बिजनेस स्टैंडर्ड - प्राकृतिक आपदा के बाद गरीबों की हालत
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प्राकृतिक आपदा के बाद गरीबों की हालत

अजय शाह /  January 03, 2020

हाल में किए गए एक शोध में चेन्नई में वर्ष 2015 में आई विनाशकारी बाढ़ के बारे में  नए तथ्य सामने आए हैं। दिलचस्प बात है कि घरेलू आय में कोई बहुत ज्यादा बदलाव नहीं हुआ। लेकिन बाढ़ आने के बाद एक साल तक घरेलू खर्च में काफी तेजी आई। स्वास्थ्य और ईंधन/बिजली पर खर्च बहुत बढ़ा। इस अवधि के बाद लोगों ने इस स्थिति को बदल दिया और कम खर्च करना शुरू कर दिया। संभवत: वे अपने बहीखाते को दुरुस्त करने में लगे थे। गरीबों के लिए खर्च में तेजी कम थी जबकि संभवत: बाढ़ के कारण वे सर्वाधिक प्रभावित हुए थे। शायद उधारी तक पहुंच बढऩे से उन्हें मदद मिली होगी।

किसी भी राष्ट्र के जीवन में प्राकृतिक आपदाएं अहम घटनाएं होती हैं। हममें से अधिकांश लोग अपने जीवनकाल में एक या उससे अधिक बड़ी प्राकृतिक आपदाओं से रूबरू होते हैं। यह पता लगाने के लिए ज्यादा शोध की जरूरत है कि किसी प्राकृतिक आपदा के बाद स्थानीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है। पारंपरिक रूप से शोधकर्ता आपदा प्रभावित इलाके में डेरा डालते हैं और वहां की परिस्थितियों का आकलन करते हैं। लेकिन इसकी दो सीमाएं हैं। हमने आपदा से पहले ही परिस्थितियों का आकलन नहीं किया है और साथ ही हम अप्रभावित इलाकों की परिस्थितियों का आकलन नहीं कर रहे हैं। इसका इस्तेमाल तुलनात्मक अध्ययन के लिए किया जा सकता है। 

सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकनॉमी (सीएमआईई) के कंज्यूमर पिरामिड्स हाउसहोल्ड सर्वे (सीपीएचएस) से आकलन की नई संभावनाएं सामने आई हैं। इसमें हर चार महीने में 170,000 घरों का आकलन किया जाता है। मान लीजिए कि कोई आपदा दो सर्वेक्षणों के बीच आती है, तो हमें चार महीने की अवधि मिल जाएगी जिसमें एक ही परिवार की आपदा से पहले और बाद की स्थिति का आकलन किया जा सकता है। यह आकलन पूरे देश में किया जाता है, इसलिए नियंत्रणों की पहचान करना संभव है।  

हाल में एक शोध पत्र में इला पटनायक, रेणुका साने और मैंने 2015 में चेन्नई में आई बाढ़ का अध्ययन किया। परिवारों पर प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव का आकलन करने के लिए हमने परीक्षण के तौर पर इस नई दृष्टिïकोण को अपनाया। 

पहला सवाल आय के बारे में है। पहली नजर में हमें लग सकता है कि कई बाढ़ के कारण कई कंपनियों का कामकाज प्रभावित हुआ होगा, रेहड़ी पटरी वालों का काम धंधा बंद हो गया होगा और उनकी आय कम हो गई होगी। लेकिन हमें इसमें गहरे जाने की जरूरत है। बाढ़ का पानी घरों में घुसने के कारण लोग घरों में खाना नहीं पका पाए जिससे खाना बेचने वालों की बिक्री बढ़ गई। बाढ़ का पानी उतरने के बाद लोगों ने अपने घरों की मरम्मत और पुनर्निर्माण शुरू कर दिया। सरकार ने राहत एवं पुनर्निर्माण पर बहुत पैसा खर्च किया। हर व्यक्ति को इसके लिए 2,000 रुपये दिए गए। बढ़े खर्च ने स्थानीय अर्थव्यवस्था में मांग को बढ़ा दिया जिसने बाढ़ के प्रभाव को खत्म कर दिया। इसके परिणामस्वरूप परिवारों की कुल आय में कोई बदलाव नहीं हुआ। 

दूसरा सवाल खर्च को लेकर है। परंपरागत अवधारणा यह है कि प्राकृतिक आपदा के बाद लोगों की आर्थिक स्थिति बदतर हो जाती है और वे कम खर्च करते हैं। लेकिन चेन्नई बाढ़ के आंकड़ों में ऐसा नहीं हुआ है। बाढ़ के दौरान और इसके तुरंत बाद खर्च में 32 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। लोग खाद्य पदार्थों, स्वास्थ्य और ईंधन/बिजली पर ज्यादा खर्च कर रहे थे। करीब 10 महीने में खर्च फिर से सामान्य स्थिति में पहुंच गया और उसके बाद वास्तव में यह बाढ़ पूर्व की स्थिति से भी कम हो गया। इसकी वजह यह थी कि लोग फिर से अपने बहीखाते को दुरुस्त करने लगे थे।

बाढ़ के दौरान समृद्ध परिवारों को जानमाल का कम से कम नुकसान हुआ होगा। मकान की ऊपरी मंजिलें बाढ़ से प्रभावित नहीं हुईं और उनका बीमारी से ज्यादा वास्ता नहीं पड़ा। नकदी और उधारी तक उनकी पहुंच बरकरार रही होगी। इसलिए हम देख सकते हैं कि ऐसे परिवारों के खर्च में थोड़े समय के लिए तेजी आई और उसके बाद सामान्य स्थिति बहाल हो गई।

मकान और परिसंपत्तियों के बरबाद होने और स्वास्थ्य पर पड़े प्रभाव को देखते हुए कहा जा सकता है कि गरीबों पर बाढ़ की ज्यादा मार पड़ी। आदर्श स्थिति में बाढ़ से हुए नुकसान की भरपाई के लिए खपत में बहुत तेजी की जरूरत है। लेकिन आंकड़ों के मुताबिक गरीबों के लिए खपत में थोड़ा बहुत तेजी आई। यह गरीबों के लिए वित्तीय बाधाओं और मुसीबतों को दर्शाता है। 

वित्तीय आपदा से निपटने के लिए वित्त की अहम भूमिका होती है। लेकिन चेन्नई के आंकड़ों से पहले एक अलग तस्वीर दिखाई देती है। कुछ ही परिवारों ने बाढ़ के बाद उधार लिया, बचत की या परिसंपत्तियां खरीदी। इससे यह चिंता भी पैदा होती है कि क्या भारतीय वित्तीय व्यवस्था उस स्थिति में अपना काम करने में सक्षम है जब लोगों को वित्त की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। नीतिगत बाधाओं का पता लगाना और उनकी पहचान करना जरूरी है जो मुनाफा कमाने वाली वित्तीय कंपनियों को चेन्नई जैसे आपदा प्रभावित स्थानों में उधारी बढ़ाने से रोकती हैं। ये दुश्वारियां एक बीमार वित्त व्यवस्था की व्यापक तस्वीर के अनुकूल हैं।

चेन्नई में बाढ़ वहां के बाशिंदों के लिए बहुत भयावह अनुभव रही लेकिन अवधारणा के स्तर पर बाढ़ के बाद का प्रदर्शन उतना अच्छा रहा जितना भारत में रह सकता है। तमिलनाडु की राज्य क्षमता बहुत अधिक है और चेन्नई देश के सबसे अमीर स्थानों में से एक है। मीडिया ने पूरी शिद्दत के साथ बाढ़ का प्रचार-प्रसार किया जिससे सरकार तुरंत हरकत में आई और राहत एवं पुनर्निर्माण का काम आननफानन में हुआ।

देश के दूसरे स्थानों पर राज्य की सीमित क्षमता, प्रभावित लोगों का रुतबा, वित्तीय कंपनियों की कम मौजूदगी और मीडिया की बेरुखी के कारण शायद इतनी जल्दी कार्रवाई नहीं होती। चेन्नई के आंकड़ों से यह कहा जा सकता है कि यह भारत में प्राकृतिक आपदा के बाद राहत एवं पुनर्निर्माण का सबसे बेहतर प्रदर्शन है। 

इस काम की अहमियत इतने तक ही सीमित नहीं है कि चेन्नई में 2015 में आई बाढ़ के बाद क्या हुआ। यहां आकलन के लिए जो रणनीति विकसित की गई, वह सामान्य है और केवल चेन्नई बाढ़ के बारे में ही नहीं है। कई शोधकर्ता इन तरीकों का इस्तेमाल कर इसी तरह के अध्ययन करेंगे जिससे एक नई समझ पैदा हो सकती है कि देश में प्राकृतिक आपदा के बाद लोगों को किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हालांकि अलग-अलग प्राकृतिक आपदाओं के बीच सीधी तुलना की भी अपनी सीमाएं हैं क्योंकि दो आपदाएं एक तरह की नहीं होती हैं। उदाहरण के लिए केरल की बाढ़ की तुलना चेन्नई की बाढ़ से नहीं की जा सकती है। 
(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी, नई दिल्ली में प्रोफेसर हैं।)
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