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सीतारमण का पहले के वित्त मंत्रियों की तुलना में कैसा प्रदर्शन

अरूप रायचौधरी /  January 05, 2020

इस समय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बनना आसान नहीं है। वह जब अपना दूसरा बजट पेश करने जा रही हैं, तब अर्थव्यवस्था 26 तिमाहियों की सबसे भयंकर मंदी का सामना कर रही है, महंगाई बढ़ रही है और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भी 2019-20 की दूसरी छमाही के लिए महंगाई का अपना अनुमान बदलकर 5.1-4.7 फीसदी कर दिया है। आरबीआई ने 2019-20 के लिए भी जीडीपी वृद्धि का अनुमान घटाकर 5 फीसदी कर दिया, जो पहले 6.1 फीसदी था।

इस बीच अक्टूबर और नवंबर के सभी उपलब्ध आंकड़े इस बात का संकेत देते हैं कि अक्टूबर-दिसंबर तिमाही पिछली दो तिमाहियों से बहुत अधिक बेहतर नहीं होगी। सरकार को उम्मीद है कि वर्ष की दूसरी छमाही में सुधार आएगा। लेकिन यह सुधार उतना टिकाऊ नहीं रहने की उम्मीद है, जितना केंद्र उम्मीद कर रहा है। मंदी सभी क्षेत्रों में नजर आ रही है, जो एनबीएफसी क्षेत्र में नकदी के संकट के कारण और गहराई है। सीतारमण ने मंदी को दूर करने के लिए अगस्त से बहुत से क्षेत्रों के लिए प्रोत्साहनों और कॉरपोरेट कर की दरों में कटौती के कदम भी उठाए हैं। लेकिन ये उपाय आपूर्ति पक्ष से संबंधित हैं और इसलिए ये मांग पक्ष से संबंधित खर्च या निवेश की अनिच्छुकता का समाधान नहीं करते हैं। 

कुछ तरीकों से सीतारमण का दूसरा बजट पहले की तुलना में ज्यादा अहम होगा। मंदी के समाधान के लिए बहुत से नियम वापस लिए गए हैं और कई घोषणाएं की गई हैं। भले ही सीतारमण खुद को जिस स्थिति में पा रही हैं, वह अच्छी नहीं है। लेकिन यह देखना होगा कि वह अपने से पहले के तीन वित्त मंत्रियों- प्रणव मुखर्जी, पी चिदंबरम और दिवंगत अरुण जेटली के मुकाबले कैसा प्रदर्शन करती हैं? पीयूष गोयल की यहां तुलना नहीं कर रहे हैं क्योंकि जेटली जब विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से उबर रहे थे, तब उन्होंने बहुत कम समय इस मंत्रालय का प्रभार संभाला था।  

प्रणव मुखर्जी 

मुखर्जी जनवरी 2009 में दूसरी बार वित्त मंत्री बने थे और जून 2012 में भारत का राष्ट्रपति बनने तक उनके पास वित्त मंत्रालय का प्रभार रहा। जब उन्होंने कार्यभार संभाला था, तब दुनिया लीमन ब्रदर्स के दिवालिया होने और वैश्विक वित्तीय संकट के बाद के झटकों के गुजर रही थी। वित्त मंत्रालय समेत बहुत से क्षेत्रों से जानकारों का कहना था कि भारत वैश्विक झंझावतों से तुलनात्मक रूप से सुरक्षित रहेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद के बजटों में सरकार ने आर्थिक वृद्धि को तेज करने के लिए खर्च बढ़ाया। 

पुरानी सीरीज के मुताबिक 2010-11 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 8.9 फीसदी थी, जो मुखर्जी के कार्यकाल की सबसे अधिक वृद्धि थी। हालांकि ज्यादा खर्च से महंगाई से संबंधित दिक्कतें पैदा हुईं और 2011-12 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 5.9 फीसदी था। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महंगाई की दर उस साल 9 फीसदी पर पहुंच गई। मुखर्जी के कार्यकाल में कई वजहों से भारत सबसे बड़ी तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था रहा, लेकिन यह वृद्धि टिकाऊ नहीं थी। महंगाई में बढ़ोतरी के अलावा चालू खाते के घाटे, आय असमानता में बढ़ोतरी, वैश्विक मंदी और जिंसों की ऊंची कीमतों ने भी अहम भूमिका अदा की। मुखर्जी को वित्तीय स्थायित्व और विकास परिषद की स्थापना और कुख्यात जनरल एंटी अवॉइडेंस रूल्स के लिए याद किया जाएगा।  

पी चिदंबरम 

चिदंबरम ने जुलाई 2012 से मई 2014 के दौरान चौथी बार वित्त मंत्रालय का प्रभार संभाला। उन्हें बदहाल अर्थव्यवस्था विरासत में मिली। उनका पहला काम धीरे-धीरे राजकोषीय घाटे को कम करना था, जो 2013-14 में घटकर जीडीपी के 4.5 फीसदी पर आ गया। उनका कार्यकाल हालातों को नियंत्रित करते और डूबती अर्थव्यवस्था को बचाते हुए बीता। मनमोहन सिंह सरकार और उसके अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन और सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर लोगों में नाराजगी बढ़ रही थी। महंगाई 2013-14 में सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गई। लगातार तेल की ऊंची कीमतों के कारण उनकी राह आसान नहीं हुई। 

अरुण जेटली  

जब जेटली ने मई 2014 में  कार्यकाल संभाला तो उन्होंने राजकोषीय ईमानदारी का वादा किया था। हालांकि वह अपने लक्ष्यों को दो बार हासिल नहीं कर पाए। राजकोषीय घाटे को घटाकर 2018-19 में 3.4 फीसदी पर लाया गया, जो 2014-15 में 4 फीसदी था। वह भाग्यशाली रहे क्योंकि वैश्विक वृद्धि बढ़ रही थी और उनके ज्यादातर कार्यकाल में तेल की कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल से नीचे रहीं। जेटली को इतिहास में ऐसे वित्त मंत्री के रूप में याद किया जाएगा, जिनके कार्यकाल में नोटबंदी और वस्तु एïवं सेवा कर (जीएसटी) को लागू किया गया। ये दोनों फैसले महज छह महीने के अंतराल पर लिए गए। हालांकि जीएसटी पर काम अब भी चल रहा है।

हालांकि नोटबंदी के फायदों को लेकर जनता बहुत अधिक सहमत नहीं हुई है। अर्थव्यवस्था में लगातार मंदी आई है क्योंकि इन दो नीतियों का असंगठित क्षेत्र और सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्योग पर असर पड़ा है। जेटली के कार्यकाल में ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) को लागू किया गया और महंगाई को नियंत्रित रखा गया। हालांकि उनके कार्यकाल में भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा समाप्त की। इसके बाद ही यह आंकड़ा सामने आ पाया कि बैंकिंग प्रणाली में असल में कितने ऋण फंसे हुए हैं।

Keyword: Finance minister, Arun Jaitely, Nirmala Sitaraman, Pranab Mukherjee, P Chidambaram, NBFC, Bank, Economy,
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