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अमेरिका-ईरान तनाव से तेल में ताप

शाइन जैकब /  January 03, 2020

अमेरिकी हमले में ईरानी कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतों में 4.4 फीसदी की तेजी आई और यह शुक्रवार को 69.16 डॉलर प्रति बैरल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पडऩे की आशंकाएं बढ़ गई हैं। यह अमेरिकी हमला ऐसे वक्त पर हुआ है जब इस वित्त वर्ष में देश के बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अब तक औसतन 64 डॉलर प्रति बैरल रही हैं। ऐसे में देश में कच्चे तेल के आयात बिल में बढ़ोतरी की आशंका है और यह 7.84 लाख करोड़ रुपये के पहले के लक्ष्य के मुकाबले ज्यादा हो सकता जो 2018-19 की तुलना में मामूली रूप से 0.15 फीसदी अधिक है। 

शुक्रवार को देश में कच्चे तेल की कीमत 65.99 डॉलर प्रति बैरल थी। हालांकि पश्चिमी एशियाई क्षेत्र में हालात तनावपूर्ण होने की स्थिति में कीमतें बढ़ सकती हैं। सरकार के ताजा अनुमान के मुताबिक अगर कच्चे तेल की कीमतों में 1 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी भी होती है तब देश के आयात बिल में बढ़ोतरी 6,328 करोड़ रुपये तक होगी। इसके अलावा एक डॉलर के मूल्य में 1 रुपये की भी बढ़ोतरी होती है तब विनिमय दर बढऩे से कच्चा तेल आयात बिल में करीब 5,883 करोड़ रुपये की अतिरिक्त तेजी देखी जाएगी। इक्रा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और समूह प्रमुख (कॉरपोरेट रेटिंग्स) के रविचंद्रन ने कहा है, 'अगले दो हफ्ते बाजार में तनाव दिखेगा। अगर संकट की स्थिति बनी रही तब कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना बनी रहेगी और कीमतें 75 डॉलर प्रति बैरल तक बढऩे की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।' उनका कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से व्यापार घाटा और उन तेल मार्केटिंग कंपनियों (ओएमसी) पर असर पड़ सकता है जो घाटे में हैं। विशेषज्ञों ने इस बात की ओर भी इशारा किया है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें भी बढ़ सकती हैं और इससे महंगाई बढ़ सकती है। 

आर्थिक गतिविधियां कम होने की वजह से कई सालों के बाद पहली बार देश में कच्चे तेल की मांग में कमी दिख रही थी क्योंकि इस साल अप्रैल से नवंबर की अवधि के दौरान आयात में 0.7 फीसदी की गिरावट आई और यह 14.9 करोड़ टन हो गया जो 2018-19 की इसी समान अवधि के दौरान 15.1 करोड़ टन था। कच्चे तेल के आयात बिल में 11.6 फीसदी की बड़ी गिरावट देखी गई और यह इस साल अप्रैल से नवंबर की अवधि के दौरान 69.5 अरब डॉलर हो गया जो पिछले साल 78.6 अरब डॉलर था। 

डेलॉयट टच तोमैटसू में पार्टनर देवाशिष मिश्रा कहते हैं, 'हम अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85 फीसदी हिस्सा आयात कर रहे हैं ऐसे में फारस की खाड़ी में अस्थिरता, देश के लिए कीमतों में अस्थिरता और आपूर्ति सुरक्षा की दृष्टि के लिहाज से अच्छी नहीं है। हालांकि मंदी वाले साल के बाद 2020 में वैश्विक कच्चे तेल की मांग में बढ़ोतरी की संभावनाएं हैं।'

ऑयल ऐंड नैचुररल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ओएनजीसी विदेश का कोई भी अधिकारी इन तनावग्रस्त देशों में नहीं फंसे हैं। अमेरिका ने अपने राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के निर्देश पर शुक्रवार को सुबह बगदाद के हवाई अड्डे पर हमला किया। इस हमले में ईरान जनरल सुलेमानी के सलाहकार और कमांडर अबु महदी अल-मुहांदिस भी मारे गए। सुलेमानी ईरान के शीर्ष जनरल थे। इस बात को लेकर भी आशंकाएं जताई जा रही हैं कि ईरान इसकी प्रतिक्रिया में हमला कर सकता है ऐसे में अमेरिका ने अपने नागरिकों को ईरान छोडऩे को कहा है। 

उद्योग के दूसरे विशेषज्ञ के मुताबिक इसका दुनिया भर में कच्चे तेल की मांग पर असर पड़ सकता है जो इस साल की छमाही तक बढऩे की उम्मीद थी। इस साल नवंबर तक देश का कुल आयात बिल 318.8 अरब डॉलर तक था जिनमें से पेट्रोलियम आयात करीब 25.4 फीसदी तक था। ताजा आंकड़ों के मुताबिक पश्चिम एशिया से इस वित्तीय वर्ष में सितंबर तक भारत ने 6.4 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया। हालांकि इस क्षेत्र में कुल आयात 14.3 करोड़ टन से कम रहने की उम्मीद है और पिछले दो सालों में 14.2 करोड़ टन का आयात हुआ है। किसी भी पश्चिमी एशियाई क्षेत्र के संकट का असर विदेश से देश में भेजी जाने वाली रकम पर पड़ेगा क्योंकि देश में 79 अरब डॉलर का एक बड़ा हिस्सा इस क्षेत्र से ही आता है।

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