्तीय स्थिति पर नजर डालना और यह सुनिश्चित करना कि वित्तीय लक्ष्यों के हिसाब से आपका निवेश एकदम दुरुस्त हो। 

पोर्टफोलियो में फेरबदल

जिन निवेशकों का निवेश पोर्टफोलियो श्रेणियों में बंटा होता है, वे जोखिम उठाने की अपनी क्षमता के मुताबिक एक खास प्रकार का संपत्ति आवंटन करते रहेंगे। उनका कुछ निवेश शेयरों में जाएगा, कुछ स्थिर आय योजनाओं में और कुछ सोने तथा अन्य निवेश श्रेणियों में होगा। आम तौर पर पिछले एक साल में किसी एक संपत्ति श्रेणी का प्रदर्शन बाकी सबसे अच्छा होने और दूसरी श्रेणी का प्रदर्शन कमतर होने के कारण निवेशकों का संपत्ति आवंटन गड़बड़ा जाता है। इसलिए उसे पटरी पर लाना जरूरी है। इसके लिए शानदार प्रदर्शन करने वाली संपत्ति श्रेणी में मुनाफावसूली करनी चाहिए और उसकी रकम कम प्रदर्शन वाली संपत्ति श्रेणियों में लगाकर पहले से निर्धारित संपत्ति आवंटन पर लौटना चाहिए।

निवेशकों को यह भी देखना चाहिए कि उप-संपत्ति श्रेणियों में उनका निवेश एकदम ठीक है या नहीं। उदाहरण के लिए इस साल लार्ज-कैप फंडों ने मिड और स्मॉल-कैप फंडों से बेहतर प्रदर्शन किया है। संभव है कि निवेशक के पोर्टफोलियो में लार्ज-कैप फंड कुछ ज्यादा ही हो गए हों। ऐसे में उसे संभलना जरूरी है।

पोर्टफोलियो में संतुलन को जोखिम कम करने के लिहाज से जरूरी बताते हुए आदित्य बिड़ला सन लाइफ म्युचुअल फंड के सह-मुख्य निवेश अधिकारी महेश पाटिल कहते हैं, 'संपत्ति श्रेणियां हमेशा एक चक्र में चलती हैं। कोई भी संपत्ति श्रेणी एक निश्चित अवधि तक अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। इसकी वजह से निवेशक के पोर्टफोलियो में उस संपत्ति श्रेणी की भरमार हो जाती है। ऐसे में जरूरी है कि मुनाफावसूली की जाए और संपत्ति को पहले से तय स्तर पर लाया जाए।

ऐसा नहीं किया तो जब भी उस संपत्ति श्रेणी में गिरावट आएगी तो ढिलाई बरतने वाले निवेशक को नियमित बदलाव कर रहे निवेशक से अधिक चोट खानी पड़ेगी।' पाटिल उदाहरण भी देते हैं। 2013 से 2017 के बीच मिड और स्मॉल-कैप श्रेणियों ने बहुत जबरदस्त प्रदर्शन किया, लेकिन 2018 की शुरुआत से ही उनमें गिरावट आने लगी। जिस निवेशक ने बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे मिड और स्मॉल-कैप में अपने आवंटन को दुरुस्त नहीं किया होगा, उसे 2018 से अच्छी खासी चपत खानी पड़ी होगी।

आजकल किसी वित्त वर्ष में शेयरों से होने वाला मुनाफा अगर 1 लाख रुपये के पार पहुंच जाता है तो उस पर 10 फीसदी की दर से दीर्घावधि पूंजीगत लाभ कर वसूला जाता है। निवेशक कर की रकम में कटौती के लिए कुछ तरीके आजमा सकते हैं। सबसे पहले, अगर पहले से तय किए गए स्तर के मुकाबले पोर्टफोलियो में अधिक फेरबदल नहीं हुआ है और निवेशक के पास फालतू रकम पड़ी है तो वह बेहतरीन प्रदर्शन वाली संपत्ति श्रेणी की बिकवाली के बजाय कमजोर प्रदर्शन वाली श्रेणी में और भी निवेश कर सकता है। दूसरा, 1 लाख रुपये की सीमा किसी एक व्यक्ति पर लागू होती है। इसलिए पति और पत्नी अपने-अपने पोर्टफोलियो से थोड़ी-थोड़ी बिकवाली कर इस बंदिश का फायदा उठा सकते हैं और परिवार का पोर्टफोलियो स्तर दुरुस्त रख सकते हैं। वित्तीय योजनाकार आगाह करते हैं कि निवेशकों को बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली संपत्तियों से इतना प्रेम भी नहीं करना चाहिए कि उन्हें बेचने के लिए तैयार ही नहीं हों।

लक्ष्य करीब हो तो इक्विटी छोड़ें

निवेशक की उम्र एक खास पड़ाव तक पहुंचने पर भी संपत्ति आवंटन में बदलाव किया जा सकता है। मान लीजिए कि निवेशक 55 साल का हो जाता है तो वह सेवानिवृत्ति तक अधिक सुरक्षित पोर्टफोलियो का सहारा लेना चाहता होगा। ऐसे निवेशक को इक्विटी संपत्ति बेचकर डेट में अधिक धन लगाना चाहिए। निवेशक किसी लक्ष्य के करीब पहुंचने पर भी अपने आवंटन में परिवर्तन कर सकता है। मान लीजिए कि उसकी संतान तीन साल बाद कॉलेज में जाएगी। उसे अपना निवेश इक्विटी से निकालकर डेट में लगाने का काम अभी से शुरू कर देना चाहिए ताकि शेयर बाजार में किसी तरह की गिरावट उसके लक्ष्य के आड़े नहीं आए। किसी भी संपत्ति से निकलने का समय और तरीका खासा अहम होता है।

प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के मुख्य वित्तीय योजनाकार विशाल धवन कहते हैं, 'जिस तरह निवेशक फंड में निवेश की शुरुआत करते समय सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) का रास्ता चुनता है, उसी तरह उसे फंड से निकलने के लिए भी सिस्टेमैटिक विदड्रॉल प्लान या सिस्टेमैटिक ट्रांसफर प्लान की मदद लेनी चाहिए।'

उनका मशविरा यह भी है कि निवेशकों को पूरी रकम एक ही बार में नहीं निकाल लेनी चाहिए क्योंकि अगले छह महीने में बाजार चढ़ा तो उन्हें माथा पीटना पड़ेगा। जिस तरह फंड में धीरे-धीरे प्रवेश किया जाता है, उसी तरह उससे धीरे-धीरे निकलना भी चाहिए। निकाली गई रकम अल्ट्रा शॉर्ट-टर्म फंड (या निवेशक जोखिम लेने की कुव्वत रखे तो म अवधि वाले फंड) में लगाई जा सकती है। 

कमजोर प्रदर्शन वालों को हटाएं

पोर्टफोलियो की सालाना समीक्षा के दौरान निवेशकों को कमजोर प्रदर्शन वाली संपत्तियों की पहचान कर उन्हें पोर्टफोलियो से बाहर कर देना चाहिए। पाटिल कहते हैं, 'किसी भी फंड के प्रतिफल की तुलना उसके बेंचमार्क और उस श्रेणी के औसत से करें। चूंकि शेयर दीर्घकालिक संपत्तियों की श्रेणी में आते हैं, इसलिए फैसला लेने से पहले यह जरूर देखें कि तीन साल या पांच साल की अवधि में फंड का प्रदर्शन कैसा रहा है।'

चूंकि बेहतरीन से बेहतरीन फंड भी कमजोर प्रदर्शन कर सकता है, इसलिए निवेशक किसी भी फंड से निकलने का फैसला लेने से पहले 6 महीने से दो साल तक उसके प्रदर्शन पर बारीक नजर जरूर रखें। यदि फंड के प्रदर्शन में कमजोरी ऊंचे खर्च अनुपात (एक्सपेंस रेश्यो) के कारण है तो निवेशक को जल्द से जल्द पल्ला झाड़ लेना चाहिए। अगर फंड प्रबंधक का अब तक का प्रदर्शन बहुत बढिय़ा रहा है तो निवेशक को उसे कुछ और वक्त देना चाहिए। यदि सक्रिय फंड मैनेजरों को बेंचमार्क से बेहतर प्रदर्शन करने में ज्यादा तकलीफ हो रही है तो निवेशक को उनके फंडों के खर्च अनुपात की बारीक जांच करनी चाहिए।

अवधि और क्रेडिट के जोखिम से बचें

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 2019 में कई बार नीतिगत दरों में कटौती की। लेकिन दिसंबर में आखिरी मौद्रिक नीति समीक्षा में उसने अपनी मुट्ठी बांध ली क्योंकि खुदरा महंगाई का सूचकांक ऊपर चढ़ रहा था। खुदरा निवेशकों को स्थिर आय वाला अपना अधिकतर निवेश कम अवधि के डेट फंडों में रखना चाहिए ताकि अवधि से जुड़ा जोखिम कम से कम हो। धवन की सलाह है, 'निवेशकों को अपने डेट फंड पोर्टफोलियो की क्रेडिट गुणवत्ता खुद जांचनी चाहिए या किसी विशेषज्ञ के हाथ जंचवानी चाहिए।' निवेशक डायनमिक बॉन्ड फंडों में निवेश कम रखें तो बेहतर है। 

विदेश में निवेश समझदारी

जिन निवेशकों ने देसी शेयर बाजार में अच्छी खासी रकम लगा दी है, वे दूसरे देशों में निवेश पर भी विचार कर सकते हैं। पाटिल समझाते हैं, 'अनुभवी निवेशकों के लिए वैश्विक स्तर पर निवेश करना महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है क्योंकि इससे वे एक ही बाजार में निवेश के जोखिमों से बच जाते हैं। अंतरराराष्ट्रीय बाजारों या फंडों में रकम लगाने से निवेशक मुद्रा के अवमूल्यन से होने वाले जोखिमों से भी बच जाते हैं।' भारत की मुद्रा यानी रुपया अक्सर डॉलर जैसी मुद्रा के मुकाबले गोता खाता रहता है यानी उसकी कीमत कम होती रहती है। अब कई परिवार ऐसे वित्तीय लक्ष्य तय करने लगे हैं, जिनमें डॉलर जैसी अंतरराराष्ट्रीय मुद्रा खर्च करने की नौबत आती है, जैसे संतान को विदेशी विश्वविद्यालय में पढ़ाना या विदेश यात्रा करना आदि। ऐसी सूरत में अंतरराराष्ट्रीय फंडों में निवेश करना जरूरी हो जाता है। भारतीय निवेशक यदि वैश्विक स्तर पर निवेश करने की सोचें तो अमेरिका पर केंद्रित फंडों पर उन्हें सबसे पहले नजर डालनी चाहिए। 

स्वास्थ्य बीमा भी देखें

इस मोर्चे पर सबसे पहले यह देखें कि आपके पास पर्याप्त स्वास्थ्य बीमा है या नहीं। स्वास्थ्य सेवा से जुड़े खर्च तेजी से बढ़ते जा रहे हैं और सुविधाएं महंगी होती जा रही हैं। इसीलिए बीमा पर नजर डालना जरूरी है। आदित्य बिड़ला हेल्थ इंश्योरेंस के मुख्य कार्य अधिकारी मयंक बथवाल का कहना है, 'सुनिश्चित कीजिए कि आपका पर्याप्त स्वास्थ्य बीमा हो ताकि परिवार के किसी सदस्य के बीमार पडऩे पर आपको कर्ज वगैरह नहीं लेना पड़े।' 

बथ्वाल की सलाह यह है कि बुनियादी बीमा (सामान्य बीमा पॉलिसी, जिसमें अस्पताल में भर्ती होने पर हुए सभी खर्च की रकम वापस मिल जाती है) के साथ ही गंभीर बीमारियों का बीमा भी हो ताकि गंभीर रोग होने पर उसका इलाज आराम से हो सके और परिवार को किसी तरह की वित्तीय दिक्कत का सामना भी नहीं करना पड़े। चार लोगों के परिवार के लिए फ्लोटर कवर में कम से कम 10-15 लाख रुपये का बीमा होना चाहिए। यदि माता-पिता को भी उसी बीमा पॉलिसी में शामिल किया जाता है तो यह रकम बढ़ाकर 20-25 लाख रुपये की जा सकती है।

ध्यान रखिए कि आपकी स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी में कम से कम बीमारियों को बाहर रखा गया हो। आजकल कई बीमा पॉलिसियों में ओपीडी (बहिरंग रोगी विभाग) और वेलनेस के लाभ (इनमें स्वस्थ रहने यानी दावा नहीं करने पर ग्राहक को प्रीमियम में छूट दी जाती है) दिए जाने लगे हैं। कई बीमा कंपनियां स्वास्थ्य कोच भी मुहैया कराती हैं, जो ग्राहकों को मधुमेह, दमा, कलेस्ट्रॉल जैसी दिक्कतों से निपटने में मदद करते हैं। यदि आपके मौजूदा स्वास्थ्य बीमा में ये फायदे नहीं मिल रहे हैं तो आपको दूसरी बीमा कंपनी से पॉलिसी लेने की कोशिश करनी चाहिए। 

जीवन बीमा भी टटोलें

आपकी जीवन बीमा की जरूरत पिछले एक साल में बढ़ गई होगी या कम हो गई होगी। जब कोई व्यक्ति नया कर्ज लेता है या ज्यादा बोझ भरे लक्ष्य तय कर लेता है (जैसे बच्चों को देश के बजाय विदेश में पढ़ाना) तो उसके लिए जीवन बीमा की जरूरत बढ़ जाती है। जब व्यक्ति कर्ज चुका देता है या उसे विरासत में संपत्ति मिल जाती है तो उसकी जीवन बीमा की जरूरत कम हो जाती है।

यदि आपकी जरूरत बढ़ गई है तो आपको नई पॉलिसी लेनी पड़ सकती है। अगर जरूरत कम हो गई है तो आपको कोई पॉलिसी बंद भी करनी पड़ सकती है। आप टर्म बीमा पर भी ध्यान दे सकते हैं क्योंकि इसका खर्च लगातार कम हो रहा है। इसे खरीदें तो सभी बीमा कंपनियों के प्रीमियम की तुलना जरूर कर लें।

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