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अंतहीन नहीं होनी चाहिए ब्लैकलिस्टिंग

एम जे एंटनी /  January 05, 2020

अमूमन, किसी कंपनी को निश्चित समय यानी कुछ साल के लिए ब्लैकलिस्ट किया जाता है। लेकिन अगर किसी कंपनी अनिश्चितकाल के लिए प्रतिबंधित करना उसे ब्लैकलिस्ट करने से भी बदतर है और अवैध है। उच्चतम न्यायालय ने डैफोडिल्स फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड बनाम उत्तर प्रदेश राज्य वाद में यह व्यवस्था दी। इस मामले में डैफोडिल्स फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड सहित 56 दवा कंपनियों ने 2015 में राज्य के अस्पतालों में दवाओं की आपूर्ति के लिए बोली लगाई थी। लेकिन डैफोडिल्स फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड को अयोग्य घोषित कर दिया गया क्योंकि उसके एक निदेशक पर सीबीआई की नजर थी। उस पर व्यक्तिगत फायदे के लिए फर्जी खाते बनाने का आरोप था।

लेकिन कंपनी की दलील थी कि उस निदेशक ने 2012 में ही इस्तीफा दे दिया था और वह अब कंपनी ने नहीं जुड़ा था। उसने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में यह दलील भी दी कि उसे अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया। उच्च न्यायालय ने उसकी याचिका को खारिज करते हुए प्रतिबंध को सही ठहराया। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय का फैसला सही नहीं है क्योंकि अनिश्चितकालीन प्रतिबंध गैर कानूनी है और आदेश पारित करने से पहले कंपनी का पक्ष नहीं सुना गया।  

संशोधित मध्यस्थता कानून पर रेलवे का पेच

मध्यस्थता एवं सुलह कानून में संदेह को दूर करने के लिए 2015 में संशोधन किया गया था लेकिन इसके बावजूद मध्यस्थता की तटस्थता पर विवाद पैदा हुआ है। विवादित पक्षों के कुछ अधिकारियों के मध्यस्थ बनने पर प्रतिबंध लगाया गया दिया गया है। यहां तक कि वे विवाद में मध्यस्थ भी नामांकित नहीं कर सकते हैं। अलबत्ता, रेलवे मंत्रालय ने कुछ मामलों में वैधानिक शर्तों में छूट देने के लिए अनुबंध की सामान्य शर्तों (जीसीसी) में बदलाव किए हैं। केंद्रीय संगठन बनाम ईसीआई-एसपीआईसी-एसएमओ-एमसीएमएल (जेवी) वाद में रेलवे के एक ठेकेदार ने इसका विरोध किया था।

रेलवे ने अपने कुछ अधिकारियों को मध्यस्थ नामांकित किया था लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसे खारिज करते हुए एक स्वतंत्र मध्यस्थ को नियुक्त किया। इसके खिलाफ रेलवे ने उच्चतम न्यायालय में अपील की। उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले को खारिज कर दिया और ठेकेदार को रेलवे द्वारा मुहैया कराए गए नामों में से मध्यस्थ चुनने को कहा। न्यायालय ने कहा कि समझौते में स्पष्टï रूप से संशोधित जीसीसी का उल्लेख किया गया था जिसमें रेलवे अधिकारियों को मध्यस्थ बनाने का प्रावधान है। इसलिए समझौते का पालन होना चाहिए।  

तर्कसंगत होने चाहिए अवॉर्ड

उच्चतम न्यायालय का कहना है कि मध्यस्थता पंचाटों के फैसले अस्पष्टï नहीं बल्कि पूरी तरह स्पष्टï होने चाहिए। अस्पष्टï फैसलों से संबंधित पक्षों के समय और संसाधनों की बरबादी होती है। न्यायालय ने डायना टेक्नोलॉजिज बनाम क्रॉम्प्टन ग्रीव्स वाद में अपने फैसले में यह बात कही। दोनों पक्षों बीच करीब 25 साल से चले आ रहे विवाद में क्रॉम्प्टन ग्रीव्स को विवाद खत्म करने के लिए दूसरे पक्ष को 30 लाख रुपये देने को कहा था। क्रॉम्प्टन ग्रीव्स ने डायना के साथ एक्वाकल्चर यूनिट बनाने का अनुबंध खत्म कर दिया था जिससे विवाद पैदा हुआ।

पंचाट के फैसले को मद्रास उच्च न्यायालय ने आंशिक रूप से सही ठहराया लेकिन कहा कि इसमें कारणों का उल्लेख नहीं किया गया है। अपील पर उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मध्यस्थ विस्तृत फैसला देने के लिए बाध्य नहीं है लेकिन फैसला उचित, स्पष्ट और पर्याप्त होना चाहिए। अगर फैसलों में स्पष्टïता नहीं होगी तो उन्हें लागू नहीं किया जा सकता है।  

बतानी होगी दावा खारिज होने की वजह

अगर कोई साधारण बीमा कंपनी किसी दावे को खारिज करती है तो उसे बीमित व्यक्ति को इसकी वजह बतानी चाहिए। अगर कोई शिकायत दर्ज की जाती है तो बीमा कंपनी राराष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के सामने कोई नई वजह नहीं बता सकती है। उच्चतम न्यायालय ने सौराराष्ट्र केमिकल्स लिमिटेड बनाम नैशनल इंश्योरेंस कंपनी वाद में यह व्यवस्था दी। कंपनी को कुछ समय के लिए बीमार घोषित किया गया था और उसका माल गोदाम में पड़ा था। जब गोदाम को फिर से खोला गया तो पता चला कि आग के कारण कुछ माल नष्टï गया। अग्नि नीति के तहत कंपनी ने इसका मुआवजा मांगा।

बीमा कंपनी ने यह कहते हुए दावे को खारिज कर दिया कि आग किण्वन या प्राकृतिक ताप की वजह से लगी जो नीति के तहत नहीं आती है। हालांकि देर से दावा करने का जिक्र नहीं किया गया था। जब कंपनी ने बीमा कंपनी को अदालत में घसीटा तो उसने एक नई दलील दी कि दावा 15 दिन की तय अवधि के बाद किया गया था। आयोग ने इसे मान लिया और दावे को खारिज कर दिया। अपील स्वीकार करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि बीमा कंपनी दावा खारिज करने का अपना आधार नहीं बदल सकता है। अगर संबंधित पत्र में दावा करने में देरी को वजह नहीं बताया गया है तो वह राराष्ट्रीय आयोग के समक्ष सुनवाई में इसका हवाला नहीं दे सकती है।  

आधिकारिक परिसमापक बनाम आरपी की भूमिका

अवनी प्रोजेक्ट्स बनाम आधिकारिक परिसमापक मामले में राराष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट (एनसीएलटी) द्वारा नियुक्त समाधान पेशेवर (आरपी) और कलकत्ता उच्च न्यायालय के कंपनी न्यायाधीश द्वारा नियुक्त आधिकारिक परिसमापक की भूमिका को लेकर विवाद था। कुछ ऋणदाताओं ने कंपनी कानून की धारा 433-ई का हवाला देते हुए कंपनी न्यायाधीश में गुहार लगाई। न्यायाधीश ने एक परिसमापक नियुक्त कर दिया। इसके बाद ऋणदाताओं के एक समूह ने ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता का हवाला देते हुए एनसीएलटी का दरवाजा खटखटाया।

पंचाट ने एक समाधान पेशेवर नियुक्त कर दिया। न्यायाधीश और एनसीएलटी के आदेशों ने असमंजस की स्थिति पैदा कर दी जिसे उच्च न्यायालय ने विवेकपूर्ण तरीके से निपटाया। उसने व्यवस्था दी कि अदालत कंपनी के परिसमापन की याचिका पर सुनवाई कर सकती है लेकिन वह एनसीएलटी की समाधान योजना पर फैसला करने के बाद ही ऐसा कर सकती है। अगर समाधान योजना खारिज होती है तो कंपनी न्यायाधीश परिसमापन की याचिका पर सुनवाई कर सकती है। परिसमापक को समाधान पेशेवर को हर तरह की मदद करनी चाहिए। उच्च न्यायालय ने साथ ही कहा कि एनसीएलटी को परिसमापक के लिए आदेश पारित करते समय ज्यादा सतर्क होना चाहिए था। एनसीएलटी ने परिसमापक को कंपनी का लेखाजोखा सौंपने और व्यक्तिगत रूप से मौजूद रहने को कहा था। 

जीएसटी कानून में संशोधन करे सरकार

गुजरात उच्च न्यायालय ने आयातकों और वितरकों पर लागू होने वाले एकीकृत जीएसटी के मामले में 16 दिशानिर्देश जारी किए हैं और सरकार को जीएसटी कानून के दो प्रावधानों में संशोधन करने को कहा है। डीलरों की शिकायत यह थी कि अधिकारी मनमाने ढंग से जीएसटी कानून की धारा 129 और 130 का उपयोग कर रहे हैं। पहली धारा वस्तुओं की जब्ती से संबंधित है जबकि दूसरी धारा अधिकारियों को उन वस्तुओं को जब्त करने का अधिकार देती हैं जिन पर कर चोरी का शक होता है। सिनर्जी फर्टिकेम लिमिटेड बनाम राज्य वाद में स्पेन से सिरैमिक पेंट्स का आयात करने वाले आयातक की शिकायत थी कि आवाजाही के समय उसकी खेप को जब्त कर दिया गया था और उनका सामान जल्दी खराब होने वाला था।

न्यायालय ने डीलरों को अंतरिम राहत देते हुए कहा कि जीएसटी अधिकारियों को करदाताओं को बेवजह परेशान नहीं करना चाहिए। जीएसटी अधिकारियों को कानून के विभिन्न प्रावधानों और नियमों को समझने की कोशिश करनी चाहिए ताकि उन्हें लागू करने में किसी को कोई दिक्कत न हो। न्यायालय ने सरकार को इन दो प्रावधानों को संशोधित करके स्थिति स्पष्टï करने को कहा। न्यायालय ने साथ ही जीएसटी से जुड़े सभी विवादों के तुरंत समाधान के लिए सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विवाद समाधान समितियां बनाने का भी सुझाव दिया।

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