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असरदार फसल बीमा

संपादकीय /  January 01, 2020

मोदी सरकार अपनी प्रमुख योजना प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमबीएफबीवाई) की समीक्षा करने जा रही है। यह किसानों का फसल जोखिम कम कर उन्हें सही मायने में फायदा पहुंचाने की दिशा में एक स्वागतयोग्य कदम है। हालांकि योजना की समीक्षा के लिए मंत्री समूह जैसा उच्चस्तरीय पैनल बनाने की जरूरत पर बहस हो सकती है। रक्षा मंत्री की अध्यक्षता में गठित इस समूह में गृह मंत्री और कुछ अन्य मंत्री भी शामिल हैं।

वैसे कृषि विशेषज्ञों, किसानों, बीमा कंपनियों और राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों को इस समीक्षा पैनल में रखा जाता तो बेहतर होता। पीएमएफबीवाई के वर्ष 2016 में आगाज के कुछ समय बाद से ही इसकी पुनर्संरचना एवं समीक्षा की जरूरत महसूस की जा रही थी लेकिन सरकार को इस दिशा में कदम उठाने में समय लगा। फसल बीमा की तमाम पुरानी योजनाओं से बेहतर होने के बावजूद यह योजना अंतर्निहित संरचनात्मक, वित्तीय एवं लॉजिस्टिक खामियों के चलते किसी भी हितधारक को प्रभावित कर पाने में नाकाम रही। 

इस मोर्चे पर सर्वव्यापी अंसतुष्टि इस बात से जाहिर होती है कि तीन प्रमुख कृषि राज्यों- आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल एवं बिहार ने इस योजना से खुद को अलग कर लिया है। कम-से-कम तीन अन्य राज्य- कर्नाटक, गुजरात एवं ओडिशा भी ऐसा करने की सोच रहे हैं। इन राज्यों का मानना है कि योजना से होने वाले लाभों की तुलना में इसके संचालन की लागत कहीं अधिक है लिहाजा वे किसानों को नुकसान की भरपाई के लिए वैकल्पिक तरीके आजमा रहे हैं। इसके अतिरिक्त चार निजी बीमा कंपनियों ने भी इस योजना को घाटा उठाने वाला धंधा बताते हुए खुद को अलग कर लिया है। इससे भी बुरी बात यह है कि कई अन्य बीमा कंपनियों के भी इससे अलग होने के आसार हैं। हालांकि आम धारणा यही है कि सरकार की तरफ से दी जा रही सब्सिडी का बड़ा हिस्सा बीमा कंपनियों के पास जा रहा है। किसानों को भी यह योजना अधिक भा नहीं रही है। वैसे किसानों को रबी फसलों के लिए महज एक फीसदी, खरीफ फसलों के लिए 1.5 फीसदी और वाणिज्यिक फसलों के लिए पांच फीसदी प्रीमियम ही देना होता है। 

इस योजना के डिजाइन में एक बड़ी खामी यह है कि इसमें योजना के व्यय (यानी सब्सिडी) का बोझ राज्यों को केंद्र के साथ आधा-आधा उठाना है। राज्यों के हिस्से का फंड जारी करने में चूक होने से बीमा दावों के त्वरित निपटान की बीमा कंपनियों की क्षमता भी प्रभावित होती है। फसलों को अधिसूचित करने, बुआई का रकबा और बीमा योग्य अधिकतम राशि तय करने का अधिकार राज्यों को देने से भी इस योजना की नाकामी का रास्ता तैयार हुआ है। राज्य अक्सर अपने वित्तीय बोझ को कम रखने के लिए सीमा को काफी कम रखते हैं जिससे उत्पादकों के लिए योजना की उपयोगिता कम हो जाती है। कर्जदारों की फसल का बीमा करने की बैंकों को दी गई मंजूरी भी योजना की एक बड़ी समस्या है। 

बैंक अमूमन कर्ज के बरक्स बीमित राशि का समायोजन कर लेते हैं जिससे किसान असहाय हो जाते हैं। बीमित उत्पादक किसानों को अक्सर लेनदेन के विवरणों के बारे में पता भी नहीं चल पाता है। भले ही फसलों को हुए नुकसान के त्वरित आकलन के लिए इस योजना में तकनीक खासकर सैटेलाइट इमेजिंग के इस्तेमाल की परिकल्पना की गई है लेकिन अभी तक इसके वांछित परिणाम नहीं रहे हैं। नुकसान के आकलन के लिए राज्य सरकारें जिन तरीकों का इस्तेमाल करती हैं, वे समय-साध्य एवं अपारदर्शी होने से भरोसे का संकट पैदा होता है। ऐसे में अचरज नहीं है कि किसानों की सबसे बड़ी शिकायत यही है कि उन्हें या तो मुआवजा अपर्याप्त मिलता है या मिलता ही नहीं है। अगर मंत्री समूह इन सभी बिंदुओं एवं अन्य प्रासंगिक पहलुओं पर ठीक से ध्यान देता है तो पीएमएफबीवाई को किसानों के लिए वरदान बनाने की उम्मीद बंधेगी। 
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