बिजनेस स्टैंडर्ड - केजरीवाल ने दिया दशक का सियासी स्टार्टअप
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केजरीवाल ने दिया दशक का सियासी स्टार्टअप

शेखर गुप्ता /  01 05, 2020

यह स्टार्टअप का दशक रहा है। सैकड़ों नए स्टार्ट अप आए हैं और दर्जन से ज्यादा स्टार्टअप कुछ ही समय में 'यूनिकॉर्न' (1 अरब डॉलर से अधिक मूल्यांकन) का रुतबा हासिल कर चुके हैं। लेकिन हम राजनीति की बात कर रहे हैं। इसलिए हमारे हिसाब से अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) बीते दशक की राजनीतिक स्टार्टअप कहलाई जाएगी। इसकी कई वजहें हैं।

हमारी राजनति में कदम रखते ही स्थापित राजनीतिक पार्टियों और ठोस वोट बैंक तथा वंशावलियों वाली जाति-समुदाय-विचारधारा आधारित ताकतों के कारण कठिन बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इसलिए जन संघ, स्वतंत्र पार्टी और जनता पार्टी से लेकर तेलुगू देशम, बीजू जनता दल, तृणमूल कांग्रेस और द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम को भी अपनी विचारधारा, नेतृत्व, वोट बैंक या जातीय/सामुदायिक भरोसा पहले से स्थापित ताकतों से ही लेने पड़े।

आप एकदम अलग है। छोटे मगर प्रमुख राज्य में भी खुद को स्थापित करना और देश भर में पहचान कायम करना बड़ी बात है। आधिकारिक रूप से आप की स्थापना 26 नवंबर, 2012 को हुई थी। लेकिन इसका बीज 2010 के अंत में ही बो दिया गया था। उस वक्त कुल्हाड़ी पर पैर मारने में जुटे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) या कांग्रेस की मुख्य प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पूरी तरह तैयार नहीं थी। पार्टी की कमान नरेंद्र मोदी के हाथ में आने से पहले कुछ वक्त के लिए संभावना की एक खिड़की खुली थी। 

केजरीवाल उस वक्त भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान से चमक रहे थे और माना जा रहा था कि वह भ्रष्टï हो ही नहीं सकते। ध्यान रहे कि उसी साल राजनीतिक से लेकर अफसरशाही, मीडिया और कंपनियों तक सभी भरोसा और सम्मान खो रही थीं। राडिया टेप खुलासे ने हालत बदतर कर दी। इससे 'सब चोर हैं' वाली धारणा पैदा हो गई। कोई भी स्थापित पार्टी या नेता इस आक्रोश से बच नहीं सका। हर किसी को चोर मानने के बाद भारत ऐसे शख्स का इंतजार कर रहा था, जो चोर नहीं था। उस मोड़ पर केजरीवाल और उनकी फौज आई, जिसे अभी तक सत्ता नहीं मिली थी और इसीलिए जो अब तक भ्रष्टï नहीं हुई थी।

उनकी जीवनशैली एकदम सामान्य थी, वे सरल भाषा में बात करते थे और भरोसेमंद लगते थे। उन्होंने स्थापित राजनीतिक और अभिजात वर्ग (मनमोहन सिंह से लेकर मुकेश अंबानी तक) को फटकारने, निंदा करने और भारत के भरोसे के नाकाबिल बताने के अलावा कुछ नहीं किया। अन्ना हजारे ने  उनकी ताकत और भी बढ़ा दी।

अन्ना को दो साल के भीतर इस्तेमाल कर फेंक दिया गया (उनका अनशन 2011 में हुआ था) और 2012 में आप का उदय हो गया। पिछले कई दशकों में यह पहली नई राजनीतिक पार्टी थी, जिसकी कोई राजनीतिक विरासत, वोट बैंक, वंश या विचारधारा नहीं थी। नई पार्टी न तो वामपंथी थी, न दक्षिणपंथी और न ही मध्यमार्गी। इसीलिए वह किसी भी पार्टी पर उसकी विचारधारा को लेकर हमला कर सकती थी या किसी के भी साथ आ सकती थी और बाद में उससे किनारा कर सकती थी। उसने दिल्ली में कांग्रेस से लेकर पंजाब में सिख चरमपंथियों तक के साथ ऐसा किया। विचारधारा और राजनीतिक निष्ठा के नाम पर सिफर, दोस्तों और दुश्मनों को इस्तेमाल कर फेंक देने की आदत, राराष्ट्रवाद के मुलम्मे में लिपटे कल्याण (भारत माता की जय और भगत सिंह की तस्वीरें उनकी पार्टी की पहचान बन गईं) को इस्तेमाल करने का हुनर ही राजनीतिक उद्यमशीलता में केजरीवाल की महारत है। वह सियासत के बाजार में घुस रहे थे, लेकिन उनके हाथ में ऐसा सामान था, जिसे वह हर सामान से अलग बता रहे थे। यही असली उद्यमशीलता होती है। 

किसी भी स्टार्टअप की तरह आप के सामने भी ऐसे मौके आए, जब लगा कि वह खत्म हो जाएगी और इनमें से कुछ आफत उसने खुद मोल ली थीं। 2019 के लोकसभा चुनावों में दुर्गति को ही ले लीजिए, जब दिल्ली के ज्यादातर विधानसभा क्षेत्रों में यह पार्टी कांग्रेस से भी पिछड़कर तीसरे नंबर पर रह गई थी। उस वक्त आप को खत्म बता दिया गया था, लेकिन यह पार्टी वापसी कर अब दिल्ली चुनावों में सबसे आगे लग रही है।

मगर स्टार्टअप की तरह आप के साथ भी मानव संसाधन (एचआर) की दिक्कतें लगी रही हैं। बल्कि उसकी हालत स्टार्टअप से भी बुरी है क्योंकि मंत्रियों समेत कई प्रमुख लोगों को भ्रष्टाचार के आरोपों से लेकर सहमति भरे मगर विवाहेतर यौन संबंधों की सीडी सामने आने पर पार्टी से निकालना पड़ा है। स्टार्टअप की ही तरह इसे भी कई सह-संस्थापक छोड़ गए हैं। मुझे लगता है कि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण केजरीवाल के लिए वैसे ही थे, जैसे मार्क जुकरबर्ग के लिए विंकलववॉस बंधु हैं। आप के भीतर स्टार्टअप की एक और फितरत आ गई है, जो कभी-कभी स्टार्टअप को तबाह भी कर देती है और वह है एक ही नेता का सर्वशक्तिमान बन जाना।

मेरे कहे या लिखे पर ध्यान देने वाले जानते हैं कि आप की राजनीति पर मुझे अक्सर संशय रहता है। अन्ना आंदोलन के समय से ही आप के नेताओं से मेरी बहस होती रही है। उनकी विचारधारा ढूंढते हुए मैंने केजरीवाल की चर्चित किताब स्वराज पढ़ी। पर्चे के आकार की यह किताब मैंने बेंगलूरु से दिल्ली आते वक्त उतनी देर में ही खत्म कर दी, जितनी देर में हमारा विमान भोपाल के आसमान में पहुंच पाया था। इसमें ढाई सहस्राब्दियों में हुए किस्सों से मिले विचारों और आदर्शों का घालमेल है। मुख्य विचार प्राचीन काल के लोकतांत्रिक कहे जाने वाले वैशाली साम्राज्य से आया है।

यह विचार इतना बचकाना था कि मैंने उस पर 'अरविंद चित्र कथा' शीर्षक से लेख ही लिख डाला। मैंने लिखा था कि अगर वे देश और 'तंत्र' को इसी तरह बदलना चाहते हैं तो ऐसा कभी नहीं होगा। इस बात के लिए उनकी तारीफ होनी चाहिए कि सत्ता में आने के बाद धीरे-धीरे वे शांत हो गए। अब आप उन्हें किसी को गाली देते, मोर्चे निकालते या गुस्सा करते कम ही देखेंगे। वे कानून और संविधान का पालन करते हैं, शांति से काम करते हैं और उन्होंने अपना विचारधाराहीन तथा निचले तबके के कल्याण का खाका तैयार कर लिया है। आलोचकों को यह बदलाव तथा सफलता स्वीकार करनी होगी।

केजरीवाल की तुलना उन्हीं की उम्र के दूसरे नेता राहुल गांधी से कर लीजिए। मैं केवल यह देखूंगा कि मोदी के उभार के बाद से हमारी राजनीति में आई तीन बड़ी चुनौतियों - राराष्ट्रवाद, धर्म और कल्याणकारी विचारधारा - पर दोनों की प्रतिक्रिया कैसी रही है। जब जेएनयू में संघर्ष चल रहा था तो राहुल वहां गए, लेकिन केजरीवाल बिल्कुल नहीं गए।

केजरीवाल ने चतुराई से खुद को 'टुकड़े-टुकड़े' वाले बवाल से दूर रखा। याद कीजिए कि कन्हैया कुमार और उमर खालिद के गिरफ्तार होने पर उन्होंने क्या कहा। केजरीवाल ने कहा कि अगर पुलिस उनके नियंत्रण में होती तो 'टुकड़े-टुकड़े' के नारे लगाने वाले जेल में होते और बेगुनाह बाहर होते। केजरीवाल ने सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट की फौरन सराहना की तथा अनुच्छेद 370 के पक्ष में बोले। उन्होंने राराष्ट्रवाद को मोदी के हाथ में नहीं जाने दिया और भगत सिंह तो हमेशा से सावरकर के मुकाबले ज्यादा ताकतवर शख्सियत हैं ही।

जब राहुल मंदिर-मंदिर भटक रहे थे तब केजरीवाल ने खामोशी के साथ अपनी ङ्क्षहदू पहचान बरकरार रखी और धर्मनिरपेक्ष शुद्घता की वामपंथी बुद्घिजीवियों की मांग के आगे घुटने नहीं टेके। उन्होंने बुजुर्गों के लिए मुफ्त तीर्थयात्रा भी शुरू कर दी। तीर्थ स्थलों में अजमेर शरीफ भी था, लेकिन ज्यादातर हिंदू और सिख तीर्थ स्थल थे। योजना के विज्ञापन में भी आदर्श बेटे श्रवण कुमार की तस्वीर थी, जिसने अपने बूढ़े माता-पिता को कंधे पर टांगकर 84 हिंदू तीर्थ घुमाए थे। लेकिन उसी वक्त हिंदू दक्षिणपंथियों के विरोध के बीच उन्होंने टीएम कृष्णा कंसर्ट भी आयोजित कराया। बाद में उन्होंने पटाखों के बजाय लेसर किरणों वाला दीवाली मेला भी किया।

हमें पता है कि दिल्ली का चुनाव जीतने पर भी ब्रांड केजरीवाल-आप को लंबा सफर तय करना होगा। लेकिन वह लचीली राजनीति वाली स्थापित पार्टी बन गई है। हम कभी उससे सहमत होंगे और अक्सर असहमत होंगे, लेकिन उसकी ताकत को मोदी भी अनदेखा नहीं कर सकते क्योंकि वह अपने कद से बड़े काम करती रहेगी। हमें पता है कि एक दशक में केवल एक राज्य में दबदबा कायम करना स्टार्टअप की भाषा में हल्की उपलब्धि कही जाएगी। लेकिन देश विशेषकर भारत की राजनीति में एक दशक बहुत छोटा वक्त है।

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