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अनिश्चितता के बीच बॉन्ड, रुपये के लिए महत्त्वपूर्ण रहा साल 2019

अनूप रॉय / मुंबई December 31, 2019

वर्ष 2019 दिलचस्प रहा जिसमें वैश्विक के साथ साथ घरेलू कारकों का परिसंपत्ति वर्गों की वैल्यू के निर्धारण में समान योगदान देखा गया। वर्ष के अंत में, भारतीय केंद्रीय बैंक ने बॉन्ड प्रतिफल में नरमी लाने के लिए विशेष मुक्त बाजार परिचालन (ओएमओ) की पेशकश की। लेकिन यह केंद्रीय बैंक द्वारा इस्तेमाल किया गया एकमात्र विकल्प नहीं था। मार्च में, उसने अपने नए नकदी विकल्प के तौर पर मुद्रा की अदला-बदली की भी पेशकश की थी। आरबीआई ने बैंकों के साथ 10 अरब डॉलर की अदला-बदली की।

डॉलर की तुलना में रुपये की शुरुआत 69.44 पर हुई और 27 दिसंबर को यह 71.32 पर बंद हुआ। वर्ष के ज्यादातर समय, अमेरिका-चीन व्यापारिक तनाव का उभरते बाजारों की मुद्राओं पर असर बना रहा, और रुपया भी इससे अलग नहीं रहा। यह तनाव अब दूर हो चुका है। कैलेंडर वर्ष 2019 की पहली छमाही में दोनों देशों ने एक-दूसरे पर प्रतिशोध के तौर पर शुल्क लगाए थे। वर्ष के शुरू में 10 वर्षीय बॉन्ड प्रतिफल 7.418 प्रतिशत पर था और यह आखिर में लगभग 6.5 प्रतिशत पर रहा। 

यह वह अवधि भी थी जब अमेरिका में प्रतिफल की रफ्तार विपरीत दिखी, जिससे वैश्विक तौर पर मंदी की चिंता गहरा गई। भारतीय बॉन्डों पर भी इस घटनाक्रम का असर पड़ा, लेकिन यह केंद्रीय बैंक द्वारा दर कटौती से सीमित रहा। 2019 में, आरबीआई ने दरों में 135 आधार अंक तक की कटौती की। इससे 10 वर्षीय बॉन्ड प्रतिफल 90 आधार अंक घटा। हालांकि दर कटौती के परिणामस्वरूप अल्पावधि प्रतिफल में 137 आधार अंक की कमी आई। बॉन्ड प्रतिफल को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय बैंक ने विशेष ओएमओ की पेशकश की। शुक्रवार को जारी हुई वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (एफएसआर) से संकेत मिला है कि वैश्विक रूप से कमजोर प्रतिफल उत्साहित होने की वजह नहीं है, क्योंकि इससे वैश्विक स्तर पर, खासकर उभरते बाजारों में जोखिम बढ़ रहा है। 

एचडीएफसी लाइफ इंश्योरेंस के प्रमुख (फिक्स्ड इनकम) बद्रीश कुल्हाली ने कहा, 'नए वर्ष के लिए परिदृश्य चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। आर्थिक वृद्घि में मध्यम सुधार आने की संभावना है, जबकि मुद्रास्फीति स्थिर रहने या मौजूदा स्तरों के आसपास रहने का अनुमान है। मौद्रिक नीति में और ज्यादा नरमी की गुंजाइश काफी सीमित दिख रही है।' जनवरी और मार्च के बीच बाजारों को सरकार से कम से कम 50,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त उधारी की उम्मीद है। एयू स्मॉल फाइनैंस बैंक में एएलएम प्रमुख देवेंद्र दास ने कहा, 'अनुमान है कि आरबीआई की मदद से बॉन्ड बाजार नए साल में बेहतर प्रदर्शन करेगा। आरबीआई ने आर्थिक वृद्घि को ध्यान में रखते हुए मौद्रिक नीति में नरमी पर जोर दिया है। लेकिन राजकोषीय चिंता से वृद्घि की रफ्तार सीमित होगी।'

2019 में वैश्विक घटनाक्रमों से रुपया प्रभावित हुआ था, और 2020 में भी यह स्थिति बरकरार रह सकती है। रुपये का पोर्टफोलियो प्रवाह से प्रत्यक्ष संबंध है, और आरबीआई ने मजबूत पोर्टफोलियो प्रवाह की वजह से 455 अरब डॉलर का भंडार जमा किया है, लेकिन यदि पूंजी प्रवाह में निकासी होती है तो इस भंडार में कमी आ सकती है। एमके ग्लोबल फाइनैंशियल सर्विसेज में शोध प्रमुख (मुद्रा) राहुल गुप्ता का कहना है, 'भविष्य में भी वैश्विक कारकों का दबदबा रहेगा, हालांकि इनका असर कैलेंडर वर्ष 2020 में अलग होगा। अमेरिकी संरक्षणवादी नीतियों, अमेरिकी राष्टï्रपति चुनाव को लेकर अनिश्चितता से व्यापार जगत में आशंका बनी रहेगी।' 

गुप्ता का कहना है, 'स्थानीय मोर्चे पर, धीमी वृद्घि को लेकर चिंताओं, बढ़ती मुद्रास्फीति और राजकोषीय दबाव से रुपये में तेजी पर विराम लगेगा। व्यापक तौर पर, हमें विभिन्न वैश्विक और घरेलू उतार-चढ़ावों के बीच डॉलर/रुपया 69-74 के दायरे में बने रहने का अनुमान है।'

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