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कर कटौती, अमेरिका-चीन व्यापार सौदे से बाजार रहे मजबूत

सुंदर सेतुरामन और जश कृपलानी / मुंबई December 31, 2019

प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी ने 2019 का समापन शानदार तेजी के साथ किया। भले ही घरेलू अर्थव्यवस्था में मंदी आई है, लेकिन इन दो सूचकांकों में 2019 में 15 प्रतिशत और 12.8 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। सेंसेक्स और निफ्टी 20 दिसंबर को दिन के कारोबार में 41,810 अंक और 12,294 अंक की अपनी सर्वाधिक ऊंचाई पर पहुंचे। बाजार कारोबारियों के अनुसार, सितंबर में कॉरपोरेट कर कटौती, अमेरिका-चीन व्यापारिक गतिरोध में नरमी के संकेतों से वर्ष की दूसरी छमाही में बाजारों को मजबूती मिली।

2019 ऊंचे उतार-चढ़ाव वाला वर्ष रहा, भले ही कारोबारियों को स्पष्टï रुझान के अभाव में बाजार में दबाव का सामना करना पड़ा। 2019 की पहली छमाही (जनवरी और जून के बीच) में सेंसेक्स में 12 प्रतिशत की तेजी आई, लेकिन सितंबर तक इस पर दबाव देखा गया। हालांकि कर कटौती से धारणा फिर से मजबूत हुई।

बाजार में तेजी अनिश्चित बनी रही। सेंसेक्स के 30 में से सिर्फ 19 शेयरों ने सकारात्मक प्रतिफल दिया। सिर्फ 14 शेयरों ने इस सूचकांक को मात दी। 50 शेयर वाले निफ्टी के लगभग आधे शेयरों ने अब तक कमजोर प्रतिफल दिया है। सिर्फ 18 शेयर ही इस सूचकांक की तुलना में बेहतर प्रदर्शन में सक्षम रहे। निफ्टी मिडकैप और निफ्टी स्मॉलकैप सूचकांकों में 4.5 प्रतिशत और 10 प्रतिशत की गिरावट आई। एवेंडस कैपिटल पब्लिक मार्केट्स अल्टरनेट स्ट्रेटेजीज के मुख्य कार्याधिकारी एंड्रयू हॉलैंड ने कहा, 'लार्ज-कैप को आर्थिक मंदी के दौरान पसंद किया गया क्योंकि निवेशकों ने प्रतिफल के मुकाबले सुरक्षित बने रहना ज्यादा उचित समझा।'

एडलवाइस रिसर्च ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि आर्थिक मंदी और आय में गिरावट से निवेशकों की चिंता बढ़ी है। इसके परिणामस्वरूप, निवेशक उन शेयरों से जुड़े रहे जिनमें तेज गिरावट की आशंका सीमित थी। इस बीच, कर्ज कर्ज से ग्रस्त कंपनियों पर दबाव बना रहा। उन पर आईएलऐंडएफएस संकट के बाद ऋण बाजारों में पैदा हुए नकदी संकट का प्रभाव बरकरार रहा। प्रवर्तकों द्वारा शेयर गिरवी रखे  जाने और कॉरपोरेट प्रशासन से जुड़ी चिंताओं का असर कुछ प्रख्यात व्यावसायिक घरानों पर भी देखा गया।

वर्ष के दौरान निफ्टी के शेयरों में, सबसे ज्यादा गिरने वालों में येस बैंक (-71 प्रतिशत), जी एंटरटेनमेंट (-36 प्रतिशत), गेल इंडिया (-34 प्रतिशत), महिंद्रा ऐंड महिंद्रा (-33.2 प्रतिशत) और वेदांत (-23.59 प्रतिशत) शामिल रहे, जबकि सबसे ज्यादा चढऩे वाले शेयरों में भारती एयरटेल (-60.49 प्रतिशत), बजाज फाइनैंस (-60.42 प्रतिशत) और आईसीआईसीआई बैंक (-51 प्रतिशत) शामिल रहे।

वेलेंटिस एडवायजर्स की मुख्य कार्याधिकारी एवं संस्थापक ज्योति जयपुरिया ने कहा, 'सभी ने एनबीएफसी संकट के प्रभाव को कम आंका था, जिससे उधारी पर दबाव बढ़ा। तथ्य यह है कि एनपीए की पहचान से भी हालात में सुधार लाने में ज्यादा मदद नहीं मिली। बैंक ऋण अंतर पाटने की दिशा में कदम उठाने से परहेज कर रहे थे।'

डेट बाजारों, खासकर एनबीएफसी पर निर्भर रहने वाली कंपनियों को रेटिंग में गिरावट का सामना करना पड़ा। ऊंचे स्तर की अल्पावधि देनदारियों की वजह से अपनी ऋण देयताएं पूरी करने के लिए एनबीएफसी को समस्याओं का सामना करना पड़ा। शेयरों पर ऋण लेने वाली कंपनियों को भी अनिश्चितता का सामना करना पड़ा, क्योंकि प्रवर्तकों के गिरवी शेयरों की वैल्यू पर बाजार में बिकवाली के बीच दबाव पड़ा। एक विश्लेषक ने कहा, 'कमजोर बुनियादी आधार वाली कंपनियों से निवेशकों ने दूरी बनाई, क्योंकि वे इन कंपनियों के कर्ज में फंसने का कोई जोखिम लेना नहीं चाहते थे।'

मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के दूसरे कार्यकाल से पैदा हुआ उत्साह जल्द ही ठंडा पड़ गया क्योंकि आर्थिक चुनौतियों का निवेशक धारणाओं पर दबाव पडऩा शुरू हो गया। सितंबर तिमाही में जीडीपी में महज 4.5 प्रतिशत का इजाफा दर्ज किया गया, जो 6 वर्षों में सबसे कम थी। नवंबर में मूडीज ने भारत के रेटिंग परिदृश्य में संशोधन किया। उसने कहा कि आर्थिक वृद्घि कमजोर रह सकती है और सरकार को राजकोषीय घाटे को नियंत्रित बनाए रखने में समस्या का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, हाल में सीएए और एनआरसी के खिलाफ विरोध से भी विदेशी ब्रोकरों में चिंता बढ़ी है।

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