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संपादकीय /  January 05, 2020

उभरती आर्थिक परिस्थितियां बजट की तैयारियों में जुटीं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का काम काफी मुश्किल बनाती जा रही हैं। महीने भर से भी कम समय में उन्हें वित्त वर्ष 2020-21 का बजट पेश करना है। इसी दौरान वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि बीपीसीएल, भारतीय कंटेनर निगम और एयर इंडिया की रणनीतिक बिक्री को चालू वित्त वर्ष में पूरा कर पाने की संभावना कम है। सरकार को बीपीसीएल में अपनी हिस्सेदारी की बिक्री से 56,000 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद थी। ऐसे में रणनीतिक बिक्री पूरी नहीं होने पर इस वर्ष का विनिवेश लक्ष्य काफी दूर रह जाएगा जिससे सरकारी वित्त पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। 

लेकिन विनिवेश ही इकलौती समस्या नहीं है। सरकार का कर राजस्व भी इस साल कम रहने के आसार हैं। वित्त वर्ष के पहले आठ महीनों में ही राजकोषीय घाटा पूरे साल के लक्ष्य का 115 फीसदी पहुंच चुका था। और कर प्रवाह सुस्त रहने से वित्त वर्ष के बाकी बचे महीनों में भी हालात में बहुत सुधार हो पाना मुश्किल होगा। मसलन, अग्रिम कॉर्पोरेट कर संग्रह दिसंबर तिमाही में ही 5.2 फीसदी गिर गया है। भले ही वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह दिसंबर में एक लाख करोड़ रुपये से अधिक रहा लेकिन यह अंतिम चार महीनों के लिए निर्धारित 1.1 लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य से कम ही था। इस तरह राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.3 फीसदी पर सीमित रखने के लिए सरकार को या तो अपने खर्चों में बड़ी कटौती करनी होगी या फिर भुगतान को टालना होगा। विश्लेषक यह मान रहे हैं कि आर्थिक वृद्धि के अनुमान से कम रहने से सरकार राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पार कर जाएगी। लिहाजा इस तरह के हालात में सभी हितधारकों की नजर आगामी बजट में कम-से-कम तीन बड़ी बातों पर रहेगी। 

पहली, सरकार से अपेक्षा होगी कि वह अर्थव्यवस्था का ईमानदार आकलन पेश करने के साथ ही उसे दोबारा पटरी पर लाने की योजना भी रखे। इस समय अर्थव्यवस्था की अवास्तविक तस्वीर पेश करने से सरकार की विश्वसनीयता प्रभावित होगी और आर्थिक वृद्धि में तेजी लाने के लिए कड़े फैसले लिए जाने की संभावना भी कम होगी। दूसरी, बजट से यह साफ हो जाएगा कि सरकार किस हद तक राजकोषीय उपायों से अर्थव्यवस्था को संभालने की मंशा रखती है? उसे अपने विकल्प बहुत सोच-समझकर चुनने चाहिए। तीव्र सुस्ती को राजकोषीय घाटे के अनियंत्रित विस्तार का लाइसेंस नहीं माना जा सकता है। सरकार कम समय के लिए भी अपने वित्त को लेकर लापरवाह नहीं नजर आ सकती है। इसके अलावा बजट को वर्ष 2018-19 के बारे में वास्तविक राजस्व स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए क्योंकि गत जुलाई में पेश बजट के संशोधित अनुमान सही तस्वीर नहीं पेश कर पाए थे। अब वक्त आ गया है कि सरकार राजकोषीय समस्या को स्वीकार करे और अपने वित्त की पारदर्शी तस्वीर पेश करे। व्यय को लंबित रखना या अपनी देनदारियां सार्वजनिक इकाइयों पर डालना हमेशा नहीं चल सकता है। 

तीसरी बात, सरकार से राजकोषीय मजबूती का एक विश्वसनीय रोडमैप पेश करने की अपेक्षा होगी। काफी हद तक यह अर्थव्यवस्था के भरोसेमंद आकलन पर निर्भर करेगा। मसलन, राष्ट्रीय ढांचागत पाइपलाइन यह मानकर चलती है कि वर्ष 2020-21 और 2024-25 के बीच वार्षिक नॉमिलन वृद्धि 12.2 फीसदी रहेगी। अगर मुद्रास्फीति को चार फीसदी भी मानें तो इसका यही अर्थ है कि खुद सरकार अर्थव्यवस्था के सही मायनों में आठ फीसदी से थोड़ा अधिक दर से बढऩे की उम्मीद कर रही है। राजकोषीय स्थिति के बारे में ऐसी धारणाएं बाजार को कमजोर बनाएंगी और बजट अवास्तविक एवं कम विश्वसनीय हो जाएगा। सरकार ने सही परिप्रेक्ष्य तय करने का मौका गत जुलाई में गंवा दिया था और अब उसे एक और मौका नहीं गंवाना चाहिए। 

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