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पटरी पर रेलवे

संपादकीय /  January 02, 2020

भारतीय रेलवे ने मंगलवार को यात्री किराये के आधार मूल्य में वृद्धि की घोषणा की। यह वृद्धि अर्ध-शहरी इलाकों में चलने वाली लोकल ट्रेनों को छोड़कर बाकी सभी तरह की यात्राओं पर लागू होगी। किराये में वृद्धि बहुत ज्यादा नहीं है, प्रति किलोमीटर सफर पर एक पैसे से लेकर चार पैसे की बढ़ोतरी की गई है। सामान्य श्रेणी और गैर-एक्सप्रेस ट्रेनों की गैर-वातानुकूलित श्रेणियों का किराया प्रति किलोमीटर एक पैसे बढ़ा है जबकि वातानुकूलित श्रेणियों का किराया प्रति किलोमीटर चार पैसे बढ़ाया गया है। इस तरह राजधानी जैसी प्रीमियम ट्रेनों के टिकट मूल्य में हुई वृद्धि भी 100 रुपये से कम ही है। वहीं मासिक टिकट धारकों के किराये में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। इस किराया वृद्धि को लेकर थोड़ा शोर हो सकता है लेकिन सच यह है कि यह जरूरी कदम का एक हिस्सा भर है। 

भारतीय रेलवे अपने हालिया इतिहास के कुछ सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। रेलवे के लिए अहम वित्तीय आंकड़ा परिचालन अनुपात का है। इसका मतलब परिचालन व्यय के बरक्स परिचालन राजस्व का अनुपात होता है। चालू वित्त वर्ष में यह अनुपात पहले ही सौ फीसदी के स्तर से आगे निकल चुका है। दूसरे शब्दों में कहें तो रेलवे खतरे की जद में है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की गत महीने संसद में पेश रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2017-18 और 2018-19 दोनों साल एनटीपीसी और रेलवे के पूर्व उपक्रम इंडियन रेलवे कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन ने अग्रिम भुगतान कर उसे संकट से उबारा था। सीएजी ने इंगित किया था कि रेलवे के राजस्व अधिशेष में लगातार गिरावट देखी गई है और अपने पूंजी व्यय में आंतरिक संसाधनों की उसकी हिस्सेदारी भी घटी है। राजस्व जुटा पाने में इस नाकामी का बोझ रेलवे नेटवर्क और आम करदाता को उठाना पड़ा। विस्तारित मूल्यह्रास के जरिये रेल नेटवर्क और केंद्रीय बजट समर्थन पर रेलवे की बढ़ती निर्भरता के जरिये आम करदाता ने यह बोझ उठाया। 

जहां इस वित्त वर्ष में अब तक कोई बड़ा रेल हादसा नहीं हुआ है वहीं अपनी अवधि पूरा कर चुकी परिसंपत्तियों के नवीनीकरण का काम टालने से यात्रियों की सुरक्षा खतरे में पड़ रही है। ऐसे में रेलवे की वित्तीय सेहत बहाल करना निस्संदेह तात्कालिक प्राथमिकता होनी चाहिए। सच यह है कि यात्रियों को भुगतान करना होगा। पहले से ही मालढुलाई से मिलने वाला लगभग सारा राजस्व यात्री किराये की क्रॉस-सब्सिडी में चला जा रहा है। लंबी दूरी की वातानुकूलित चेयरकार सेवा अपना खर्च खुद निकाल लेती है लेकिन कई दूसरी यात्रा श्रेणियां घाटे में ही हैं। शहर के भीतर चलने वाली लोकल ट्रेनों को भी किराया वृद्धि से हमेशा के लिए छूट नहीं दी जा सकती है।

निचोड़ यह है कि रेलवे की परिचालन स्वतंत्रता को प्राथमिकता देने के लिए इसका पुनर्गठन जरूरी हो चुका है। कर्मचारियों के विरोध को अनसुना करते हुए सरकार ने रेलवे कैडरों का पुनर्गठन कर अपनी आंतरिक क्षमता बढ़ाने की दिशा में पहला कदम बढ़ा दिया है। लेकिन उसे और आगे बढऩे की जरूरत होगी। रेलवे के वाणिज्यिक हितों को सरकार के सामाजिक दायित्वों से अलग करने के लिए एक प्रणाली बनाना अहम है। अगर सरकार रेलवे पर सामाजिक दायित्व थोपना चाहती है तो उसके लिए रेलवे को पूरा मुआवजा देना होगा और उसे इतर गतिविधियों में रेलवे को किसी लाभपरक कंपनी की तरह काम करने की छूट देनी होगी। इससे रेलवे को अपना निवेश बढ़ाने में मदद मिलेगी और अधिक तेजी से मालढुलाई कर वह अर्थव्यवस्था की क्षमता वृद्धि में भी योगदान कर सकेगा। 

रेल मंत्रालय को समुचित स्वतंत्रता की जरूरत है जो असल में एक होल्डिंग कंपनी के सुपुर्द की जानी चाहिए। सच तो यह है कि व्यापक सुधारों के अभाव में रेल वित्त एवं निवेश पर असर पडऩा जारी रहेगा।
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