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टाटा संस है 'अर्द्ध साझेदारी' कंपनी?

सुदीप्त दे /  January 05, 2020

ऐसा लगता है कि तीन साल पहले साइरस मिस्त्री को बोर्डरूम से निकाले जाने के नाटक का निष्कर्ष इस सवाल के जवाब पर निर्भर करता है कि क्या टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस टाटा और मिस्त्री परिवारों की 'अर्द्ध-साझेदारी' कंपनी है। राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) ने हाल के अपने आदेश में टाटा संस का स्वरूप 'अर्द्ध-साझेदारी' होने का जिक्र किया था। एनसीएलएटी ने अपने आदेश में अपदस्थ चेयरमैन और निदेशक साइरस मिस्त्री को टाटा संस के बोर्ड और समूह की अन्य कंपनियों के बोर्डों में बहाल करने का आदेश दिया था।

हालांकि टाटा संस के मानद चेयरमैन रतन टाटा समेत टाटा समूह ने पिछले सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय में अपनी याचिका में एनसीएलएटी के आदेश को कड़ी चुनौती दी है। रतन टाटा ने अपनी याचिका में दावा किया कि दोनों समूहों के बीच जुड़ाव कोई साझेदारी नहीं थी। उन्होंने कहा कि शापूरजी पलोनजी समूह टाटा संस में एक वित्तीय निवेशक था। 

विधि विशेषज्ञों का कहना है कि इस सवाल का जवाब पेचीदा हो सकता है कि क्या टाटा संस 'अर्द्ध-साझेदारी' कंपनी है। इसकी वजह यह है कि कंपनी अधिनियम 2013 में अर्द्ध-साझेदारी की कोई परिभाषा नहीं दी गई है और यह विचार मुख्य रूप से अदालती फैसलों के जरिये आया है। नांगिया एंडरसन के निदेशक संदीप झुनझुनवाला ने कहा, 'इस मामले में यह स्पष्ट करना बहुत अहम होगा कि यह साझेदारी किस तरह की है। तभी मिस्त्री यह दावा कर सकते हैं कि उनके छोटे हिस्सेदार के अधिकारों का हनन किया गया।'

उन्होंने कहा कि एक अर्द्ध-साझेदारी कंपनी में कारोबार को चलाने से जुड़ा अल्पांश हिस्सेदार बिना किसी ठोस वजह से कारोबार के मौजूदा प्रबंधन से बाहर निकाले जाने से सुरक्षा का दावा कर सकता है। विशेषज्ञों ने कहा कि अर्द्ध-साझेदारी शब्द उस स्थिति का सूचक है, जिसमें किसी कंपनी से दो समूह जुड़े हैं और जिनके बीच कंपनी की शुरुआत से आपसी सहमति या किसी लिखित समझौते के जरिये भूमिकाएं एवं जिम्मेदारियां पहले से निर्धारित हैं। विधि कंपनी एसऐंडए में प्रबंध साझेदार डेजी चावला ने कहा, 'यह अवधारणा आम तौर पर उन कंपनियों में इस्तेमाल होती है, जिनमें समूहों की बराबर हिस्सेदारी है और किसी समूह की असहमति के कारण गतिरोध की स्थिति पैदा होती है।' 

विशेषज्ञों ने कहा कि मौजूदा मामले में अल्पांश शेयरधारकों ने टाटा संस में आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन के कथित उल्लंघन का आरोप नहीं लगाया है। न ही अल्पांश शेयरधारकों ने शेयरधारक समझौते के उल्लंघन की बात कही है। विधि कंपनी एसऐंडआर एसोसिएट्स में पार्टनर रजत सेठी ने कहा, 'इसके बजाय अल्पांश शेयरधारकों ने तर्क दिया है कि कंपनी (टाटा संस) दोनों समूहों टाटा समूह और मिस्त्री समूह के बीच अर्द्ध-साझेदारी है।'

विशेषज्ञों ने कहा कि अर्द्ध-साझेदारी कंपनी में अल्पांश हिस्सेदारों के अधिकार अलग होते हैं। सेठी ने कहा, 'अर्द्ध-साझेदारी कंपनी के शेयरधारकों से बेहतर व्यवहार की उम्मीद की जाती है।' हालांकि अल्पांश शेयरधारकों को राहत के लिए ऐसी कंपनी के वास्तविक स्वरूप को स्थापित करना महत्त्वपूर्ण है, लेकिन ऐसे सिद्धांतों का आसानी से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। सेठी ने कहा, 'अदालत हर मामले में ऐसी याचिका आसानी से स्वीकार नहीं कर सकता है।'

नैशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में कानून के एसोसिएट प्रोफेसर उमाकांत वारोट्टिल के मुताबिक एनसीएलएटी के फैसले में यह माना गया है कि टाटा संस एक अर्द्ध-साझेदारी कंपनी है, जिसमें मसले का व्यापक विश्लेषण नहीं किया गया है। वारोट्टिल ने कहा, 'इसमें यह नहीं बताया गया है कि वह किस आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचा है।'

विशेषज्ञों का कहना है कि टाटा-मिस्त्री का मामला इस जरूरत को उजागर करता है कि अल्पांश शेयरधारकों के व्यवहार में सामंजस्य केवल धारणा नहीं बल्कि तथ्यों पर आधारित होना चाहिए। झुनझुनवाला ने कहा, 'यह धारणा का झगड़ा नहीं हो सकता है। यह कानूनी अधिकारों का मामला है।'

उन्होंने कहा कि प्रवर्तक नियंत्रित कंपनियों को यह जरूरत पहचाननी चाहिए कि उनके कारोबार का प्रबंधन बहुमत नहीं बल्कि कानूनी रूप से स्थापित प्रक्रियाओं या गतिविधियों के जरिये होना चाहिए। वेरोट्टिल मानते हैं कि इस पर ज्यादा स्पष्टता की दरकार है कि कैसे विधायी या न्यायिक आदेशों के जरिये अल्पांश शेयरधारकों के अधिकारों की सुरक्षा की जानी चाहिए। चावला का मानना है कि अगर कोई लिखित समझौता या समझ नहीं है तो अल्पांश शेयरधारकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कुछ निश्चित मापदंडों की जरूरत है। अब सर्वोच्च न्यायालय के पास अर्द्ध-साझेदारी की स्थिति में अल्पांश शेयरधारकों के हितों की सुरक्षा के जटिल मुद्दे को सुलझाने का मौका है।  

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